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राष्ट्र सुरक्षा का नवदर्शन

 

राष्ट्र सुरक्षा का नवदर्शन: अब प्रतिक्रिया नहींपूर्वप्रहार

[सुरक्षा का सप्तसंकल्प: ‘प्रहार’ से सशक्त होता भारत]

[आतंक के विरुद्ध राष्ट्र की संगठित चेतना: ‘प्रहार’ का उदय]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


भारत ने 23 फरवरी 2026 को अपनी पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति 'प्रहार' (PRAHAAR) के शुभारंभ के साथ सुरक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम उठाया है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी आठ पृष्ठों वाले इस नीति दस्तावेज में केवल दशकों से चले आ रहे आतंकवाद विरोधी प्रयासों का औपचारिकीकरण नहीं किया गया है, बल्कि भविष्य में उभरते खतरों—जैसे साइबर हमले, ड्रोन का दुरुपयोग, क्रिप्टोकरेंसी के जरिए वित्त पोषण, और डार्क वेब पर रेडिकलाइजेशन—से निपटने के लिए ठोस और निर्णायक रणनीतियाँ भी प्रस्तुत की गई हैं। नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आतंकवाद का न तो कोई धर्म है, न कोई जाति, न कोई राष्ट्रीयता और न ही कोई सभ्यता। यह एक कृत्य है, जिसे किसी भी वैचारिक या धार्मिक औचित्य के साथ सही नहीं ठहराया जा सकता।

केंद्र सरकार की यह नीति सामाजिक सद्भाव को बनाये रखते हुए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली दूरदर्शिता का प्रतीक है। 'प्रहार' शब्द का चयन स्वयं सरकार की अडिग इच्छाशक्ति और सक्रिय रणनीति की अभिव्यक्ति है। यह नीति केवल रक्षात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोएक्टिव और खुफ़िया-आधारित अभियान संचालित करने की दिशा में स्पष्ट संकेत देती है। यह नीति सात अडिग स्तंभों की उस संगठित शक्ति पर खड़ी है, जिन्हें ‘PRAHAAR’ के अक्षरों में इस तरह संहिताबद्ध किया गया है कि हर अक्षर स्वयं एक रणनीतिक संकल्प बन जाता है।

इनमें पहला है प्रिवेंशन—आतंकवादी हमलों की पूर्वानुमानित रोकथाम, जो पूरी तरह से खुफ़िया जानकारी और विश्लेषण पर आधारित होगी। दूसरा स्तंभ है रिस्पॉन्स—तेज़, संतुलित और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने की क्षमता। तीसरा स्तंभ है एग्रीगेटिंग कैपेसिटीज़—सरकारी आंतरिक क्षमताओं का समन्वय और एकीकृत उपयोग। चौथा है ह्यूमन राइट्स और रूल ऑफ़ लॉ—सभी ऑपरेशंस में मानवाधिकारों और कानूनी ढांचे का कड़ाई से पालन।

पांचवां स्तंभ है अटेन्यूएटिंग कंडीशन्स—वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ जिन्हें कम करके रेडिकलाइजेशन और आतंकवाद के बीजारोपण को रोका जा सके। छठा स्तंभ है अलाइनिंग इंटरनेशनल एफर्ट्स—वैश्विक सहयोग और साझेदारी के माध्यम से आतंकवादियों को वित्तीय संसाधनों, हथियारों की आपूर्ति और सुरक्षित पनाहगाहों से वंचित करना। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई और कूटनीतिक सक्रियता का स्पष्ट संकेत देता है। सातवां स्तंभ है रिकवरी और रिज़िलियंस—आतंकवादी घटनाओं से प्रभावित पीड़ितों की समुचित सहायता, समाज की सामूहिक मानसिक और सामाजिक मजबूती, तथा पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।

ये सातों स्तंभ सामूहिक रूप से भारत की जीरो टॉलरेंस नीति को एक व्यवस्थित, समग्र और बहुआयामी ढांचा प्रदान करते हैं। यह केवल सिद्धांतों का संकलन नहीं, बल्कि एक सुसंगठित और क्रियान्वयन-केन्द्रित रणनीति का आधार है। पारंपरिक और सीमित रिएक्टिव सोच की परिधि से बाहर निकलते हुए यह नीति अब प्रिवेंटिव, प्रोएक्टिव और फ्यूचर-प्रूफ दृष्टिकोण को आत्मसात करती है, जो बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की सुरक्षा प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ करता है।

