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सूचना के शोर में दबती पुस्तकालयों की साँसें

 

सूचना के शोर में दबती पुस्तकालयों की साँसें

[ज्ञान और साहित्य की दुनिया से दूर होती नई पीढ़ी]



एक समय था जब किताबें साँस लेती थीं, जब उनके पन्नों की सरसराहट में जीवन की धड़कन सुनाई देती थी। पुस्तकालयों की खामोशी में न जाने कितने सपने जन्म लेते थे, कितने विचार पंख लगाकर उड़ान भरते थे। वह दौर था जब किताबें सिर्फ कागज़ का ढेर नहीं, बल्कि आत्मा की खुराक थीं। लेकिन आज, जब उंगलियाँ स्क्रीन पर नाच रही हैं और आँखें डिजिटल चमक में डूबी हैं, किताबें चुपके-चुपके एक कोने में सिमट रही हैं। उनकी आवाज़ अब धीमी पड़ चुकी है, और उनके साथ-साथ हमारी संवेदनाएँ, हमारी सोच, और हमारी मानवता भी कहीं खोती जा रही है। यह सिर्फ पुस्तकालयों का दर्द नहीं, यह उस सभ्यता का दर्द है जो किताबों की गोद में पली थी और अब डिजिटल दुनिया की आँधी में बिखर रही है।

किताबें कभी महज वस्तु नहीं थीं। वे समय की सीमाओं को तोड़कर हमें अनंत यात्राओं पर ले जाती थीं। एक किताब खोलते ही आप रूस के बर्फीले मैदानों में दोस्तोयेव्स्की के किरदारों के दुख-दर्द में डूब जाते, तो दूसरी किताब आपको प्रेमचंद की कालजयी कहानियों के ज़रिए भारत के गाँवों की मिट्टी की सोंधी गंध तक ले जाती। किताबें हमें सिर्फ जानकारी नहीं देती थीं, वे हमें इंसान बनाती थीं। वे हमें सिखाती थीं कि हर दर्द को समझना है, हर खुशी को बाँटना है, और हर सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करनी है। लेकिन आज की पीढ़ी के लिए किताबें एक पुरानी याद बनकर रह गई हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 18-24 आयु वर्ग के 70% से अधिक युवा किताबों के बजाय सोशल मीडिया और ऑनलाइन कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं। यह आँकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उस बदलते परिदृश्य की कहानी है जहाँ किताबें अब प्रासंगिक नहीं मानी जातीं।

पुस्तकालय, जो कभी ज्ञान के मंदिर हुआ करते थे, अब वीरान पड़े हैं। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जैसे संस्थानों, जो कभी किताबों के प्रेमियों का तीर्थस्थल थे, में अब आगंतुकों की संख्या लगातार घट रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों की संख्या पिछले दो दशकों में 20% तक कम हुई है, और जो बचे हैं, उनमें से कई रखरखाव और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। ये पुस्तकालय अब केवल किताबों का भंडार नहीं, बल्कि उपेक्षा और उदासीनता का प्रतीक बन गए हैं। वहाँ की दीवारों पर अब धूल की परतें हैं, और शेल्फों पर रखी किताबें किसी के स्पर्श की प्रतीक्षा में पीली पड़ रही हैं।

नई पीढ़ी को दोष देना आसान है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हमने उन्हें किताबों की दुनिया से जोड़ने की कोशिश की? आज का बच्चा जन्म लेते ही टैबलेट और स्मार्टफोन की चमक में खो जाता है। नेशनल सैंपल सर्वे (2022) के अनुसार, भारत में 10-18 आयु वर्ग के 65% बच्चे प्रतिदिन 3 घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। कहानियाँ अब दादी-नानी की आवाज़ में नहीं, बल्कि यूट्यूब के एनिमेशन में सुनाई जाती हैं। शिक्षक, जो कभी किताबों के प्रति प्रेम जगाते थे, अब ऑनलाइन नोट्स और पीडीएफ लिंक भेजने में व्यस्त हैं। और अभिभावक? वे भी अपने बच्चों के साथ स्क्रीन टाइम में हिस्सेदार बन जाते हैं। इस दौड़ में किताबें कहीं पीछे छूट गई हैं।

