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रीतियाँ रह गईं पीछे, रील्स हो गईं आगे

 

रीतियाँ रह गईं पीछेरील्स हो गईं आगे

[आस्था बनाम इंस्टाग्राम: किस ओर जा रही है हमारी पहचान?]

[भक्ति से ब्रांडिंग तक: हमारी बदलती सांस्कृतिक धारा]


पहले त्योहारों की आत्मा रसोई में माँ के हाथों की मिठास, मंदिर की घंटियों की मधुर झंकार और परिवार के ठहाकों की गर्मजोशी में पलती थी। वह दौर था जब दीपावली की दीपशिखा दिलों में रोशनी बिखेरती थी और करवा चौथ की थाली अटूट प्रेम का आईना हुआ करती थी। मगर आज, यह आत्मा इंस्टाग्राम की रील्स, प्रोफेशनल फोटोशूट्स और थीम-बेस्ड इवेंट्स की चमक-दमक में कहीं गुम सी हो गई है। दीपों की जगमगाहट अब लाइक्स की गिनती में सिमटती जा रही है, और करवा चौथ की थाली सोशल मीडिया की क्षणिक स्टोरी बनकर रह गई है। सवाल यह नहीं कि हम त्योहार मना रहे हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या हम उनकी गहराई को जी रहे हैं, या बस एक सांस्कृतिक नाटक का मंचन कर रहे हैं? क्या हमारी संस्कृति अब केवल दिखावे की चकाचौंध है, या उसमें अभी भी वह आत्मीयता और आध्यात्मिकता बाकी है जो हमें पीढ़ियों से एकसूत्र में बांधती आई है?

हमारी संस्कृति की नींव हमेशा उसकी भावनात्मक और आध्यात्मिक गहराई रही है। त्योहार महज रस्मों का नाम नहीं थे; वे थे एक सामूहिक उत्साह, जो प्रेम, एकता और कृतज्ञता के रंगों से जीवन को रंग देता था। मिसाल के तौर पर, दीपावली सिर्फ दीप जलाने का पर्व नहीं थी; वह थी अंधकार पर उजाले की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक। लेकिन आज, 2023 के एक सर्वे (प्यू रिसर्च सेंटर) के मुताबिक, भारत में 68% युवा अपने त्योहारों को सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, जिनमें से 43% इसे तैयार करने में घंटों खर्च करते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि त्योहार अब उत्सव कम, सोशल मीडिया की ‘पोस्ट’ ज्यादा बन गए हैं।

बात सिर्फ दीपावली या करवा चौथ तक सीमित नहीं है। नवरात्रि, जो कभी माँ दुर्गा की अराधना और आत्मिक शुद्धि का पवित्र समय था, अब थीम-आधारित गरबा नाइट्स, डिज़ाइनर डांडिया स्टिक्स और इंस्टाग्राम-परफेक्ट पलों की दौड़ में बदल चुकी है। एक अनुमान के अनुसार, 2024 में भारत में गरबा इवेंट्स का बाजार 5000 करोड़ रुपये से अधिक का हो चुका है। ये आंकड़े हमें यह सवाल उठाने पर मजबूर करते हैं कि क्या हमारी भक्ति अब बाजार की चमक-दमक में दब गई है? क्या हम मंदिर में माँ के चरणों में शीश झुकाने जाते हैं, या बस एक और वायरल रील की खोज में हैं?

यह बदलाव केवल सतह पर नहीं रुका; यह हमारे सामाजिक ताने-बाने को भीतर तक प्रभावित कर रहा है। पहले त्योहार रिश्तों में गर्माहट और अपनापन लाते थे; आज वे एक चमकदार प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुके हैं। सबसे शानदार पंडाल कौन सा? सबसे ट्रेंडी सजावट किसकी? किसकी दिवाली पार्टी में सबसे ज्यादा भीड़? यह होड़ न सिर्फ हमारी भावनाओं को दिखावे की चादर ओढ़ा रही है, बल्कि हमारी नई पीढ़ी को भी गलत राह दिखा रही है। बच्चे अब होली के रंगों का आध्यात्मिक मोल नहीं समझ रहे; उनकी नजर इस बात पर है कि कौन सा रंग कैमरे में ज्यादा चटक दिखेगा। 2022 के एक अध्ययन के मुताबिक, 10-14 साल के 56% बच्चे त्योहारों को “फोटो अपॉर्च्युनिटी” मानते हैं, न कि आध्यात्मिक अनुभव। यह बदलाव हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को जी रहे हैं, या उसे बस एक सोशल मीडिया पोस्ट में समेट रहे हैं?

