प्रसंगवश – 09 अक्टूबर: हिंदी सिनेमा के युगपुरुष रवीन्द्र जैन की पुण्यतिथि
रामायण से सिनेमाघरों तक: रवीन्द्र जैन का संगीत और प्रेरणा
[अंधी आँखों से देखी दुनिया, संगीत से रोशन दिल – रवीन्द्र जैन]
एक ऐसी प्रज्ञा, जिसने अंधेरे को चुनौती दी और अपने संगीत की रोशनी से लाखों आत्माओं को प्रेम, भक्ति और प्रेरणा का आलोक प्रदान किया। एक ऐसी धुन, जो काल की सरहदों को पार कर, हर पीढ़ी के दिलों को एक सूत्र में बाँधती है, आज भी अपनी ताजगी से मंत्रमुग्ध करती है। यह है हिंदी सिनेमा के युगपुरुष, रवीन्द्र जैन की अविस्मरणीय गाथा—जिन्होंने अपनी साधना से भारतीय संस्कृति को सुरों की सौगंध में ढाला और जीवन को एक नया अर्थ दिया। उनकी पुण्यतिथि पर, हम श्रद्धा से नमन करते हैं उस अनमोल रत्न को, जिनका हर गीत एक संदेश, हर रचना एक दर्शन और हर धुन एक अमर काव्य है।
28 फरवरी 1944 को अलीगढ़, उत्तर प्रदेश में जन्मे रवीन्द्र जैन का जीवन चुनौतियों और सृजनात्मकता का अनुपम संगम था। जन्मजात नेत्रहीनता उनके लिए कभी रुकावट नहीं, बल्कि उनकी संवेदनशीलता का स्रोत बनी। उन्होंने दुनिया को आँखों से नहीं, मन की गहराइयों और आत्मा की संवेदनाओं से देखा। उनके पिता, पंडित इंद्रमणि जैन, आयुर्वेद और संस्कृत के विद्वान थे, और माता, किरण जैन, भक्ति व संगीत की साधिका। इस आध्यात्मिक परिवार की सांस्कृतिक जड़ों ने रवीन्द्र के भीतर वह बीज बोया, जो उनके संगीत में भक्ति, दर्शन और भारतीयता के रूप में खिल उठा।
बचपन से ही रवीन्द्र का मन तुलसीदास की चौपाइयों और भक्ति भजनों में रमता था। रामचरितमानस और पारिवारिक भक्ति परंपराएँ उनके प्रथम गुरु बनीं, जिन्होंने उनके सुरों को वह आध्यात्मिक गहराई दी, जो “मंगल भवन अमंगल हारी” जैसे भजनों में साकार हुई। यह भजन आज भी श्रोताओं के हृदय में भक्ति की ज्योत जलाता है। रवीन्द्र जैन केवल संगीतकार, गीतकार या गायक नहीं, बल्कि एक सच्चे साधक थे। उनका सफर 1972 में फिल्म सौदागर से शुरू हुआ, मगर चितचोर (1976), गीत गाता चल (1975), और नदिया के पार (1982) जैसी फिल्मों ने उनके संगीत को अमर बना दिया। उनकी धुनों में शास्त्रीय संगीत की गहराई और लोक संगीत की सरलता का ऐसा मेल था, जो विद्वानों को मोहित और आमजनों को रिझाता था।
चितचोर का गीत “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा” केवल एक गीत नहीं, बल्कि गाँव की माटी की सौंधी खुशबू, मासूम प्रेम और जीवन की सादगी का चित्रण था। रवीन्द्र ने इसमें न केवल धुन रची, बल्कि गीतकार के रूप में शब्दों को भी जीवंत किया। उनकी लेखनी में साहित्यिक सौंदर्य और दार्शनिक गहराई का अनूठा संगम था। अंजना (1969) का गीत “तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना” प्रेम की कोमलता को दार्शनिक गहराई के साथ पेश करता था। उनके गीतों में छंद, अलंकार और भावनाओं का ऐसा तालमेल था कि विद्वान उनकी काव्यात्मकता पर मुग्ध हो जाते और आम श्रोता उनकी सादगी से जुड़ जाता। रवीन्द्र जैन का संगीत केवल कानों को सुकून नहीं देता, बल्कि आत्मा को स्पर्श करता है।
