Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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समय बदला, पर जड़ों का सुकून अब भी वही

 

समय बदलापर जड़ों का सुकून अब भी वही

[परंपरा की नदी: बहती, बदलती, पर अटूट]

[तकनीक की चमक में भी जीवित जड़ों की मिठास]



आज की तेज और चकाचौंध भरी दुनिया में, जहाँ प्रगति की रोशनी हर दिशा को चमका रही है, वहीं मन के किसी गहरे कोने से एक कोमल पर शक्तिशाली पुकार उठती है—लौट आओ, अपनी जड़ों के सुकून में। यह पुकार केवल मिट्टी की सोंधी महक नहीं, बल्कि उन अमर मूल्यों, आदर्शों और रिश्तों की जीवंत ध्वनि है, जो हमें हमारी असली पहचान से दोबारा जोड़ती है, हमें भीतर से दृढ़ बनाती है और जीवन को संपूर्णता से भर देती है।

संस्कृति का यह अपनापन किसी बंद पुस्तक का स्थिर पन्ना नहीं, बल्कि एक सतत धड़कती विरासत है, जिसमें अतीत की स्मृतियाँ वर्तमान के अनुभवों से घुल-मिलकर भविष्य की नींव रखती हैं। यह वह अदृश्य शक्ति है, जो जीवन के हर मोड़ पर हमें थाम लेती है—जैसे धरती की गहराई में उतरती जड़ें पेड़ को अडिग खड़ा रखती हैं, वैसे ही संस्कृति हमारे अस्तित्व को स्थिरता, पोषण और अर्थ देती है। यह हमें बार-बार अहसास कराती है कि हम किसी भीड़ का हिस्सा मात्र नहीं, बल्कि एक महान, विस्तृत और गौरवशाली परंपरा के संतान हैं—ऐसी विरासत के वाहक, जो समय बदलने पर भी सदियों से अटूट और अमर है।

बचपन की उन सुनहरी स्मृतियों में जरा फिर से उतरकर देखिए—दादी की गोद में सुनाई गईं वे पौराणिक कथाएँ, जिनमें जीवन के गूढ़ सत्य छिपे होते थे; त्योहारों की भोर में घर भर में दौड़ती-भागती वह उजली-सी खुशी; आरती की ज्योति के साथ फैलती वह पवित्र सुगंध, जो मन को अजीब-सी शांति से भर देती थी; माँ के हाथों से परोसा गया वह स्नेह-सिक्त भोजन, जो सिर्फ पेट ही नहीं, आत्मा तक को तृप्त कर देता था; पड़ोसियों के संग बैठकर बिताई वो खिलखिलाती शामें, जिनमें अपनत्व का अनकहा संगीत गूँजता था। ये स्मृतियाँ केवल बीते समय के दृश्य नहीं, बल्कि वे जादुई सूत्र हैं, जिन्होंने हमारे भीतर संवेदनाओं की मिट्टी को गूँथा, रिश्तों की गहराई को पनपाया, और मानवता की लौ को उजाला दिया।

जीवन की रफ़्तार हमें दूर देशों तक ले गई, नए सपनों की तलाश में, नए आसमानों की ओर। पर दिल की उस नन्ही-सी कोठरी में, जो सदियों से वैसी ही है, जहाँ न बदलते मौसम दस्तक देते हैं न विदाई के क्षण, वहाँ संस्कृति की मधुर धुन हमेशा जगमगाती रहती है। विदेश की चमकती गलियों में जब कोई भारतीय त्योहार की रात माँ की याद में एक छोटा-सा दीप जलाता है, या अपने बच्चे को मातृभाषा का पहला मीठा शब्द सिखाता है, तो वह पल केवल क्रिया नहीं—अपनी जड़ों से आत्मा का पुनर्मिलन बन जाता है। यही है संस्कृति की असली शक्ति—दूरी को ध्वस्त कर देने वाली, दिलों को जोड़ देने वाली, और समय को भी अपने सामने झुकने पर मजबूर कर देने वाली।

