पाकिस्तान 2025: संवैधानिक संशोधन या सैन्य क्रांति की शुरुआत?
[मुनिर को संवैधानिक मुकुट, पाकिस्तान को खाकी कफन]
[पाकिस्तान का काला संशोधन: मुनिर को अमर शक्ति, लोकतंत्र को दफन]
पाकिस्तान की संसद ने ऐसा संवैधानिक संशोधन पारित कर दिया है, जिसने देश की सैन्य शक्ति-संरचना और न्यायिक संतुलन को लगभग पूरी तरह नया अर्थ दे दिया है। अनुच्छेद 243 में संशोधन कर 27 नवंबर 2025 से चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (CJCSC) का पद समाप्त कर सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनिर को ‘चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस’ (CDF) का सर्वोच्च पद सौंपा गया, जो थल, जल और वायु—तीनों सेनाओं पर पूर्ण नियंत्रण रखेगा। मुनिर को आजीवन फील्ड मार्शल (पांच सितारा) रैंक, सम्मान और विशेषाधिकार के साथ-साथ अनुच्छेद 248 के तहत राष्ट्रपति जैसी कानूनी छूट दी गई है, जिसके तहत कोई अदालत—पद पर हों या सेवानिवृत्त—उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती। इन विशेषाधिकारों को हटाने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी—एक ऐसी बाधा, जो मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में लगभग अजेय है। मुनिर का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाकर इस संशोधन ने सैन्य प्रभुत्व को संवैधानिक ढाल प्रदान कर दी है।
पाकिस्तान की संसद ने 27वें संवैधानिक संशोधन को ऐसी तीव्र गति से पारित किया कि विपक्ष को विचार-विमर्श का कोई अवसर ही नहीं मिला। 11 नवंबर 2025 को ऊपरी सदन (सिनेट) में यह बिल 64-0 के एकतरफा मत से स्वीकृत हुआ, जबकि निचले सदन (नेशनल असेंबली) में महज चार सांसदों ने इसका विरोध किया। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के सदस्यों ने बिल की प्रतियां फाड़कर और वॉकआउट करके विरोध जताया, किंतु यह प्रयास केवल प्रतीकात्मक रह गया। इस संशोधन का सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू न्यायपालिका पर इसका सीधा हमला है—वही आधार-स्तंभ, जो किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होता है। संविधान के अनुच्छेद 243 में संशोधन कर एक नई ‘फेडरल कांस्टीट्यूशनल कोर्ट’ (एफसीसी) की स्थापना की गई है, जो सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर होगी और संवैधानिक मामलों पर सर्वोच्च अधिकार रखेगी। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस अदालत के जजों की नियुक्ति प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति करेंगे, वह भी बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया, किसी सुनवाई, किसी स्वतंत्र आयोग—कुछ भी नहीं।
संवैधानिक विवाद, संघ और प्रांतों के झगड़े, कानूनों की वैधता, और सलाहकारी राय—सब कुछ अब एफसीसी तय करेगी। सुप्रीम कोर्ट को एक “अपीलीय अदालत” जितना सीमित कर दिया गया है—जहाँ वह केवल नागरिक और आपराधिक मामलों की समीक्षा भर कर सकेगी। इसके अलावा, एफसीसी को उच्च राजद्रोह के मामलों को मान्य करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। आलोचकों की नज़र में यह स्पष्ट संकेत है कि सैन्य प्रतिष्ठान के खिलाफ जवाबदेही के रास्ते को व्यवस्थित रूप से बंद किया जा रहा है—ताकि सत्ता के असली धागे जिन हाथों में हैं, वे हाथ कभी कटघरे में न खड़े हों। संवैधानिक विशेषज्ञों ने इसे न्यायिक मौत" और "सैन्य सर्वोच्चता" कहा है। ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान (एचआरसीपी) ने तो इसे साफ-साफ “लोकतंत्र का अंतिम संस्कार” घोषित किया है। यह संशोधन सिर्फ एक कानूनी परिवर्तन नहीं; यह पाकिस्तान के लोकतांत्रिक ढाँचे की जड़ों में डाली गई दरार है, जिसकी गूँज आने वाले वर्षों में और भी गहरी सुनाई देगी।
पाकिस्तान का इतिहास सत्ता पर सैन्य छायाओं से इतना घिरा रहा है कि लोकतंत्र वहाँ हमेशा एक अधखुली खिड़की की तरह रहा—कभी खुलने की कोशिश करता, तो कभी किसी ताकतवर हाथ द्वारा फिर से बंद कर दिया जाता। 1947 की आज़ादी से लेकर आज तक के लगभग 78 वर्षों में से आधे से भी अधिक समय देश सीधे सैन्य शासन के पंजों में रहा। अयूब ख़ान, याह्या ख़ान, ज़िया-उल-हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़—इन जनरलों की दास्तानें पाकिस्तान की सत्ता-कहानियों में किसी अध्याय की तरह नहीं, बल्कि पूरी किताबों की तरह फैली हुई हैं। मुशर्रफ के पतन (2008) के बाद ऐसा लगा कि पाकिस्तान आखिरकार नागरिक शासन की तरफ़ लौट रहा है— जहां चुनी हुई सरकारें सत्ता में रहीं, भले ही सेना पर्दे के पीछे तार हिलाती रही। लेकिन यह संशोधन उस संतुलन को तोड़ देता है।
