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नशे में डूबा जश्न और होश में डूबे मातम

 

नशे में डूबा जश्न और होश में डूबे मातम

[सड़क ने कुछ नहीं छीना, हमने सब दे दिया]

[यह सड़क दुर्घटना नहीं, संस्कारों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट है]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


घड़ी में अभी पाँच बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे। वह खामोश, धोखेबाज़ वक्त—रात और सुबह के बीच का—जब शरीर थक चुका होता है, दिमाग़ सुन्न पड़ जाता है और इंसान खुद को सबसे ज़्यादा अजेय समझ बैठता है। तभी अचानक एक तेज़ धमाका हुआ। सड़क पर नहीं, सीधे समाज की चेतना पर। वह टक्कर सिर्फ़ वाहन और वाहन के बीच नहीं थी; यह ज़िंदगी और लापरवाही के बीच हुई निर्मम भिड़ंत थी। इंदौर शहर में 09 जनवरी की वह सुबह तीन परिवारों के लिए कभी खत्म न होने वाली रात बन गई। तीन ज़िंदगियाँ वहीं थम गईं, और एक ज़िंदगी आज भी अस्पताल के बिस्तर पर मौत से जूझ रही है।

पुलिस की बताई कहानी इस त्रासदी को और भी निर्मम बना देती है। दो युवक और दो युवतियाँ, जिनमें से एक का जन्मदिन था, रात भर जश्न में डूबे रहे। शराब की बोतलें, डिस्पोज़ेबल गिलास और देर रात तक चलने वाला उत्सव—सब कुछ उस कार के भीतर मौजूद था, जो अलसुबह तेज़ रफ्तार में आगे चल रहे ट्रक में जा घुसी। यह महज़ एक “गलत मोड़” नहीं था; यह नशे, थकान और गैर-जिम्मेदारी का निर्मम परिणाम था। जब नशा दिमाग़ पर हावी हो जाता है, तब ब्रेक नहीं, विवेक फेल होता है। और उसी फेल विवेक की कीमत इंसान को जान देकर चुकानी पड़ती है। 

हम ऐसी घटनाओं को अक्सर “दुर्घटना” कहकर खुद को तसल्ली दे लेते हैं। यह शब्द हमें बच निकलने का भ्रम देता है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह कोई अचानक टूटी हुई किस्मत नहीं थी, बल्कि धीरे-धीरे बुनी गई लापरवाही की चादर थी। देर रात तक शराब पीना, नींद की अनदेखी करना, तेज़ रफ्तार को रोमांच समझना, और यह मान लेना कि “कुछ नहीं होगा”—ये सभी सोच-समझकर लिए गए फैसले थे। और फैसलों के परिणाम होते हैं। यहाँ परिणाम इतना भयावह था कि तीन सांसें हमेशा के लिए थम गईं।

आज का समाज युवाओं की आज़ादी पर गर्व करता है, लेकिन जिम्मेदारी की बात आते ही चुप हो जाता है। जश्न मनाना गुनाह नहीं है; जन्मदिन खुशी का मौका होता है। लेकिन जब खुशी विवेक को कुचल देती है, तब वह उत्सव नहीं, बल्कि आत्मघात बन जाता है। शराब पीकर गाड़ी चलाना सिर्फ़ कानून तोड़ना नहीं है; यह दूसरों की जान को दांव पर लगाना है। और यह सोचना कि “मैं संभाल लूंगा” नशे का सबसे बड़ा झूठ है।

तेज़ रफ्तार को आज भी ताक़त और स्टेटस का प्रतीक माना जाता है। खाली सड़कें युवाओं को चुनौती देती हैं, और नशे में डूबा दिमाग़ उस चुनौती को स्वीकार कर लेता है। लेकिन सड़क किसी को माफ़ नहीं करती। खड़ा ट्रक कोई अचानक उभरी बाधा नहीं था—वह वहीं था, साफ़ और अडिग। जो नहीं था, वह था नियंत्रण, सजगता और समझ। नशा सिर्फ़ आँखों की रोशनी नहीं छीनता; वह निर्णय लेने की क्षमता भी तबाह कर देता है। यही वजह है कि ऐसे हादसों में पछतावे का मौका तक नहीं मिलता।

इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इसकी कीमत सिर्फ़ उन चार लोगों ने नहीं चुकाई। इसकी कीमत उनके माता-पिता चुका रहे हैं, जिनके सपने ताबूत में बंद हो गए। इसकी कीमत वह घर चुका रहा है, जहाँ अब जन्मदिन की तारीख़ मातम की तारीख़ बन गई है। एक मां का सवाल—“मैंने उसे रोका क्यों नहीं?” और एक पिता की चुप्पी—“मैंने उसे समझाया क्यों नहीं?”—इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता, बस उम्र भर का बोझ होता है।

यहीं परिवारों की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। बुराइयों से बचाने में परिवार ही पहली जिम्मेदारी निभाता है। अगर घर में खुलकर संवाद हो, अगर बच्चों को यह समझाया जाए कि नशा आधुनिकता नहीं, बल्कि विनाश है, तो शायद कई फैसले बदल सकते हैं। सिर्फ़ पढ़ाई और करियर पर ध्यान देना काफी नहीं; जीवन मूल्यों की शिक्षा उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। माता-पिता का व्यवहार, उनकी आदतें और उनका दृष्टिकोण बच्चों की सोच की नींव बनता है। अगर घर में ही नियमों को हल्के में लिया जाएगा, तो बाहर उनसे पालन की उम्मीद खोखली रह जाएगी। 

दोस्तों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी और अहम होती है जितनी परिवार की होती है। सच्ची दोस्ती वही है, जो सबसे मुश्किल और गलत समय में भी हिम्मत करके रोक सके। नशे में गाड़ी चलाने देना दोस्ती नहीं, अपराध में साझेदारी है। अक्सर समूह में यह सोच बन जाती है कि कोई और रोक लेगा, कोई और संभाल लेगा। इसी “कोई और” के भरोसे कई ज़िंदगियाँ हमेशा के लिए खतरे में डाल दी जाती हैं। अगर उस रात किसी ने चाबी छीन ली होती, किसी ने सख़्ती से मना किया होता, तो शायद आज तीन घर सूने न होते और तीन परिवारों की खुशियाँ अभी भी जिन्दा होतीं।

प्रशासन और कानून की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। शराब पीकर ड्राइविंग पर सख़्त कार्रवाई, तेज़ रफ्तार पर सतत निगरानी और सड़कों की बेहतर व्यवस्था ज़रूरी हैं। लेकिन यह मान लेना कि सिर्फ़ कानून ही सब कुछ ठीक कर देगा, सबसे बड़ी भूल है। कानून डर पैदा कर सकता है, लेकिन संस्कार नहीं। संस्कार घर और समाज से आते हैं। जब तक जिम्मेदारी को सहज, गंभीर और क़ानूनी कूल के ऊपर रखा नहीं जाएगा, तब तक नियमों की अनदेखी शान और साहस का प्रतीक बनी रहेगी।

यह घटना हमें आईना दिखाती है—कड़वा, सच्चा और बेहद ज़रूरी आईना। यह आईना हमें झकझोर कर पूछता है कि हम किस तरह का समाज बना रहे हैं, जहाँ जश्न और खुशी अब ज़िंदगी से महंगी हो गई हैं। जन्मदिन हर साल आता है, पार्टी दोबारा मनाई जा सकती है, लेकिन ज़िंदगी केवल एक बार मिलती है, और एक बार चली गई तो वह कभी लौटकर नहीं आती। नशे में लिया गया एक क्षणिक, अनियंत्रित फैसला पूरे परिवार की उम्र भर की सज़ा और गहरे दर्द का कारण बन जाता है। 

09 जनवरी की यह सुबह भूलने के लिए नहीं है। यह सिर्फ़ घटना नहीं, बल्कि चेतावनी है—एक कड़वी चेतावनी, जो कहती है कि आख़िरी नहीं, शायद अगली भी आए। अगर आज भी हम नहीं चेते, अगर आज भी परिवार, दोस्त और समाज अपनी ज़िम्मेदारी और भूमिका को गंभीरता से नहीं समझे, तो अगली सुबह किसी और सड़क पर, किसी और तेज़ रफ्तार ट्रक के सामने, किसी और घर की रौशनी हमेशा के लिए बुझ सकती है। सवाल यह नहीं है कि हादसा कब होगा; सवाल यह है कि क्या हम उससे पहले बदलने का साहस जुटा पाएँगे, और अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाएँगे।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com                               

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