जहाँ पहले आतंकवाद को मुख्यतः सीमा-पार गतिविधियों तक सीमित समझा जाता था, वहीं ‘प्रहार’ अब जल, थल और आकाश—तीनों आयामों में उभरते खतरों की व्यापक पहचान करता है। यह नीति सुरक्षा की पारंपरिक परिभाषा से आगे बढ़कर बहु-स्तरीय और सर्वांगीण दृष्टिकोण अपनाती है। इसमें बिजली, रेलवे, एविएशन, पोर्ट्स, डिफेंस, स्पेस और एटॉमिक एनर्जी जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक एवं सामरिक क्षेत्रों के लिए मल्टी-लेयर सुरक्षा प्रावधानों को सुदृढ़ रूप से शामिल किया गया है, ताकि राष्ट्रीय अवसंरचना किसी भी प्रकार की आतंकी या विघटनकारी गतिविधि से सुरक्षित रह सके। साइबर और ड्रोन युग में, जब दुश्मन अदृश्य, डिजिटल और तकनीकी रूप से अत्याधुनिक हो चुका है, सरकार ने क्रिमिनल हैकर्स, नेशन-स्टेट एक्टर्स, डार्क वेब नेटवर्क, क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से होने वाली फंडिंग तथा सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर कठोर और निर्णायक कार्रवाई का स्पष्ट संकल्प व्यक्त किया है।

‘प्रहार’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका समावेशी और सहभागी दृष्टिकोण है। यह नीति आतंकवाद को केवल सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं मानती, बल्कि पूरे समाज को सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करती है। स्कूल, कॉलेज, मीडिया संस्थान, सामुदायिक नेतृत्व और जागरूक नागरिक—सभी को रेडिकलाइजेशन की रोकथाम और सामाजिक समरसता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। नीति में स्पष्ट किया गया है कि अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठनों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी, किंतु किसी भी समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराने की प्रवृत्ति को स्थान नहीं दिया जाएगा। यह संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण सुरक्षा की कठोरता तथा सामाजिक सौहार्द—दोनों के बीच सार्थक सामंजस्य स्थापित करता है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत अब आतंकवाद की स्पष्ट और सर्वमान्य परिभाषा, पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा तथा प्रभावी वैश्विक सहयोग के पक्ष में दृढ़ और सशक्त आवाज उठाएगा। यह नीति भारत की दशकों पुरानी, अनुभव-सिद्ध आतंकवाद विरोधी लड़ाई को न केवल संरचित और दस्तावेजीकृत स्वरूप देती है, बल्कि उसे निरंतर विकसित और अद्यतन रखने की दिशा भी सुनिश्चित करती है। सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल रक्षात्मक रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि आवश्यक होने पर निर्णायक और प्रभावी प्रहार करने की क्षमता तथा अटूट इच्छाशक्ति भी रखती है। साइबर और ड्रोन जैसे उभरते खतरों पर विशेष फोकस, खुफ़िया-आधारित रोकथाम की सुदृढ़ व्यवस्था, तथा ‘होल-ऑफ-सोसाइटी’ दृष्टिकोण भारत को 21वीं सदी के जटिल और बहुआयामी आतंकवाद के विरुद्ध अधिक सशक्त और सक्षम बनाते हैं।

‘प्रहार’ नीति एक स्पष्ट और ठोस संदेश देती है—भारत अब केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं करेगा, बल्कि संभावित खतरों का पूर्वानुमान लगाकर समय रहते निर्णायक कार्रवाई करेगा। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, परंतु उसके विरुद्ध भारत की लड़ाई अब अधिक एकजुट, बुद्धिमत्तापूर्ण, रणनीतिक और अडिग होगी। केंद्र सरकार की यह पहल राष्ट्रीय सुरक्षा को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का संकल्प प्रदर्शित करती है और भारत को वैश्विक स्तर पर आतंकवाद-रोधी रणनीतियों में अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होती है। यह नीति भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए एक मजबूत, दूरदर्शी, समग्र और दीर्घकालिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com


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