Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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रिश्तों की खामोश दूरी

 

रिश्ते भी पौधों की तरह हैं — समय और प्यार से ही खिलते हैं

[अपनों के बिना हासिल सारी सफलताएँ अधूरी हैं]

[ऑनलाइन हम, पर अपनों से ऑफलाइन: रिश्तों की खामोश दूरी]



आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में एक सवाल बार-बार मन को कुरेदता है—क्या हम वाकई अपनों के लिए समय निकाल पाते हैं? यह सवाल साधारण-सा लगता है, मगर इसके जवाब में छिपी सच्चाई हमारे जीवन की स्याह हकीकत बयान करती है। हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां समय की कीमत अनमोल रत्नों से भी बढ़कर हो गई है। सुबह की शुरुआत मोबाइल के अलार्म से होती है, और रात स्क्रीन की नीली रोशनी में डूबकर ख़त्म। इस आपाधापी में हम उन रिश्तों को अनदेखा कर रहे हैं, जो कभी हमारी दुनिया का आधार थे। माता-पिता की मुस्कान, बच्चों की मासूम बातें, दोस्तों के साथ बेफिक्र लम्हे, या जीवनसाथी के साथ वो सुकून भरे खामोश पल—ये सब अब धीरे-धीरे हमारी प्राथमिकताओं से बाहर हो रहे हैं।

पहले वक्त था, जब परिवार का मतलब था—सबका एक साथ डाइनिंग टेबल पर बैठना, दिनभर की कहानियां बांटना, और हंसी-ठहाकों में समय का अहसास ही खो जाना। आज वही परिवार एक छत के नीचे रहकर भी अलग-अलग स्क्रीनों में बंटा हुआ है। माता-पिता टीवी के सामने, बच्चे हेडफ़ोन के साथ यूट्यूब में खोए, और हम सोशल मीडिया के अंतहीन भंवर में डूबे। हमारी उंगलियां स्क्रीन पर तो दौड़ती हैं, लेकिन अपनों के दिल की बात पढ़ने का वक्त गुम हो गया। हम ऑनलाइन हर पल मौजूद हैं, पर अपनों के लिए ‘ऑफलाइन’ हो चुके हैं।

हम अक्सर कहते हैं, “समय नहीं है।” लेकिन क्या यह सचमुच सच है? दिन के चौबीस घंटों में हम घंटों सोशल मीडिया पर भटकते हैं, नेटफ्लिक्स की दुनिया में खोए रहते हैं, व्हाट्सएप की चैट में उलझे रहते हैं, मगर मां से पांच मिनट की बातचीत के लिए वक्त नहीं निकलता। बच्चों के साथ हंसी-खेल की बात तो दूर, उनकी आंखों में झांककर यह पूछने का मौका नहीं मिलता कि उनका दिन कैसा गुजरा। रिश्ते अब ‘वीकेंड प्लान’ बनकर सिमट गए हैं, जिन्हें हम किसी प्रोजेक्ट की तरह ‘मैनेज’ करने की जद्दोजहद में लगे हैं। लेकिन रिश्ते कोई टू-डू लिस्ट नहीं, जिसे चेकमार्क लगाकर भुला दिया जाए। रिश्तों को जीना पड़ता है, संजोना पड़ता है, और इसके लिए दिल से समय देना पड़ता है।


आधुनिक जीवन ने हमें सुविधाओं का खजाना सौंपा है—तकनीक, अवसर, चमक-दमक। लेकिन इसके बदले उसने हमसे अपनापन छीन लिया। तकनीक ने वादा किया था कि वह हमें जोड़ेगी, मगर हकीकत में वह हमें भावनात्मक रूप से और दूर धकेल रही है। वर्क-फ्रॉम-होम ने घर को दफ्तर बना दिया, लेकिन घर का सुकून कहीं गुम हो गया। हम गैजेट्स से बतियाते हैं, पर सामने बैठे अपनों से दो शब्द बोलने का वक्त नहीं। सबसे दर्दनाक यह है कि यह दूरी हमें अब सामान्य लगने लगी है। पास रहकर भी अनदेखा करना हमारी आदत बन गई है।

