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Dr. Srimati Tara Singh
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सार्वजनिक प्रतिमाओं की विरासत और चुनौती

 

अमर प्रतीकअनंत प्रश्न: सार्वजनिक प्रतिमाओं की विरासत और चुनौती

[चौराहों पर खड़े आदर्श: श्रद्धा, स्वाभिमान और विवाद]



भारत की सांस्कृतिक आत्मा उसकी मिट्टी में बसी कहानियों, संघर्षों और आदर्शों में साँस लेती है, और ये कहानियाँ तब जीवंत हो उठती हैं, जब सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमाएँ अपने अटल रूप में खड़ी होकर समय को चुनौती देती हैं। ये मूर्तियाँ केवल पत्थर या धातु का ढांचा नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की स्मृति, प्रेरणा और सामूहिक संकल्प का प्रतीक हैं। चाहे वह दिल्ली के राजपथ पर महात्मा गांधी की शांत मुद्रा हो, जो अहिंसा का संदेश देती है, या अहमदाबाद में सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊँची स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, जो राष्ट्रीय एकता का गर्वोन्माद जगाती है—ये प्रतिमाएँ हमें हमारे गौरवशाली अतीत से जोड़ती हैं और भविष्य की राह दिखाती हैं। भारत में प्रतिमा स्थापना की परंपरा प्राचीन है, जो सिंधु घाटी की छोटी मूर्तियों से लेकर मौर्यकालीन अशोक स्तंभों और आधुनिक युग के विशाल स्मारकों तक फैली है। यह परंपरा केवल कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज की उन आकांक्षाओं का दर्पण है, जो अपने नायकों को चिरस्थायी रूप में संजोना चाहता है।

सार्वजनिक प्रतिमाएँ समाज के लिए एक मूक शिक्षक की तरह हैं। जब कोई युवा भगत सिंह की प्रतिमा के सामने खड़ा होता है, तो वह केवल एक क्रांतिकारी की मूर्ति नहीं देखता, बल्कि उस बलिदान को महसूस करता है, जिसने देश की आजादी की नींव रखी। इसी तरह, डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाएँ, जो देशभर में हजारों की संख्या में हैं, सामाजिक न्याय और समानता की उस ज्योति को प्रज्वलित करती हैं, जिसके लिए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया। गुजरात पर्यटन विभाग की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी ने अपने उद्घाटन से 2023 तक 1.5 करोड़ से अधिक पर्यटकों को आकर्षित किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ये स्मारक न केवल सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक प्रगति के स्रोत भी हैं। ये प्रतिमाएँ स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देती हैं, पर्यटन को बढ़ावा देती हैं और क्षेत्रीय गौरव को मजबूत करती हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. रामचंद्र तिवारी ने लिखा है - प्रतिमाएँ केवल मूर्तियाँ नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का जीवंत दस्तावेज हैं, जो हमें हमारे मूल्यों और कर्तव्यों की याद दिलाती हैं।

प्रतिमाएँ अतीत और वर्तमान के बीच एक संवाद का सेतु बनाती हैं। जब हम कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में रानी विक्टोरिया की प्रतिमा देखते हैं, तो वह हमें औपनिवेशिक इतिहास की जटिलताओं की याद दिलाती है, वहीं चेन्नई में पेरियार की मूर्तियाँ आत्मसम्मान और सामाजिक सुधार की गाथा कहती हैं। ये स्मारक हमें यह सिखाते हैं कि हमारा इतिहास केवल जीत और हार की कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि उन आदर्शों का मंच है, जो हमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं। सेंटर फॉर सोशल स्टडीज, नई दिल्ली के 2023 के सर्वेक्षण के अनुसार, 72% भारतीयों का मानना है कि सार्वजनिक प्रतिमाएँ युवाओं में इतिहास के प्रति जागरूकता और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देती हैं। यह आँकड़ा इस बात का प्रमाण है कि ये मूर्तियाँ समाज के लिए केवल सजावटी वस्तुएँ नहीं, बल्कि प्रेरणा और शिक्षा का सशक्त माध्यम हैं।

