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पैरोल के पर्दे में दबा न्याय और टूटता भरोसा

 

आस्था के साए में अपराध: पैरोल ने फिर जगाए विवाद

[पैरोल के पर्दे में दबा न्याय और टूटता भरोसा]

[सजा के बाद भी बार-बार राहत: लोकतंत्र की कसौटी पर सवाल]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


क्या न्याय सचमुच अंधा है, या वह अब प्रभाव, संख्या और आस्था को पहचानने लगा है। यह प्रश्न तब और तीखा हो उठा, जब डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर (15वीं बार) 40 दिनों की पैरोल (फरलो) पर जेल से बाहर आने की अनुमति दी गई। यह केवल एक सजायाफ्ता व्यक्ति की अस्थायी रिहाई नहीं, बल्कि कानून की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक नैतिकता पर सीधा प्रहार था। जब गंभीर अपराधों में दोष सिद्ध होने के बावजूद बार-बार राहत दी जाती है, तो समाज के भीतर यह संदेह गहराना स्वाभाविक है कि क्या न्याय वास्तव में सबके लिए समान है। यही बेचैन करने वाली शंका पूरे घटनाक्रम के केंद्र में खड़ी होकर नागरिक चेतना को भीतर तक झकझोर देती है। 

राम रहीम का नाम वर्षों से अपराध, आस्था और प्रभाव के विचित्र संगम का प्रतीक बन चुका है। महिलाओं के साथ हुए जघन्य अपराधों और एक निर्भीक पत्रकार की हत्या ने देश को भीतर तक हिला दिया था। न्यायालय द्वारा दी गई कठोर सजाओं से यह आशा जगी थी कि धर्म की आड़ में छिपे अपराधों पर अब कोई समझौता नहीं होगा। परंतु समय बीतने के साथ बार-बार मिली पैरोल ने उस भरोसे को कमजोर किया। स्वयं को आध्यात्मिक मार्गदर्शक बताने वाला व्यक्ति जब लगातार जेल से बाहर आता है, तो धर्म और अपराध के बीच खींची गई रेखा धुंधली पड़ने लगती है।

पैरोल का सिद्धांत मानवीयता और सुधार से जुड़ा होता है। इसका उद्देश्य कैदी को समाज से जोड़े रखना और उसे आत्ममंथन का अवसर देना है। लेकिन राम रहीम के मामले में पैरोल एक अपवाद नहीं, बल्कि नियमित प्रक्रिया जैसी प्रतीत होने लगी है। सजा के सीमित वर्षों में कई बार बाहर आना और लंबा समय जेल से बाहर बिताना सामान्य कैदियों की स्थिति से बिल्कुल अलग है। यह प्रश्न उठता है कि नियमों की व्याख्या इतनी उदार क्यों है। जब राहत बार-बार और समय विशेष पर मिलती दिखे, तो कानून की मंशा पर संदेह होना स्वाभाविक है।

न्याय की कसौटी पर यह स्थिति अत्यंत विचलित करने वाली है। एक ओर ऐसे लोग हैं, जिन पर आरोप अभी सिद्ध भी नहीं हुए, फिर भी वे वर्षों से कारावास झेल रहे हैं। दूसरी ओर सिद्ध अपराध के बावजूद बार-बार पैरोल दी जा रही है। यह विरोधाभास व्यवस्था के दोहरे मापदंड को साफ उजागर करता है। विशेषज्ञों के अनुसार नियमों की अस्पष्टता और प्रशासनिक विवेक की अत्यधिक छूट ने इस असमानता को जन्म दिया है। जब निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रहती, तब न्याय कागज़ों तक सिमट जाता है और जनता का भरोसा धीरे-धीरे दरकने लगता है।

इस पूरे घटनाक्रम में सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। बड़े अनुयायी समूह अपने आप में शक्ति बन जाते हैं। यही शक्ति कई बार निर्णयों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव का कारण बनती है। धर्मस्थलों और धार्मिक व्यक्तित्वों का सामाजिक प्रभाव नई बात नहीं है, लेकिन जब इसका उपयोग कानून को नरम करने के लिए होने लगे, तो खतरा बढ़ जाता है। आस्था जब संगठित समर्थन में बदल जाती है, तो न्याय कमजोर पड़ने लगता है। यह प्रवृत्ति केवल एक मामले तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक लोकतांत्रिक चुनौती का संकेत है।

धार्मिक पहलू इस विवाद को और अधिक संवेदनशील बना देता है। जब आस्था विवेक पर भारी पड़ती है, तब प्रश्न पूछने की क्षमता क्षीण हो जाती है और अंधभक्ति हावी होने लगती है। पैरोल के दौरान होने वाली गतिविधियां अनुयायियों में उत्साह और भरोसा भरती हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए वही क्षण गहरी पीड़ा का कारण बनते हैं। उनके लिए हर रिहाई न्याय के पुराने घावों को फिर से हरा कर देती है। धर्म का उद्देश्य नैतिक उत्थान और करुणा है, न कि अपराधों के लिए ढाल बनना। जब आस्था का उपयोग संरक्षण के लिए होता है, तो समाज में गलत संदेश जाता है।

न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर इसका प्रभाव अत्यंत गहरा और दूरगामी है। जब आम नागरिक यह देखता है कि प्रभावशाली नामों के लिए कानून के द्वार सहजता से खुल जाते हैं, तो न्याय के प्रति सम्मान स्वतः कमजोर पड़ने लगता है। सार्वजनिक विमर्श में दिखाई देने वाला आक्रोश केवल क्षणिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भीतर तक जमी निराशा की अभिव्यक्ति है। लोग इसे सुविधा और प्रभाव से संचालित न्याय कहने लगे हैं। जब निर्णयों पर स्पष्ट, पारदर्शी और ठोस उत्तर नहीं मिलते, तब यह मौन अविश्वास को जन्म देता है। यदि समय रहते विश्वास बहाल नहीं किया गया, तो यह दरार स्थायी बनकर न्याय व्यवस्था की नींव को ही कमजोर कर देगी।

सबसे गहरी पीड़ा पीड़ितों की है, जिनकी आवाज अक्सर भीड़ और शोर में दबकर रह जाती है। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े प्रश्न केवल कानून तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना की भी परीक्षा हैं। जब दोष सिद्ध होने के बाद भी कठोरता नहीं दिखाई जाती, तो यह संदेश जाता है कि शक्ति ढाल बन सकती है। ऐसी सोच समाज को भीतर से कमजोर करती है, क्योंकि इससे अपराध सामान्य और न्याय सापेक्ष हो जाता है। कोई भी व्यवस्था तब तक मानवीय नहीं कही जा सकती, जब तक वह सबसे कमजोर के साथ समान और संवेदनशील व्यवहार न करे।

राम रहीम की पैरोल का मुद्दा किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह धर्म, प्रभाव और कानून के उस खतरनाक मेल को उजागर करता है, जहां सीमाएं लगभग मिटती जा रही हैं। यहां सुधार केवल नियम बदलने से नहीं आएगा, बल्कि सोच और प्राथमिकताओं में मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है। पारदर्शी मापदंड, कानून का समान अनुप्रयोग और स्पष्ट सार्वजनिक जवाबदेही ही टूटते विश्वास को जोड़ सकते हैं। अब समय आ गया है कि व्यवस्था आत्मपरीक्षण करे, क्योंकि जब न्याय से समझौता होता है, तो लोकतंत्र की नींव डगमगाने लगती है।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

संपर्क: 94251 23883


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