पर्यावरणविद सालुमरदा थिमक्का का निधन
थिमक्का: मानव काया में छिपी एक प्राचीन वटवृक्ष-देवी
[जन्म से नहीं, कर्म से माँ—थिमक्का की हरियाली-दृष्टि]
[थिमक्का़—धरती की हरित माँ का अवसान, चेतना का पुनर्जागरण]
कभी-कभी इतिहास किसी साधारण व्यक्ति को चुनकर उसे असाधारण बना देता है। वह न अपने लिए पहचान माँगता है, न सम्मान की भूख रखता है—वह केवल कर्म करता है, और उसका कर्म ही उसकी अनश्वर पहचान बन जाता है। सालुमरदा थिमक्का, भारत की महान पर्यावरणसेवी, ऐसी ही एक स्त्री थीं। 14 नवंबर को, जब सावलुमारदा थिमक्का की सांसें थम गईं, तो केवल एक पर्यावरणविद की मृत्यु नहीं, बल्कि प्रकृति-पूजा की एक परंपरा का विराम है। दुनिया ने खोया नहीं—उन्होंने पाया। पाया एक ऐसी विरासत, जो पत्तों की सरसराहट में चेतना का पुनर्जागरण गाती है। 114 वर्ष की यह वृद्धा, जिसे 'वृक्षमाता' कहा जाता है, न मरी—बल्कि पेड़ों की शाखाओं में विलीन हो गईं। उनका जाना एक अंत नहीं, बल्कि हर हरी डाल पर उभरता एक नया संकल्प है: प्रकृति की ममता कभी मिटती नहीं, वह बस रूप बदल लेती है।
थिमक्का़ का जीवन किसी पुस्तकालय की किताबों से नहीं, बल्कि धरती की धूल, धूप और हवा से लिखा गया था। वे गरीब थीं, पर मन से अमीर। एक साधारण स्त्री, हाथों में मिट्टी का कण, आंखों में अनंत हरियाली का सपना, और सीने में संतानहीनता का दर्द। लेकिन वह दर्द न मिटाया, बल्कि पेड़ों की जड़ों में उतार दिया। उन्होंने कभी स्कूल की चौखट नहीं देखी, पर प्रकृति की किताब उनसे ज्यादा किसी ने नहीं पढ़ी। जब समाज उन्हें “निसंतान” कहकर कटाक्ष करता था, तभी उन्होंने वह फैसला किया जिसने उन्हें अमर कर दिया—उन्होंने पेड़ों को अपने बच्चे मान लिया। वे अकसर कहा करती थीं, “मेरे बच्चे छाया देंगे, इसलिए वे मुझसे अधिक जीएँगे।”
थिमक्का का जन्म 30 जून 1911 को हुआ था—तुमकुर जिले के गुम्मी गांव में, एक गरीब परिवार की कोख से। कोई स्कूल की घंटी न सुनी, कोई किताब का स्पर्श न किया। बचपन से ही खदानों में मजदूरी, भेड़-बकरियों को चराना—जीवन की धूल और धूप ही उनकी पहली गुरु बनीं। शादी चिक्का मुद्दप्पा से हुई, एक रेलवे मजदूर से। लेकिन संतान का सुख न मिला। समाज के कटाक्ष चुभते, ताने काटते। “निसंतान,” वे चिल्लाते। लेकिन थिमक्का ने आंसू नहीं बहाए—उन्होंने बीज बोए। 1940 के दशक में शुरू हुई यह यात्रा, एक मां की पुकार थी। पति के साथ मिलकर, हुलिकल से कुडुर तक फैली 4.5 किलोमीटर लंबी सड़क पर बरगद के 385 पेड़ लगाए। हर पौधा एक शिशु, हर पानी की बूंद एक दूध की धारा। वे रविवारों को, जब दुनिया सोती, पैदल 4-5 किलोमीटर चलकर पानी ढोतीं। तपती कर्नाटक की धूप में खड़ी होकर मिट्टी सींचतीं, जैसे कोई देवी अपनी संतानों को जीवन का आशीर्वाद दे रही हो।
और संख्या? वह तो सिर्फ आंकड़े हैं। वास्तव में, थिमक्का ने 8,000 से अधिक पेड़ लगाए—नीम, नीलगिरी, शीशम, आकेशिया। हर एक ने मिट्टी को बांधा, हवा को शुद्ध किया, पक्षियों को आश्रय दिया। उनके 'सावलुमाराडा'—कन्नड़ में 'पेड़ों की पंक्ति'—आज भी रामनगर जिले की उस सड़क पर खड़े हैं, यात्रियों को ठंडी छांव देते, माइक्रोक्लाइमेट को संतुलित रखते। शोध बताते हैं कि इन पेड़ों ने मिट्टी कटाव रोका, वर्षा पैटर्न सुधारा, जैव-विविधता बढ़ाई। कीटों का घर, छोटे जीवों का आश्रम—यह सब थिमक्का की ममता का फल है। 1991 में पति के निधन के बाद भी वे न रुकीं। 2020 में हिप सर्जरी, अक्टूबर 2023 से गंभीर अस्थमा—फिर भी, 111वीं जयंती पर, 30 जून 2022 को, डॉ. बी.आर. अंबेडकर भवन में मुस्कुराईं। उनका जीवन कोई साधारण कथा नहीं—एक यज्ञ था, जहां आहुति थी मेहनत, और प्रसाद था हरियाली।