किंतु प्रतिमा स्थापना का मुद्दा उतना ही जटिल है, जितना प्रेरणादायक। हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर सड़कों और चौराहों पर नई प्रतिमाओं की स्थापना पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। यह निर्णय उज्जैन के माकड़ोन में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा तोड़े जाने और सरदार पटेल की मूर्ति स्थापित करने की मांग से उत्पन्न विवाद के संदर्भ में आया। इस घटना ने सामाजिक तनाव को जन्म दिया और प्रतिमा स्थापना से जुड़े सामाजिक, प्रशासनिक और यातायात संबंधी मुद्दों को उजागर किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रतिबंध केवल नई प्रतिमाओं पर लागू होगा, और पहले से स्थापित मूर्तियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह फैसला न केवल यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक सुव्यवस्था को बनाए रखने की दिशा में एक कदम है, बल्कि सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण है।

प्रतिमा स्थापना के विवाद देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर उभरते रहे हैं। माकड़ोन की घटना इसका एक उदाहरण है, जहाँ डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा तोड़े जाने से दलित समुदाय की भावनाएँ आहत हुईं और सामाजिक तनाव बढ़ा। ऐसी घटनाएँ न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनती हैं, बल्कि सामाजिक एकता को भी कमजोर करती हैं। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का यह निर्णय एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो न तो किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है, न ही किसी महापुरुष के सम्मान को कम करता है। यह समाज से अपेक्षा करता है कि वह सामाजिक समरसता और सुव्यवस्था को प्राथमिकता दे। साथ ही, यह प्रशासन को कोर्ट के 2023 के आदेशों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश देता है, ताकि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों।

आर्थिक दृष्टिकोण से भी प्रतिमा स्थापना के अपने आयाम हैं। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण पर लगभग 3000 करोड़ रुपये खर्च हुए, जिस पर कुछ आलोचकों ने सवाल उठाए कि इस राशि का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य या रोजगार सृजन में किया जा सकता था। किंतु यह भी सत्य है कि ऐसे स्मारक दीर्घकाल में आर्थिक लाभ देते हैं। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी ने न केवल पर्यटन को बढ़ावा दिया, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित किए। आधुनिक तकनीकों जैसे फाइबर रिइन्फोर्समेंट, डिजिटल मॉडलिंग और थ्रीडी प्रिंटिंग ने प्रतिमा निर्माण को और सुलभ व सटीक बनाया है, जिससे यह उद्योग कौशल विकास और आर्थिक प्रगति का स्रोत बन रहा है।

प्रतिमा स्थापना में स्थानीय जनमत का सम्मान और परियोजना की पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है। अनियंत्रित या राजनीति से प्रेरित स्थापना सामाजिक टकराव को जन्म दे सकती है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय इस दिशा में एक नजीर है, जो यह सिखाता है कि महापुरुषों का सम्मान उनकी मूर्तियों की संख्या में नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपनाने में है। यह निर्णय यातायात प्रबंधन, सामाजिक समरसता और प्रशासनिक जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करता है।

सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमाएँ केवल स्थिर संरचनाएँ नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक कथानक हैं। ये हमें हमारे अतीत के गौरव, वर्तमान की जिम्मेदारियों और भविष्य की संभावनाओं से जोड़ती हैं। जब हम इनके साये में खड़े होते हैं, तो हम केवल पत्थर की मूर्तियाँ नहीं देखते, बल्कि उन सपनों को महसूस करते हैं, जिन्होंने हमारे राष्ट्र को आकार दिया। ये प्रतिमाएँ हमें सिखाती हैं कि सच्चा सम्मान मूर्तियों को स्थापित करने में नहीं, बल्कि उन मूल्यों को जीने में है, जो हमारे नायक हमारे लिए छोड़ गए। हम इन प्रतीकों को न केवल श्रद्धा से देखें, बल्कि इनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जो एकता, समरसता और प्रगति का प्रतीक हो।



प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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