यह सांस्कृतिक बदलाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामुदायिक स्तर पर भी गहरे निशान छोड़ रहा है। कभी गाँवों और मोहल्लों में त्योहार एक सामूहिक उल्लास का प्रतीक थे, जहाँ अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, बिना भेदभाव के एकसाथ झूमता था। आज, बड़े शहरों में ये त्योहार टिकटेड इवेंट्स में सिमट गए हैं, जहाँ प्रवेश के लिए मोटी रकम और स्टेटस की अनिवार्यता ने सामाजिक समरसता को किनारे कर दिया। मिसाल के तौर पर, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में प्रीमियम गरबा नाइट्स के टिकट 5000 रुपये से शुरू होते हैं। यह बदलाव एक कड़वा सवाल हमारे सामने रखता है—क्या हमारी संस्कृति अब केवल उन लोगों की बपौती बनकर रह गई है जो इसे “खरीद” सकते हैं?

इस चकाचौंध के बीच हमारी संस्कृति की आत्मा कहीं गुम होती जा रही है। संस्कृति कभी महज रस्मों, चमकदार लहंगों या लजीज व्यंजनों का नाम नहीं थी। वह थी वह जीवंत शक्ति, जो हमें हमारी जड़ों, हमारे मूल्यों और हमारी पहचान से जोड़ती थी। वह हमें सिखाती थी कि सच्ची खुशी सादगी में बसती है, कि भक्ति दिखावे का मुखौटा नहीं, दिल से उमड़ने वाला भाव है। मगर आज, जब पूजा की थाली का हर सामान ब्रांडेड हो गया है, और हर रस्म एक फोटोशूट का हिस्सा बन गई है, तो क्या हम उस आत्मा को सचमुच जी पा रहे हैं?

यह रुझान हमें एक खतरनाक दोराहे पर लाकर खड़ा कर रहा है। अगर हमने अपनी संस्कृति को महज प्रदर्शन बनने दिया, तो वह धीरे-धीरे खोखली हो जाएगी। हमारी अगली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ फ़िल्टर और फ्रेम्स मिलेंगे, न कि वह भावनात्मक गहराई जो हमें एक-दूसरे से जोड़ती है। संस्कृति कोई मंचीय नाटक नहीं, जिसे तालियों की गड़गड़ाहट के बाद भुला दिया जाए। यह वह अमूल्य धरोहर है, जो पीढ़ियों को एकसूत्र में बांधती है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती है।

हल यह नहीं कि हम सोशल मीडिया को त्याग दें या आधुनिकता से मुँह मोड़ लें। जरूरत है एक संतुलन की, जहाँ हम अपनी संस्कृति को फिर से उसका मूल स्वरूप लौटाएँ। हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि दीप जलाना केवल इंस्टाग्राम की पोस्ट नहीं, बल्कि भीतर के अंधेरे को उजाले से भरने का प्रतीक है। हमें समझाना होगा कि करवा चौथ का व्रत साड़ी और मेकअप की चमक से कहीं ज्यादा प्रेम और समर्पण की कहानी है। हमें अपने त्योहारों को फिर से जीवंत करना होगा—न कि उन्हें एक चमचमाते इवेंट में तब्दील होने देना होगा। आइए, अपनी संस्कृति को सिर्फ स्टेज पर नहीं, दिलों में उतारें, ताकि वह हमारी पहचान को पीढ़ियों तक संजोए रखे।

इसके लिए हमें अपने अंतर्मन में झांकना होगा। हमें खुद से सवाल करना होगा—क्या हम अपनी संस्कृति को सचमुच जी रहे हैं, या बस उसका एक चमकदार मुखौटा दुनिया को दिखा रहे हैं? हमें अपनी नई पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि त्योहारों का असली रस चकाचौंध और शोर-शराबे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए अनमोल पलों, भक्ति की गहराई और साझा हर्षोल्लास में छिपा है। हमें अपनी संस्कृति को कैमरे के लेंस से नहीं, बल्कि दिल की गर्माहट से देखना होगा।

अगर हम ऐसा नहीं करते, तो हमारी संस्कृति एक दिन म्यूजियम की शोभा बढ़ाने वाली वस्तु बनकर रह जाएगी—बाहर से चमकदार, लेकिन भीतर से निर्जन। अब हमें यह तय करना है कि हम अपनी संस्कृति को एक सतही प्रदर्शन बनने दें, या उसे उसकी मूल भावना के साथ जीवंत रखें। यह वक्त है अपनी जड़ों की ओर लौटने का, जहाँ त्योहार महज मंचन नहीं, बल्कि जीवन का उमंग भरा उत्सव थे। क्योंकि सच्ची संस्कृति वह नहीं जो केवल दिखती है; वह है जो दिल से जिया जाता है, जो पीढ़ियों को जोड़ता है, और जो हमें हमारी पहचान से बांधे रखता है।



प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)


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