काशी के घाटों की अनंत धुन: पंडित छन्नूलाल मिश्र को श्रद्धांजलि
[एक युग का अंत, अनंत स्वरलहरियाँ: पंडित छन्नूलाल मिश्र]
[अनंत स्वरांजलि: काशी की मिट्टी से विश्व मंच तक]
जब गंगा के तट पर सूरज की पहली किरणें काशी के घाटों को चूमती हैं, तो वहाँ की हवा में एक अलौकिक धुन गूंज उठती है—सदियों की साधना और परंपरा से सनी, आत्मा को झंकृत करने वाली वह धुन। यह धुन नदी की लहरों से नहीं, बल्कि एक ऐसे साधक की आवाज़ से जन्मती थी, जिसने शास्त्रीय संगीत को भारत की सांस्कृतिक आत्मा का पर्याय बना दिया। आज, जब यह स्वरलहरी सदा के लिए शांत हो गई, तो समूचा देश शोक में डूबा है। पद्मविभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र जी का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि काशी की मिट्टी से उपजी शास्त्रीय संगीत की उस अनमोल धरोहर का अवसान है। 2 अक्टूबर को, 89 वर्ष की आयु में मिर्ज़ापुर में अपनी पुत्री के आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। एक युग का अंत हुआ, पर उनकी स्वरलहरियाँ अनंत काल तक गूंजेंगी, हमें याद दिलाती रहेंगी कि सच्चा संगीत अमर होता है।
3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ के हरिहरपुर गाँव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे पंडित छन्नूलाल मिश्र का संगीत से रिश्ता बचपन से ही गहरा था। उनके पिता, पंडित बद्री प्रसाद मिश्र, एक कुशल गायक थे, जिन्होंने उन्हें संगीत की प्रारंभिक दीक्षा दी। लेकिन उनकी साधना तब साकार हुई, जब वे किरणा घराने के उस्ताद अब्दुल घनी खान के शिष्य बने। उस्ताद की कठिन तालीम ने उनकी खयाल गायकी को अटल आधार दिया, जो उनकी अनूठी शैली का मूल बना। बाद में, ठाकुर जयदेव सिंह जैसे गुरुओं के मार्गदर्शन में उन्होंने पंजाब, पूर्वांचल और गया घरानों की शैलियों को आत्मसात किया। उनकी गायकी में बनारसी ठुमरी की मिठास, खयाल की गहराई और भजन की भक्ति का अनोखा संगम था। काशी की गलियों और गंगा की लहरों से प्रेरित उनकी आवाज़ में वह ठहराव था, जो सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता।
पंडित जी की गायकी मंचों तक सीमित नहीं रही; उन्होंने शास्त्रीय संगीत को जन-जन का बनाया। ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और होरी जैसी विधाओं में पूर्वांचल की मिट्टी की सोंधी महक थी। तुलसीदास की रामचरितमानस और कबीर के दोहों को उनकी बनारसी शैली ने आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनकी राग दरबारी में ठुमरी हो या कजरी में बरसती बूंदों-सी स्वरलहरियाँ, हर रचना ने संगीत प्रेमियों को बाँधा और शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में क्रांति ला दी। उनकी आवाज़ में गंगा-यमुना का मिलन था—उदासी और आनंद का अद्भुत संतुलन। पंडित छन्नूलाल मिश्र का जाना एक युग का अंत है, पर उनकी धुनें काशी के घाटों पर, गंगा की लहरों में, और संगीत प्रेमियों के हृदय में सदा गूंजती रहेंगी।
पंडित छन्नूलाल मिश्र का योगदान केवल गायकी तक नहीं सिमटा; उन्होंने भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर अमर कर दिया। 1960 के दशक से अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के मंचों पर उनकी खयाल और ठुमरी की गूंज ने न केवल संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि भारतीय दर्शन को भी पश्चिमी दुनिया के सामने उजागर किया। उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन नहीं, आत्म-साक्षात्कार का मार्ग था। इस प्रयास ने शास्त्रीय संगीत को वैश्विक पहचान दी। देश में भी उनका प्रभाव असीम था। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय सहित कई संस्थानों में उन्होंने शिष्यों को प्रशिक्षित कर किरणा घराने की परंपरा को जीवंत रखा। उनके पुत्र, तबला वादक रामकुमार मिश्र, इस विरासत के सच्चे वारिस हैं। पंडित जी ने संगीत को लिंग और वर्ग की सीमाओं से मुक्त कर महिलाओं व युवाओं को प्रेरित किया। ग्रामीण संगीत शिविरों के ज़रिए किसानों के बच्चों को राग-तान सिखाकर उन्होंने भारतीय संस्कृति की समावेशिता को सशक्त किया।
उनके सम्मानों की सूची उनकी साधना का साक्षी है। 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में पद्मभूषण, और 2020 में पद्मविभूषण जैसे अलंकरण उनके योगदान के प्रतीक हैं। उत्तर प्रदेश के यश भारती, नौशाद पुरस्कार, सुर सिंगर संसद का शिरोमणि सम्मान और बिहार का संगीत शिरोमणि पुरस्कार उनकी महानता के गवाह हैं। फिर भी, पंडित जी के लिए ये सम्मान जिम्मेदारी थे, न कि गर्व का कारण। वे कहते थे, “संगीत पुरस्कार नहीं, आत्मा की पुकार माँगता है।” उनकी यह विनम्रता उन्हें सच्चा साधक बनाती थी।
पंडित छन्नूलाल मिश्र का जाना काशी के घाटों की उस स्वर-साधना का शांत होना है, जिसमें गंगा का प्रवाह, काशी की मिट्टी और राम का नाम बसा था। वे कहते थे, “संगीत सीखना आसान है, उसे जीना कठिन।” यह उक्ति हमें उनकी विरासत संजोने की प्रेरणा देती है। शास्त्रीय संगीत को युवाओं तक पहुँचाना, घरानों की परंपरा को जीवित रखना और भारतीय संस्कृति को विश्व में स्थापित करना अब हमारा दायित्व है। उनकी स्वरलहरियाँ गंगा-सी अनंत बहती रहेंगी, काशी के घाटों पर गूंजती रहेंगी। पंडित जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, संकल्प लें कि उनकी साधना को जीवित रखेंगे, क्योंकि उनकी धुनें हमारी आत्मा में सदा गूंजेंगी।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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