यह मेहनत व्यर्थ न गई। पुरस्कार बरसे जैसे वर्षा। 2019 में पद्मश्री—भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान। नेशनल ग्रीन आर्मी अवॉर्ड, वनमित्र अवॉर्ड, बार्ट ब्रूंस अवॉर्ड, ग्रीनिस्ट आइकन अवॉर्ड। 2016 में बीबीसी ने दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में गिना। 1999 में डॉक्यूमेंटरी 'तिम्मक्का मठु 284 मक्कालु' बनी, जो अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में चमकी। जब उनसे सम्मान और पुरस्कारों के बारे में पूछा जाता था, तो वे सरलता से कहती थीं—“पेड़ सबसे बड़ा पुरस्कार हैं।” ऐसी विनम्रता आज के दौर में दुर्लभ है, जहाँ लोग छोटे कामों का भी ढोल पीटते हैं।
जब सड़क चौड़ीकरण की योजना बनी, 100 वर्ष की उम्र में वे लड़ीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से मिलीं, गुहार लगाई। योजना रद्द। यह जीत सिर्फ पेड़ों की नहीं—पर्यावरण के अधिकार की थी। कर्नाटक सरकार ने उनके नाम पर थिमक्का फाउंडेशन बनाया, जो ग्रामीण महिलाओं को जागरूक करता है। एक बच्ची, जो कूड़े में खेलती थी, आज वन रक्षक बनी। एक किसान, रसायनों का गुलाम, जैविक खेती का स्वामी। ये बदलाव थिमक्का की देन हैं—छोटी कोशिशों से उपजी क्रांति।
थिमक्का़ का जाना उस समय हुआ है, जब भारत जलवायु संकट की चपेट में है—समुद्र पीछे हट रहे, तापमान चढ़ रहा, जंगल सिकुड़ रहे, प्रदूषण सांसें लूट रहा— ऐसे समय में थिमक्का़ का जीवन हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की रक्षा केवल नीतियों का विषय नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी है। वनों की कमी से शहर बेजान सांस ले रहे, ग्लोबल वार्मिंग ग्लेशियर निगल रही। ऐसे में, उनकी सोच चमकती है: पर्यावरण कोई 'उत्तरदायित्व' नहीं, 'ममता' है। “पेड़ को बच्चा समझो,” वे कहतीं, “वह खुद-ब-खुद बड़ा हो जाएगा।” यह सरल वाक्य क्लाइमेट एक्शन के जटिल सिद्धांतों से कहीं ज्यादा शक्तिशाली। उनके पेड़ों ने साबित किया—एक व्यक्ति शहरी नियोजन बदल सकता है, नीतियां प्रभावित कर सकता है। लेकिन अब सवाल यह: हम क्या करेंगे? थिमक्का का निधन श्रद्धांजलि के शब्दों तक सीमित न रहे। हमें तीन महान सीखें ग्रहण करनी होंगी— पहली, पर्यावरण संरक्षण जीवनशैली है—विशेष दिनों का उत्सव नहीं। प्लास्टिक छोड़ो, पानी बचाओ, हर सांस में प्रकृति को याद करो। दूसरी, बड़े प्रोजेक्ट्स नहीं, छोटी-छोटी लगातार कोशिशें चमत्कार रचती हैं। एक पौधा रोज, एक आदत बदली हर हफ्ते। तीसरी, संकल्प हो तो गरीबी बाधा नहीं बनती।
उनके अंतिम दिनों में, जब बीमारी ने जकड़ लिया, वे बुदबुदाईं: “मुझे दफनाओ मत, पेड़ों के बीच रख दो।” ऐसा ही हुआ। हुलिकल के उन विशाल बरगदों तले, उनकी विदाई एक उत्सव बनी। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कहा, “वृक्षमाता के जाने से राज्य गरीब हो गया, लेकिन उनका प्रेम अमर रहेगा।” तथ्य यही कहते हैं—उनके पेड़ आज भी हवा को ठंडा करते, धरती को संवारते, जीवन को सहलाते। थिमक्का साधारण थीं, लेकिन उन्होंने धरती को मां की तरह अपनाया—और स्वयं 'धरती की हरित मां' बन गईं।
थिमक्का अशिक्षित थीं, संसाधन-रहित, फिर भी उन्होंने धरती को मां की तरह सींचा। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में 'थिमक्का पथ' बनाए—एक मार्ग जहां पेड़ खड़े हों, जीवन फले-फूले, आशा सांस ले। स्कूलों में उनकी कथा अध्याय बने, ताकि बच्चे जानें: प्रेरणा कर्म से जन्म लेती है, किताबों से नहीं। सरकारें हर शहर में 'थिमक्का ग्रीन जोन' गढ़ें—हरियाली के किले, जहां उनका नाम मिट्टी में घुलकर भी अमर रहे। थिमक्का फाउंडेशन को मजबूत करें, ग्रामीण महिलाओं को योद्धा बनाएं। क्योंकि जलवायु संकट व्यक्तिगत जिम्मेदारी मांगता है—हमारे बहाने अब न चले।
उनकी स्मृति में सबसे सार्थक दान? एक पेड़ लगाओ—ऐसा, जिसकी छांव किसी अनजान राहगीर को मिले। क्योंकि उनकी असली विरासत पुरस्कारों में नहीं, न बातों और लेखों में—वह हरित सांस है, जो उनके लगाए पेड़ों की पत्तियों से बहती है। थिमक्का चली गईं, लेकिन उनकी चेतना जाग रही है—हर बीज में, हर कलि में। आओ, इस पुनर्जागरण का हिस्सा बनें। प्रकृति पुकार रही है: मां बनो, योद्धा बनो, अमर बनो।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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