परंपराएँ कोई जड़ बनी हुई विरासत नहीं, बल्कि एक सजीव, प्रवाहित नदी की तरह होती हैं—जो समय के साथ अपना रूप बदलती हैं, नए रंगों को अपनाती हैं, और फिर भी अपने स्रोत से कभी अलग नहीं होतीं। नई पीढ़ी जब इन्हें छूती है, तो ये और भी उज्ज्वल होकर खिल उठती हैं। आधुनिक परिधान में सजी युवती जब गणेशोत्सव पर श्रद्धा से पारंपरिक मूर्ति के सामने हाथ जोड़ती है, या अंग्रेज़ी के मिश्रण से भरी रोज़मर्रा की भाषा में भी “माँ”, “घर”, “प्यार” जैसे शब्द अपनी पुरानी महक के साथ जीवंत रहते हैं—तब समझ आता है कि संस्कृति टूटती नहीं, बल्कि नए रूप में दमकती है। यही अद्भुत संगम—जड़ों की मजबूती और आधुनिकता के साहस का मेल—हमारी संस्कृति की अनोखी, अनुपम सुंदरता को जन्म देता है।

लेकिन संस्कृति का सबसे प्रखर, सबसे धड़कता रूप हमारे रिश्तों में दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति “मैं” को नहीं, “हम” को अपना केंद्र मानती है। यहाँ परिवार सिर्फ संबंधों की परिभाषा नहीं, बल्कि भावनाओं का एक विस्तृत ब्रह्मांड है—बुआ का ममता भरा आलिंगन, मामा की खिलखिलाती शरारतें, चाचा की गंभीर सलाह, दादाजी की अनुभवों से भरी कहानियाँ, ननद की सहेली जैसी सहज मुस्कान, पड़ोसियों का हर सुख-दुख में साथ खड़ा रहना। यह प्रेम का विस्तार, यह रिश्तों का घेराव सिर्फ भारतीय मिट्टी की उपज है—जो हर दिल को जोड़ती है, हर अकेलेपन को पिघला देती है, और जीवन को गर्माहट से भर देती है।

त्योहारों में संस्कृति का वह अपनापन अपनी चरम ऊँचाई पर पहुँच जाता है। रक्षाबंधन की राखी केवल धागा नहीं, बल्कि भाई-बहन के अनन्त विश्वास और सुरक्षा के वचन का सुगंधित प्रतीक है—एक ऐसा बंधन जो जीवन भर दिलों को साथ बाँधकर रखता है। होली के रंग सिर्फ चेहरे नहीं, मन के कोनों को भी उजाला देते हैं, मनमुटाव पिघला देते हैं और रिश्तों पर जमे धूल को धोकर नई ताजगी भर देते हैं। दिवाली का हर दीया केवल अंधेरा दूर नहीं करता, बल्कि मन की गहराइयों में छिपी आशा की लौ को भी उजला कर देता है। ये उत्सव हमें याद दिलाते हैं कि जीवन का सार अकेली सफलताओं में नहीं, बल्कि मिलकर जीने, बाँटने, और दिलों को जोड़ने में है।

भले ही स्मार्टफोन की स्क्रीन कितनी ही चमकदार क्यों न हो, दिल के तार तो अब भी अपनी मिट्टी की महक से ही बँधे होते हैं। मंदिर की घंटियों की गंभीर, पवित्र ध्वनि सुनकर मन सहज ही झुक जाता है, और माँ के पारंपरिक गीत सुनते ही लगता है जैसे सदियाँ हमारे सामने फिर से जीवंत होकर खड़ी हो गई हों। संस्कृति का यह भावुक अपनापन हमारे भीतर एक शांत, निर्मल सरिता की तरह बहता है—जीवन की थकान सोख लेता है, टूटे मन को सँभाल लेता है, और व्यस्तता की दौड़ में भी हमें स्थिरता और सुकून देता रहता है।

यह हमें लगातार स्मरण कराता है कि उड़ान जितनी ऊँची हो जाए, जड़ें भीतर ही भीतर उतनी ही मज़बूती से हमें थामे रहती हैं—अटल, अविभाज्य, अमर। यह पुकार कोई बंधन नहीं, बल्कि प्रेम से भरा वह मधुर निमंत्रण है, जो हमें अपने मूल को पहचानने, अपनी मिट्टी को प्रणाम करने और अपने रिश्तों को हृदय से लगाने की ओर बुलाती है। संस्कृति हमें सिखाती है कि आगे बढ़ना जितना आवश्यक है, उतना ही महत्वपूर्ण है पीछे मुड़कर अपने स्रोत को महसूस करना। यही अपनापन “हम” की शक्ति देता है, हर दिल को उसकी जड़ों से अटूट डोर में बाँधे रखता है।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)


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