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रोहन बोपन्ना का टेनिस से संन्यास

 

भारतीय टेनिस खिलाड़ीरोहन बोपन्ना का टेनिस से संन्यास


रोहन बोपन्नाटेनिस का ऋषिजिसने उम्र नहींऊँचाई साधी

[रोहन बोपन्ना: जिसने उम्र को हराया, भारत को जगाया]

[बोपन्ना: जिसने खेल को कर्म, और कर्म को पूजा बनाया]


जब रैकेट की गूंज थमती है और कोर्ट की रेखाएं धुंध में खोने लगती हैं, तब एक युग अपनी अंतिम सलामी देता है। रोहन बोपन्ना – भारतीय टेनिस का वह ध्रुवतारा, जिसने असंभव को संभव बनाया, अब अपने रैकेट को विश्राम दे रहा है। 1 नवंबर 2025 को, 45 वर्ष की आयु में, उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “टेनिस मेरा जीवन रहा – इसने मुझे उद्देश्य दिया, ताकत दी, और विश्वास सिखाया। यह अलविदा नहीं, बस एक नया सफर है।” यह केवल एक खिलाड़ी का संन्यास नहीं, बल्कि भारतीय खेल के स्वर्णिम युग का अवसान है। कूर्ग के कॉफी बागानों से विश्व के सबसे बड़े कोर्ट तक, बोपन्ना ने हर सर्व के साथ सपनों को साकार किया। 43 की उम्र में ग्रैंड स्लैम जीतना, विश्व रैंकिंग में शिखर छूना – यह कोई सपना नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और जुनून की जीवंत गाथा है।

रोहन बोपन्ना की कहानी मेहनत, जुनून और अडिग संकल्प की जीवंत मिसाल है। 4 मार्च 1980 को कर्नाटक के कोडागू में जन्मे इस नक्षत्र ने 11 वर्ष की आयु में टेनिस को अपना धर्म बना लिया। उनके पिता एम.जी. बोपन्ना ने कॉफी बागानों की हरियाली के बीच एक टेनिस कोर्ट गढ़ा, जहां रोहन ने रैकेट के साथ अपने सपनों को पहली सांस दी। सिंगल्स की प्रारंभिक बाधाओं ने उन्हें डबल्स की राह दिखाई, और यहीं से उनकी उड़ान ने विश्व को छू लिया। 2003 में प्रोफेशनल टेनिस की दुनिया में कदम रखते ही 22 साल का एक ऐसा सफर शुरू हुआ, जिसने 26 एटीपी डबल्स खिताब, जिनमें 6 मास्टर्स 1000 शामिल हैं, भारत की झोली में डाले। 2017 में गैब्रिएला डाब्रोवस्की के साथ फ्रेंच ओपन मिक्स्ड डबल्स जीतकर वे भारत के चौथे ग्रैंड स्लैम विजेता बने। लेकिन 2024 में, 43 की उम्र में, मैथ्यू एब्डेन के साथ ऑस्ट्रेलियन ओपन पुरुष डबल्स खिताब जीतकर उन्होंने इतिहास रच दिया – ओपन एरा के सबसे उम्रदराज ग्रैंड स्लैम चैंपियन। उसी साल डबल्स में विश्व नंबर एक की रैंकिंग हासिल कर उन्होंने एक और कीर्तिमान स्थापित किया – टेनिस इतिहास का सबसे उम्रदराज नंबर एक। 

रोहन बोपन्ना का करियर महज ट्रॉफियों का खजाना नहीं, बल्कि प्रेरणा का एक अथाह सागर है, जो हर सपने को हकीकत में बदलने की ताकत देता है। 38 एटीपी फाइनल्स, 15 अलग-अलग जोड़ीदारों के साथ कोर्ट पर उतरे, और हर बार एक नया ज्वार लाए। ऐसम-उल-हक कुरेशी के साथ 'इंडो-पाक एक्सप्रेस' बनाकर 2010 यूएस ओपन फाइनल तक का सफर तय किया, जो सिर्फ खेल नहीं, बल्कि शांति और भाईचारे का अमर संदेश था। 2011 में कुरेशी के साथ पेरिस मास्टर्स जीतकर पहला मास्टर्स खिताब अपने नाम किया। 2012 और 2015 में एटीपी फाइनल्स के फाइनल में पहुंचकर दुनिया को अपनी धमक दिखाई। 2023 में, 43 की उम्र में, इंडियन वेल्स मास्टर्स जीतकर सबसे उम्रदराज मास्टर्स चैंपियन बनकर इतिहास रचा। चार ओलंपिक में भारत का परचम लहराया, 2016 रियो में सानिया मिर्जा के साथ मिक्स्ड डबल्स में चौथा स्थान हासिल किया। डेविस कप में 2002 से 2023 तक भारत के लिए लड़े, आखिरी टाई मोरक्को के खिलाफ खेली। 2018 और 2023 के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। 