यह अनदेखी सिर्फ रिश्तों तक नहीं रुकती; यह हमारे मन को भी खोखला कर रही है। आज अकेलापन, तनाव, और अवसाद आम बात हो गए हैं। मनोवैज्ञानिक अध्ययन चीख-चीखकर बताते हैं कि अपनों से जुड़ाव की कमी मानसिक स्वास्थ्य को तार-तार करती है। इंसान सामाजिक प्राणी है—उसे अपनों की गर्माहट चाहिए, किसी की फिक्र चाहिए, किसी का साथ चाहिए। जब यह अपनापन कम होता है, तो बाहर की दुनिया की सारी कामयाबियां—नौकरी में तरक्की, बैंक बैलेंस की बढ़ोतरी, या सोशल मीडिया पर लाइक्स की बौछार—सब उस खालीपन को भरने में नाकाम रहती हैं, जो अपनों की दूरी से पैदा होता है।

हम आज रिश्तों को ‘निभाने’ की बजाय ‘मैनेज’ करने की जुगत में लगे हैं। हर मुलाकात, हर बातचीत को एक ‘शेड्यूल’ में बांध दिया गया है। दोस्तों से मिलने के लिए गूगल कैलेंडर में स्लॉट बुक करना पड़ता है, माता-पिता से बात करने के लिए ‘टाइम स्लॉट’ तय करना पड़ता है। लेकिन रिश्ते कोई कॉरपोरेट मीटिंग नहीं, जो डायरी में नोट करके निपटाए जाएं। रिश्ते तब सांस लेते हैं, जब उनमें सहजता हो, जब उनमें दिल की गर्माहट और समय की नमी हो। रिश्ते उस पौधे की तरह हैं, जिसे वक्त, ध्यान और प्यार से सींचना पड़ता है। अगर उसे अनदेखा किया, तो वह धीरे-धीरे मुरझा जाता है। और जब वह सूख जाता है, तो बाद में लाख पछतावे कर लें, वो हरियाली लौटकर नहीं आती। 

सवाल समय की कमी का नहीं, सवाल हमारी प्राथमिकताओं का है। हम दिन-रात जिस ज़िंदगी को बेहतर बनाने की दौड़ में लगे हैं, उसका असली मकसद क्या है? अगर उस ज़िंदगी में अपनों की जगह ही नहीं, तो वह कितनी सार्थक है? करियर, पैसा, सपने—सब ज़रूरी हैं, मगर इनके बीच अपनों के लिए वक्त निकालना सबसे अनमोल है। क्योंकि जब ज़िंदगी का हिसाब लगाने का पल आएगा, तो हमें वो ईमेल, मीटिंग्स या डेडलाइंस नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए लम्हे याद आएंगे—वो हंसी, वो बातें, वो साथ।

अब वक्त है, इस भागदौड़ में ठहरकर सांस लेने का। हर दिन चंद पल अपनों के नाम करें। फोन को साइलेंट कर माता-पिता के साथ बैठें, उनके पुराने किस्सों में खो जाएं। बच्चों के साथ उनका पसंदीदा खेल खेलें, उनकी चमकती आंखों में दुनिया देखें। किसी दोस्त को बेवजह कॉल कर पुरानी यादें ताज़ा करें। ये छोटे-छोटे पल रिश्तों को सिर्फ़ जिंदा नहीं रखते, बल्कि हमारे भीतर के खालीपन को भरते हैं। तकनीक को गुलाम बनाएं, मगर उसे रिश्तों पर हावी न होने दें। असली आधुनिकता ‘कनेक्टेड’ होने में नहीं, अपनों से ‘जुड़े’ रहने में है।

ज़िंदगी की रफ्तार जब धीमी पड़ेगी, तो वही लोग याद आएंगे, जिनके लिए हमने वक्त चुराया था। तो आज, अभी, इस पल में किसी अपने को समय दें। एक कप चाय, एक बेपरवाह हंसी, एक दिल से दिल की बात—यही वो धागे हैं, जो रिश्तों की डोर को मज़बूत करते हैं। यही वो लम्हे हैं, जो ज़िंदगी को जीने लायक बनाते हैं। सच यही है—रिश्ते वक्त मांगते हैं, और वक्त देने से ही रिश्ते संवरते हैं।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)


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