Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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पहाड़ की एक चीख और हमारी पूरी तरक्की कटघरे में

 

पहाड़ की एक चीख और हमारी पूरी तरक्की कटघरे में

[नदी का सैलाब था या हमारी विकास-दृष्टि का हिसाब?]

[हिमालय के टूटने की आवाज से पहले क्यों नहीं टूटी हमारी नींद?]



कभी-कभी पहाड़ नहीं टूटता, हमारे गढ़े हुए भ्रम टूटते हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा पर करीब 17 हजार फुट की ऊंचाई पर ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर लगभग एक किलोमीटर नीचे गिरा और बर्फ, चट्टान व मलबे की प्रचंड धारा बाढ़ में बदल गई। नदियां उफनीं, गांव बह गए और सैकड़ों लोग लापता हो गए। उपग्रह तस्वीरों ने बर्फ में आया वह बदलाव पकड़ लिया, जिसे हमारी आंखें और व्यवस्था समय रहते नहीं पढ़ सकीं। इसलिए यह महज प्राकृतिक आपदा नहीं, उस हिमालय की चेतावनी है, जिसे हमने सदियों तक अडिग माना, जबकि वह भीतर ही भीतर बदल रहा था। बर्फ टूटने की गूंज दरअसल उस भ्रम के चकनाचूर होने की गूंज है कि हिमालय हमारी गलतियां हमेशा ढोता रहेगा।

अब इस आपदा का सबसे भारी सच उन नामों में है, जिनके आगे सिर्फ एक शब्द है—‘लापता’। इनमें कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर निकले बड़ी संख्या में भारतीय तीर्थयात्री हैं, जिनके परिवार अब आस्था नहीं, इंतजार में हैं। ब्रिटिश (लगभग एक दर्जन) और अमेरिकी पर्यटक भी हैं, जो रोमांच खोजने आए और प्रकृति में खो गए। हर नाम पीछे एक परिवार, उम्मीद और अधूरी जिंदगी छोड़ गया। ऊंचाई और मौसम ने राहत रोक दी; हेलीकॉप्टर उतर नहीं सके, बचाव दल पहुंच नहीं पाए। यहीं तकनीक की ताकत बौनी पड़ जाती है। डिजिटल नक्शे और महंगे उपकरण उस भूगोल में बेबस हैं, जहां कुछ मिनटों में नदी रास्ता और इंसान अपना पता खो देता है।

पहाड़ का कोई हादसा अचानक नहीं होता; दरकने से पहले वह कई बार चेताता है। बढ़ता तापमान हिमालयी बर्फ और ग्लेशियरों की अस्थिरता बढ़ा रहा है, लेकिन इस टूटने का तत्काल कारण अभी स्पष्ट नहीं है। जुलाई 2025 में भी ल्हेंदे-भोटेकोशी क्षेत्र में ग्लेशियल झील के फटने से बाढ़ आई थी। मगर दोष केवल जलवायु परिवर्तन का नहीं। हमने नाजुक हिमालयी घाटियों में सड़कें काटीं, जलविद्युत परियोजनाएं खड़ी कीं और पर्यटन के नाम पर भीड़ बढ़ाई। भोटेकोशी नदी पहले भी बता चुकी है कि पहाड़ की अपनी सीमाएं हैं। हमने इन संकेतों को विकास की रफ्तार में दबा दिया। समस्या सिर्फ गर्म होती बर्फ नहीं, वह अहंकार भी है जिसने मान लिया कि पहाड़ हमारी सुविधा के मुताबिक ढल जाएगा।

जिस हिमालय के आगे कभी सिर झुकता था, उसके सामने अब हम कैमरा और सुविधा लेकर खड़े हैं। पुराने यात्रियों के साधन सीमित थे, पर पहाड़ के प्रति अनुशासन था। वे मौसम पढ़ते, स्थानीय चेतावनी मानते और पर्वत को खुद से बड़ा समझते थे। आज तीर्थ और रोमांच की रेखा मिट गई है। लक्जरी टेंट, तेज सफर और सोशल मीडिया ने यात्रा को अनुभव से ज्यादा प्रदर्शन बना दिया। प्रकृति मनोरंजन और पहाड़ सुविधा की जगह बन गया। विडंबना यह है कि हिमालय जब अपना असली रूप दिखाता है, तो महंगी यात्रा, बीमा और आधुनिक उपकरण भी जीवन की गारंटी नहीं देते। हिमालय को पर्यटन चाहिए, भीड़ और बाजार की अंधी भूख नहीं।

पानी को सरहदें नहीं रोकतीं; फिर हिमालय की आपदा को सीमाओं में कैसे बांधा जा सकता है? तिब्बत में ग्लेशियर टूटता है, नेपाल में बाढ़ आती है और असर भारत की नदी प्रणालियों तक पहुंच सकता है। इस बाढ़ का असर नेपाल से बहने वाली नदी प्रणालियों के जरिए भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश तक पहुंच सकता है, जहां सतर्कता जारी है। नक्शे इंसानों ने बनाए हैं; पानी और बर्फ उन्हें नहीं मानते। इसलिए हिमालय को देशों के टुकड़ों में देखना खतरनाक है। साझा उपग्रह निगरानी, ग्लेशियरों की जांच, शुरुआती चेतावनी, आपदा आंकड़ों का आदान-प्रदान और संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन की सीमा जरूरी है। पीढ़ियों से पहाड़ के साथ जी रहे स्थानीय लोगों का ज्ञान भी इसका हिस्सा होना चाहिए। विज्ञान जरूरी है, पर स्थानीय अनुभव को उसका विरोधी मानना बड़ी भूल होगी।

विकास जरूरी है, मगर सवाल यह है कि उसकी कीमत कौन चुकाएगा? बिजली के लिए जलविद्युत, रोजगार और विदेशी मुद्रा के लिए पर्यटन, संपर्क के लिए सड़कें और सुरंगें चाहिए। विरोध विकास का नहीं, उसके अंधेपन का है। जब एक नाजुक घाटी में इतने निर्माण हो जाएं कि एक प्राकृतिक घटना पूरी व्यवस्था को ढहा दे, तो वह विकास नहीं, जोखिम का विस्तार है। हिमालय के बुजुर्ग जानते हैं कि कब नदी बदलती है, किस ढलान पर खतरा है और कौन-सा संकेत टालना नहीं चाहिए। आधुनिक योजनाओं ने इस ज्ञान को अक्सर पिछड़ा मान लिया। अब विकास को स्थानीय अनुभव और वैज्ञानिक आकलन—दोनों के आगे झुकना होगा।

बाढ़ उतर जाएगी, पर उसके पीछे छोड़ा सवाल नहीं उतरेगा। हिमालय की बर्फ सिर्फ पहाड़ पर जमी बर्फ नहीं, एशिया की विशाल नदियों का प्राकृतिक जल-भंडार है। ग्लेशियरों की अस्थिरता एक ओर अचानक बाढ़, दूसरी ओर भविष्य में पानी की कमी का खतरा बढ़ा सकती है। इसलिए आज की ‘लापता’ सूची को सिर्फ प्रशासनिक आंकड़ा समझना भूल होगी; इसमें आने वाले वर्षों की जलवायु चेतावनी छिपी है। तापमान बढ़ता रहा, निर्माण बेलगाम रहा और पर्यटन वैज्ञानिक सीमा से बाहर गया, तो ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं रहेंगी। तब हर आपदा के बाद हम कहेंगे—‘किसी ने सोचा नहीं था।’ जबकि हिमालय शायद बहुत पहले से कह रहा होगा—सोचो।

हिमालय से लेने की हमारी भूख का अंत कहां होगा—यही अब सबसे बड़ा सवाल है। इस बार बर्फ ने सिर्फ नदी नहीं बढ़ाई, हमारी विकास-दृष्टि की दरार भी खोल दी। अब तीर्थ में संयम, पर्यटन में सीमा, निर्माण में वैज्ञानिक अनुशासन और विकास में पर्यावरणीय विवेक जरूरी है। हिमालयी समुदायों को फैसलों में केंद्र देना होगा और वैज्ञानिक चेतावनियों को फाइलों से निकालकर नीति बनाना होगा। हिमालय को जीतने नहीं, उसके साथ जीने की भाषा सीखनी होगी। बर्फ की चुप्पी टूट चुकी है। अगली बार पहाड़ कब बोलेगा, कोई नहीं जानता। तय सिर्फ इतना है—अगली चेतावनी से पहले हम सुनना सीखेंगे या फिर किसी नई ‘लापता सूची’ में अपने अहंकार का नाम खोजेंगे।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com


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