रोहन बोपन्ना की ताकत उनकी अडिग शारीरिक और मानसिक दृढ़ता में निहित थी। 40 की उम्र, जब अधिकांश खिलाड़ी कोर्ट को अलविदा कह चुके होते हैं, रोहन ने योग और माइंडफुलनेस के जरिए खुद को पुनर्जनन किया। 2020 में घुटने की गंभीर चोट ने उनके करियर को लगभग लील लिया था, मगर बेटी त्रिधा के जन्म ने उनकी आत्मा में नया जोश फूंका। "मैं चाहता था कि मेरी बेटी मुझे कोर्ट पर विजयी देखे," उन्होंने दृढ़ता से कहा। पत्नी सुप्रिया, जिन्हें उन्होंने "जीवन की सबसे बड़ी शक्ति" बताया, हर कदम पर उनकी ढाल बनीं। कोच स्कॉट डेविडॉफ के 12 साल के मार्गदर्शन ने उनके खेल को बुलंदियों तक पहुंचाया। 'स्टॉप वॉर स्टार्ट टेनिस' कैंपेन के जरिए ऐसम-उल-हक कुरेशी के साथ मिलकर उन्होंने टेनिस को सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया, जिसके लिए 2010 में प्रतिष्ठित आर्थर एश ह्यूमैनिटेरियन अवॉर्ड से नवाजा गया। यह रोहन का वह चेहरा है, जो कोर्ट की सीमाओं से परे, मानवता के लिए चमकता है।

रोहन बोपन्ना का भारतीय टेनिस में योगदान एक ऐसी अमर गाथा है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी। जब लिएंडर पेस और महेश भूपति का दौर धीमा हुआ, और सानिया मिर्जा चोटों से जूझ रही थीं, तब रोहन ने भारतीय टेनिस को विश्व मंच पर न केवल जीवित रखा, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। बैंगलोर में स्थापित रोहन बोपन्ना टेनिस अकादमी और यूटीआर प्रो टेनिस के जरिए उन्होंने ग्रामीण और छोटे शहरों के बच्चों के लिए सपनों के द्वार खोले। "रोहन ने डबल्स को भारत में एक नई पहचान दी," आनंद अमृतराज के शब्द उनके प्रभाव की गहराई बयां करते हैं। अर्जुन अवॉर्ड (2012) और पद्म श्री (2024) जैसे सम्मान उनके गौरवशाली सफर के साक्षी बने। मगर उनके संन्यास ने डबल्स में एक ऐसी खाई छोड़ी है, जिसे भरना युवा सितारों जैसे शिवा कृष्णन या अन्य के लिए चुनौती होगा।

पेरिस मास्टर्स 2025 में अलेक्जेंडर बुलिक के साथ आखिरी मैच में हार के बाद, जब रोहन कोर्ट से लौटे, उनकी आंखों में हार नहीं, बल्कि संतुष्टि की चमक थी। "यह अंत नहीं, एक नई शुरुआत है," उनके शब्दों में दृढ़ विश्वास गूंजा। संन्यास के बाद वे कोचिंग और मेंटरिंग के जरिए नई प्रतिभाओं को तराशने का संकल्प लिए हैं। अपनी अकादमी के माध्यम से वे भविष्य के सितारे गढ़ेंगे, मगर निजी जीवन में बेटी त्रिधा और पत्नी सुप्रिया के साथ अनमोल पल बिताना चाहते हैं। "भारत के लिए खेलना मेरा सर्वोच्च गर्व था," उनकी अंतिम बातें दिलों में गहरे उतर गईं।

रोहन बोपन्ना का संन्यास भारतीय टेनिस के एक स्वर्णिम अध्याय का स्मरणीय समापन है, किंतु उनकी विरासत एक ऐसी प्रेरणा की लौ है, जो युगों तक देदीप्यमान रहेगी। कूर्ग के एक साधारण गांव से निकलकर वैश्विक मंच पर अपनी छाप छोड़ने वाला उनका असाधारण सफर यह सिखाता है कि दृढ़ संकल्प और जुनून के आगे उम्र की सीमाएं बौनी हैं। उनका रैकेट भले ही अब खामोश हो, पर उसकी गूंज हर उस युवा दिल में गूंजेगी, जो टेनिस कोर्ट पर अपने सपनों को साकार करने की हिम्मत रखता है। रोहन ने न केवल भारत का नाम विश्व पटल पर ऊंचा किया, बल्कि हर उस व्यक्ति को प्रेरित किया, जो असंभव को संभव बनाने का साहस रखता है। धन्यवाद, रोहन, एक ऐसी कथा रचने के लिए, जो समय की सीमाओं को पार कर अनंत तक जीवित रहेगी।



प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)



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