किताबों का महत्व सिर्फ ज्ञान तक सीमित नहीं है। वे हमें संवेदनशील बनाती हैं, हमें दूसरों के दुख-दर्द से जोड़ती हैं। जब कोई बच्चा ‘टू किल ए मॉकिंगबर्ड’ पढ़ता है, तो वह नस्लवाद और अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाना सीखता है। जब वह ‘मालगुड़ी डेज़’ की सैर करता है, तो वह छोटे शहरों की मासूमियत और मानवीय रिश्तों की गर्माहट को महसूस करता है। ये अनुभव सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि जीवन को समझने का तरीका हैं। लेकिन आज की दुनिया में, जहाँ हर सवाल का जवाब गूगल पर मिल जाता है, किताबों की गहराई को समझने का धैर्य ही नहीं बचा। एक अध्ययन के अनुसार, डिजिटल युग में लोगों का ध्यान केंद्रित करने की अवधि 2000 में 12 सेकंड से घटकर 2023 में मात्र 8 सेकंड रह गई है। ऐसे में 300 पन्नों की किताब पढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं।

किताबें हमें बिना शर्त प्रेम करती हैं। वे हमारी कमज़ोरियों, हमारी जिज्ञासाओं, और हमारे सवालों को बिना आलोचना किए स्वीकार करती हैं। बदले में वे सिर्फ़ हमारा समय माँगती हैं — कुछ पल, कुछ पन्ने, और कुछ विचार। लेकिन हमारी प्राथमिकताएँ बदल चुकी हैं। हम इंस्टाग्राम रील्स में खोए रहते हैं, जहाँ 15 सेकंड की कहानी हमें संतुष्ट कर देती है, लेकिन एक उपन्यास की गहराई हमें बोर करती है। यह क्षणिक संतुष्टि हमें किताबों से दूर ले जा रही है, और इसके साथ ही हम अपनी कल्पनाशीलता, संवेदनशीलता, और गहरे चिंतन की क्षमता खो रहे हैं।

पुस्तकालय सिर्फ किताबों का ढेर नहीं, बल्कि मानव इतिहास का जीवंत दस्तावेज हैं। वे उन विचारों का संग्रह हैं, जिन्होंने सभ्यताओं को आकार दिया। लेकिन जब ये पुस्तकालय वीरान हो रहे हैं, तो हम सिर्फ किताबें नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी खो रहे हैं। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में पुस्तकालयों का उपयोग 1990 के दशक की तुलना में 40% तक कम हुआ है। यह आँकड़ा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ विचार सिर्फ ट्वीट्स और स्टोरीज़ तक सिमटकर रह जाएँगे?

हमें यह तय करना होगा कि हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या देना चाहते हैं — एक ऐसी दुनिया जहाँ जानकारी तो है, लेकिन समझ नहीं; सूचना तो है, लेकिन संवेदना नहीं। किताबें हमें वह समझ देती हैं जो कोई एल्गोरिदम नहीं दे सकता। वे हमें वह गहराई देती हैं जो कोई सर्च इंजन नहीं दे सकता। लेकिन इसके लिए हमें पहल करनी होगी। स्कूलों में पुस्तकालयों को फिर से जीवंत करना होगा। शिक्षकों को बच्चों में किताबों के प्रति प्रेम जगाना होगा। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ किताबें पढ़ने की आदत डालनी होगी। सामुदायिक स्तर पर पुस्तक चर्चाएँ, साहित्यिक मंच, और रीडिंग क्लब्स शुरू करने होंगे।

भारत में कुछ प्रयास दिखाई दे रहे हैं। जैसे, पुणे की ‘बुकवर्म लाइब्रेरी’ और दिल्ली की ‘कम्युनिटी लाइब्रेरी प्रोजेक्ट’ जैसी पहलें बच्चों और युवाओं को किताबों से जोड़ रही हैं। लेकिन ये प्रयास बूँद-बूँद हैं, और हमें सागर की ज़रूरत है। सरकार को भी सार्वजनिक पुस्तकालयों में निवेश बढ़ाना होगा। एक समय था जब भारत में नालंदा और तक्षशिला जैसे ज्ञान के केंद्र विश्व भर में प्रसिद्ध थे। आज हमें उसी भावना को फिर से जगाने की ज़रूरत है।

किताबें मौन हैं, लेकिन उनकी खामोशी में एक पुकार है। वे हमें बुला रही हैं — न सिर्फ पढ़ने के लिए, बल्कि जीने के लिए, समझने के लिए, और इंसान बने रहने के लिए। अभी देर नहीं हुई है। किसी पुराने पुस्तकालय में चलिए, किसी किताब को छूइए, उसके पन्नों को पलटिए। शायद वह किताब आपका इंतज़ार कर रही हो। शायद वह आपको वह दुनिया दिखाए जो आप भूल चुके हैं। क्योंकि जब किताबें बोलती थीं, तब हम बेहतर थे। और जब हम फिर से किताबों को सुनेंगे, तब हम फिर से बेहतर हो सकते हैं।



प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)


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