सरकार का तर्क है कि अनुच्छेद 243 में बदलाव केवल “प्रक्रियागत स्पष्टता” और “प्रशासनिक संरचना के पुनर्गठन” के लिए हैं, और सेना प्रमुख को एक “राष्ट्रीय नायक” की उपाधि मिलनी चाहिए। पीपीपी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने इसे “युद्ध की स्थिति” में आवश्यक बताया, लेकिन उनके ये शब्द आलोचकों को और भी बेचैन करते हैं—क्योंकि उनके अनुसार यह कदम युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि सैन्य प्रभुत्व को स्थायी वैधता प्रदान करने की कोशिश है। जो देश कभी लोकतंत्र और सैन्य शक्ति के बीच संतुलन की कोशिश करता रहा, वहाँ यह संशोधन सत्ता के पेंडुलम को एक बार फिर उसी दिशा में झुका देता है जहाँ से पाकिस्तान बार-बार लौटकर आता रहा है—सैन्य सर्वोच्चता की कठोर और निर्विरोध व्यवस्था की ओर।
भारत के नज़रिए से, पड़ोसी देश में सैन्य शक्ति का इस तरह बेलगाम उभारना भारत के लिए सीधे-सीधे सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं को जन्म देता है। पाकिस्तान की सेना की भूमिका किसी रहस्य की तरह छिपी नहीं है; यह वही संस्था है जिसकी छाया 26/11 जैसी भयावह घटनाओं से लेकर पुलवामा जैसे हमलों तक साफ दिखाई देती रही है। आईएसआई के साथ मिलकर यह दशकों से ‘प्रॉक्सी वॉर’ की पटकथा लिखती आई है। ऐसे में 27वाँ संशोधन जनरल आसिम मुनिर को असीमित अधिकार देकर न केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को सैन्य एजेंडे के अधीन करता है, बल्कि विदेश नीति को भी एक कठोर, सैन्यवाद-प्रधान दिशा में मोड़ देता है। भारत के लिए इसका मतलब है—कश्मीर घाटी पर घुसपैठें, सीमा पर गोलीबारी और आतंकी लॉन्च-पैड्स के संचालन में नई आक्रामकता। सुप्रीम कोर्ट की शक्तियाँ छीनने का असर न केवल पाकिस्तान के नागरिकों पर बल्कि सीमा-पार सुरक्षा वातावरण पर भी पड़ेगा। भारत के लिए यह अनिवार्य है कि अब सीमाओं पर सतर्कता, खुफिया निगरानी और कूटनीतिक रणनीतियाँ और मजबूत की जाएँ, क्योंकि जब किसी देश में सैन्य नेतृत्व सर्वोपरि होता है, तो अक्सर उसके निर्णय विवेक से नहीं, बल्कि शक्ति-प्रदर्शन से संचालित होते हैं।
लेकिन एक तर्कपूर्ण नजरिए से, यह पाकिस्तान के आंतरिक पतन का संकेत भी है। आर्थिक बदहाली, महंगाई, चरमराती मुद्रा, और युवाओं में फैलती बेरोजगारी—इन सबके बीच सैन्य शासन का कसता शिकंजा इस बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान सत्ता को स्थिर करने के बजाय अस्थिरता को ही गहरा कर रहा है। भारत इस परिस्थिति को एक अवसर के रूप में भी देख सकता है। क्षेत्रीय मंचों—जैसे एसएएआरसी, शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन और अन्य बहुपक्षीय समूहों—में पाकिस्तान की घटती विश्वसनीयता और बढ़ते अलगाव को कूटनीतिक लाभ में बदला जा सकता है। साथ ही, भारत की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं—जैसे स्वतंत्र न्यायपालिका और सिविलियन नियंत्रण वाली सेना—को मॉडल के रूप में पेश कर, दक्षिण एशिया में शांति की वकालत करनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ, को इसकी निंदा करनी चाहिए, क्योंकि यह न केवल पाकिस्तानी नागरिकों के अधिकारों को कुचलता है बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी खतरे में डालता है। भारत के लिए, यह एक चेतावनी है: पड़ोसी की राजनीतिक गिरावट कभी सुरक्षा की गारंटी नहीं होती। मजबूत सीमाएं, कूटनीतिक सतर्कता और आर्थिक एकीकरण ही सच्चा रास्ता है। पाकिस्तान के लोग, जो लोकतंत्र की आशा में सड़कों पर उतरते रहे हैं, अब एक नए संघर्ष के दहलीज़ पर खड़े हैं—एक ऐसा संघर्ष जहां उनकी आवाज दबाने के लिए संविधान ही हथियार बन गया है। क्या यह लोकतंत्र की कहानी का अंतिम अध्याय है, या एक नई जन-जागृति, एक नए प्रतिरोध की प्रस्तावना?समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल, पाकिस्तान की घड़ी उल्टी दिशा में, तेजी से, टिक-टिक कर रही है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY