प्रसंगवश – 19 अक्टूबर: सामाजिक कार्यकर्ता, गांधीवादी निर्मला देशपांडे “दीदी” जयंती
पदयात्रा से हृदययात्रा तक: निर्मला देशपांडे “दीदी” का जीवन
[गांधीवाद का जीवंत महाकाव्य: सत्य, अहिंसा और सर्वोदय का प्रतीक]
निर्मला देशपांडे का नाम सुनते ही मन में उभर आती है वह जीवंत छवि—सफेद खादी की साड़ी लपेटे एक सौम्य स्त्री, हिंसा की लपटों से तपते इलाकों में शांति का अमृत बरसाती हुई, तिरंगा थामे सीमाओं के पार मित्रता के सेतु रचती चली जाती। 1929 की वह शरद सुबह नागपुर में, जब स्वतंत्रता संग्राम की गूंज अभी तरोताजा थी, विमला और पुरुषोत्तम यशवंत देशपांडे के साहित्यिक आंगन में एक बालिका ने जन्म लिया। पिता पुरुषोत्तम, मराठी साहित्य के यशस्वी रचनाकार, जिन्हें 1962 में 'अनामिकाची चिंतनिका' पर साहित्य अकादमी सम्मान मिला, तथा माता विमलाबाई, जे. कृष्णमूर्ति की गहन अनुयायी विदुषी—ऐसे दार्शनिक-साहित्यिक परिवेश में पोषित निर्मला ने पुस्तकों से कहीं अधिक समाज की कठोर वास्तविकताओं को आत्मसात किया। नागपुर के मॉरिस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में एम.ए. प्राप्त कर लेक्चरर बनीं, किंतु कक्षा की संकुचित दीवारों से परे विशाल, कराहते संसार ने उन्हें आह्वान किया। विवाह का त्याग कर उन्होंने गांधीवादी त्रयी—अहिंसा, सत्याग्रह, सर्वोदय—को जीवन का सार बना लिया। यह प्रतिज्ञा केवल संकल्प न थी, अपितु एक क्रांतिकारी विद्रोह थी, जो 1952 में विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़कर साकार हो उठी।
कल्पना कीजिए उस युवती को—चप्पलों में बंधे साधारण चरण, कंधे पर लटका एक मामूली थैला, भारत के कोने-कोने में 40,000 किलोमीटर की अथाह पदयात्रा करती हुई। विनोबा के भूदान अभियान की धुरी पर अडिग खड़ी निर्मला, जहां जमींदारों से भूमि संग्रह कर भूमिहीनों को वितरित किया जाता था, 'मानसकन्या' के रूप में उनकी आध्यात्मिक संतान बनीं। गांव-गांव ठहरकर गांधी के ग्राम स्वराज का संदेश प्रज्वलित किया—एक आत्मनिर्भर समाज की कल्पना, जहां हिंसा का स्थान शांति ग्रहण करे। किंतु यह यात्रा कांटों भरी थी: रेगिस्तानी धूल के तूफान, हिमालयी शीतलहरी, बाढ़ की प्रलयंकारी धारा—सबका सामना किया। एक बार उन्होंने कहा, "गांधीवादी सिद्धांतों का पालन कठिन है, किंतु पूर्ण लोकतांत्रिक समाज का यही एकमात्र पथ।" इस आंदोलन ने हजारों एकड़ भूमि गरीबों तक पहुंचाई, अहिंसा को मात्र शब्द न बनाकर कर्म का स्वरूप प्रदान किया।
1980 के दशक में जब पंजाब सिख-हिंदू दंगों की भयंकर ज्वाला में सुलग रहा था, निर्मला देशपांडे वहां पहुँचीं मानो कोई करुणामयी माँ अपने संतापी संतानों को आलिंगन में भरने। उन्होंने शांति मार्च का उद्घाटन किया, जिसमें सैकड़ों महिलाएँ उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलीं, नारे लगाते हुए। कश्मीर की रक्तरंजित घाटियों में, जहाँ 1990 के दशक में आतंकवाद ने शांति को बंधक बना लिया था, 1994 में उन्होंने शांति मिशन का सूत्रपाण कर कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों के बीच विश्वास के पुल खड़े किए। एक बार उन्होंने हृदयस्पर्शी स्वर में कहा, "कश्मीर हमारा हृदय है, इसके घावों को करुणा से भरना हमारा परम कर्तव्य।" 2002 के गुजरात दंगों की विभीषिका में उन्होंने 'सांझी विरासत' फोरम गढ़ा, जहाँ लेखक, कलाकार और कार्यकर्ता एकजुट हो सांप्रदायिक विष का मुकाबला करने को लामबंद हुए। दंगों की भयावहता के बीच वे सड़कों पर धरना देकर बैठीं, लोगों को आह्वान करतीं कि "सांप्रदायिकता एक घातक विष है, जो समूचे समाज को निगल डालता है।" आदिवासियों और महिलाओं के उत्थान का उनका अविरल संकल्प नदी की प्रबल धारा सा था—आदिवासी अंचलों में जाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन के बीज रोपे; महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु कार्यशालाओं में वे प्रेरित करतीं, "महिला वह अमूल्य बीज है, जो समाज को हरित वन बनाती है।"
साम्प्रदायिक सौहार्द का उनका जुनून सीमाओं को लाँघता हुआ अंतरराष्ट्रीय पटल पर चमका। 1996 में भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता का मंच रचकर दोनों देशों के सांसदों को एक मेज पर बिठाया, संवाद की ज्योति प्रज्वलित की। 2000 में 'महिलाओं की शांति बस' को दिल्ली से लाहौर पहुँचाया, जिसमें भारतीय-पाकिस्तानी नारियाँ एकजुट होकर शांति का संदेश बिखेर गईं। उनकी मृत्युोपरांत पाकिस्तान ने 13 अगस्त 2009 को 'सितारा-ए-इम्तियाज' से सम्मानित कर उनके योगदान को अमर किया। तिब्बत के दमन के विरुद्ध आवाज बुलंद की, चीनी अत्याचारों का खंडन किया। 2006 में अफजल गुरु की क्षमा याचिका का डटकर समर्थन करते हुए कहा, "न्याय हिंसा की आग से नहीं, करुणा के सरित से बहता है।" 1984 में अखिल भारतीय रचनात्मक समाज (एबीआरएस) की स्थापना कर उन्होंने गांधीवादी संस्थाओं का एक महासंघ गढ़ा, जिसकी पत्रिका 'नित्य नूतन' उनके दार्शनिक चिंतन का जीवंत प्रतिबिंब बनी—आज भी क्राउडफंडिंग से प्रकाशित होकर प्रेरणा बाँटती। एबीआरएस ने साम्प्रदायिक सद्भाव, विश्व शांति और राष्ट्रीय एकता के लिए असंख्य कार्यकर्ताओं को संगठित किया। 'निर्मला दीदी', जैसा उन्हें स्नेह से पुकारा जाता, ने सदैव उद्घोष किया, "शांति कोई स्वर्गीय उपहार नहीं, अपितु अथक संघर्ष की विजय है।"
राजनीति में उनका प्रवेश भी गांधीवादी सादगी और सत्याग्रह की ज्योति से प्रज्ज्वलित था। 1997 और 2004 में राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा की मनोनीत सदस्य के रूप में संसद की पवित्र चौखट पर खड़ी होकर वे साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध, महिला सशक्तिकरण की पुकार और पर्यावरण संरक्षण के आह्वान के साथ उद्घोष करती रहीं। 2007 में राष्ट्रपति पद की दौड़ में प्रतिभा पाटिल के साथ उनका नाम चमका—यदि स्वास्थ्य साथ देता, तो भारत की प्रथम राष्ट्रपति एक गांधीवादी नारी होतीं, जो अहिंसा का त्रिशूल थामे राष्ट्र को दिशा देतीं। किंतु वे पदलोलुपता से ऊपर रहीं, सादगी की मिसाल बनीं। 2005 में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित, उसी वर्ष राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार और 2006 में पद्म विभूषण से अलंकृत हुईं; 5 नवंबर 2007 को उपराष्ट्रपति द्वारा 'राष्ट्र गौरव पुरस्कार' प्रदान किया गया। ये सम्मान उन्हें मोहित न कर सके—वे वही निर्मला दीदी रहीं, खादी की साड़ी में लिपटी, हृदय में करुणा का सागर लिए।
निर्मला देशपांडे का जीवन एक जीवंत महाकाव्य था, जो सिद्ध करता है कि एक अकेला व्यक्ति समूचे समाज को परिवर्तित कर सकता है। नक्सलियों को वे "दलितों-आदिवासियों के न्याय की पुकार" मानतीं, किंतु हिंसा का कठोर खंडन करतीं। इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का प्रारंभिक समर्थन लोकतंत्र रक्षा के भाव से किया, परंतु पश्चात् गहन खेद व्यक्त कर आत्मचिंतन की मिसाल बनीं। मृत्यु से पूर्व नेपाल के माओवादियों से संवाद की तैयारी में थीं, गांधीवाद को जड़ों में उतारते हुए—पर्यावरण संतुलन, सीमित आवश्यकताएँ और वैश्विक एकता के सिद्धांतों पर। "वसुधैव कुटुम्बकम्" को उन्होंने केवल श्लोक न बनाकर जीवन-दर्शन का मूलाधार किया। 1 मई 2008 को दिल्ली में शांतिपूर्ण विदाई ली, निद्रा में विलीन होकर। किंतु उनकी विरासत अमर है—आज ध्रुवीकरण की आंधी में उनकी वाणी गूंजती है: "शांति का पथ कंटकाकीर्ण है, किंतु यही सत्य का एकमात्र मार्ग।"
उनकी साहित्यिक वेणी भी कम आकर्षक न थी—उपन्यास 'सीमांत' में महिलाओं की मुक्ति का संग्राम चित्रित, 'चिमलीग' में चीनी संस्कृति की गहन पड़ताल। वे प्रेरित करतीं, "साहित्य विचारों का सच्चा आलोक है।" आदिवासी नारियों के उत्थान में शिक्षा को अचूक अस्त्र बनाया। गुजरात दंगों के बाद 'आध्यात्म ज्योति' फोरम रचकर धर्म को विभाजन न बनाकर एकता का सूत्र बाँधा। तिब्बतियों के दमन के विरुद्ध मानवाधिकारों की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। उनका जीवन गांधीवाद की शाश्वतता का प्रमाण है—पुरातन न होकर कालातीत। वे गर्व से कहतीं, "मैं गांधी की संतान हूँ, भारत की पुत्री।" 19 अक्टूबर को उनकी जयंती पर सूर्योदय के साथ हम चिंतन करते हैं—कितनी निर्मला चाहिए, जो पदयात्रा से अधिक हृदय-यात्रा करें। उनका परलोकगमन एक युग का अवसान था, किंतु प्रेरणा का उद्गम अमर। उनके चरणचिह्नों पर चलकर ही वह भारत साकार होगा, जो गांधी ने सपना बुना—शांत, समृद्ध, सर्वसमावेशी। निर्मला देशपांडे न केवल शांति सिपाही थीं, अपितु शांति की जीवंत मूर्ति; उनकी जयंती हमें स्मृत कराती है कि सच्चा संघर्ष कभी निष्फल न जाता।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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