रवीन्द्र जैन की आवाज़ उनके संगीत की तरह थी—गहरी, भक्ति-भाव से सराबोर और आत्मा को छू लेने वाली। “मंगल भवन अमंगल हारी” हो या राम तेरी गंगा मैली (1985) का “एक राधा एक मीरा”, उनकी गायकी भक्ति का ऐसा रंग बिखेरती थी कि श्रोता ईश्वर के करीब पहुँच जाता था। उनके लिए संगीत महज़ कला नहीं, बल्कि साधना थी—एक ऐसा माध्यम, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता था। रवीन्द्र जैन का संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, मूल्यों और संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज था। उनकी रचनाएँ प्रेम, भक्ति और मानवीय रिश्तों की गहराई को उजागर करती थीं। राम तेरी गंगा मैली का “सुन साहिबा सुन” प्रेम की पवित्रता और सादगी का ऐसा चित्रण था, जो आज भी दिलों में गूँजता है। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जो उनकी कला की गहराई का साक्षी है। उनकी धुनों में शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनियाँ और लोक संगीत की सहजता का अनूठा संगम था। नदिया के पार का “जोबनिया जोग ले गई रे” या गीत गाता चल का “श्याम अब तू जाने रे” जैसे गीत गाँव की चौपालों से लेकर शहरों के सिनेमाघरों तक, हर दिल को छू गए।
रवीन्द्र जैन ने न केवल सिनेमा, बल्कि टेलीविजन पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। रामानंद सागर के रामायण (1987) के लिए उनके भजनों— “मंगल भवन अमंगल हारी” और “रघुपति राघव राजा राम”—ने भारतीय टेलीविजन के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय रचा। इन भजनों ने घर-घर में रामायण को जीवंत किया और भक्ति संगीत को नया आयाम दिया। उनकी रचनाएँ केवल गीत नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था का प्रतीक बनीं। 9 अक्टूबर 2015 को रवीन्द्र जैन इस संसार से विदा ले गए, मगर उनकी रचनाएँ आज भी हर दिल में जीवित हैं। उन्होंने पीछे छोड़ा एक ऐसा अमर खजाना, जो केवल गीत और धुन नहीं, बल्कि जीवन को अर्थ और प्रेरणा देने वाली कला है। उनका संगीत हमें सिखाता है कि सच्ची कला सुनने की चीज़ नहीं, बल्कि जीवन को जीने और समझने का दर्शन है। उनकी साधना का संदेश स्पष्ट है—कठिनाइयाँ चाहे जितनी बड़ी हों, मन की दृष्टि और आत्मा की शक्ति उन्हें छोटा कर देती है।
रवीन्द्र जैन ने अपने सुरों से सिद्ध किया कि सच्ची कला सीमाओं को तोड़कर दिलों को जोड़ती है। उनकी रचनाएँ भारतीय संस्कृति, भक्ति और मानवीय मूल्यों का जीवंत प्रतीक हैं। रामायण के “मंगल भवन अमंगल हारी” से लेकर चितचोर के “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा” तक, उनके गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि भावनाओं और आस्था का सागर हैं। रवीन्द्र जैन का जीवन एक प्रेरणा है—एक मिसाल जो सिखाती है कि सच्चा समर्पण असंभव को संभव बना देता है। उनकी धुनें, गीत और आवाज़ आज भी हमें प्रेरित करते हैं, हमें जोड़ते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर, हम उनकी रचनाओं को ही नहीं, बल्कि उस साहस, भक्ति और सृजनशीलता को सलाम करते हैं, जिसने भारतीय संगीत को नया आयाम दिया। रवीन्द्र जैन सिर्फ़ संगीतकार नहीं, एक दृष्टिकोण थे—एक ऐसी रोशनी, जो आत्मा को प्रज्ज्वलित करती है और अंधेरे को उजाले से भर देती है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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