देश नशा-मुक्त हो या न हो, नारे ज़रूर नशा-मुक्त हैं
[अभियान इतने सफल हैं कि नशा अब ऑनलाइन हो गया है]
[व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि — नशा अब पहले से ज़्यादा सुलभ है]
· प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
कानून की सबसे लंबी सजा कभी अपराधी को नहीं, न्याय को मिलती है। नशा मुक्त भारत का मौजूदा अभियान इसी सजा के बीच अपनी सफलता का उत्सव मना रहा है। सौ-सप्ताहीय कार्यक्रम, युवाओं की शपथ, जागरूकता यात्राएं और सरकारी संकल्प यह भरोसा जगाते हैं कि नशे के खिलाफ निर्णायक संघर्ष चल रहा है। लेकिन दूसरी ओर एनडीपीएस कानून से जुड़े लगभग 3.96 लाख मुकदमे अदालतों में वर्षों से लंबित हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का मौन बयान है, जहां न्याय की हर देरी अपराध का आत्मविश्वास बढ़ाती है। अभियान सक्रियता का आभास देते हैं, जबकि अदालतों की ठहरी हुई फाइलें बताती हैं कि व्यवस्था अपनी ही रफ्तार से हार रही है। नशा अब कानून से नहीं, कानून की देरी से सबसे अधिक सुरक्षित हो चुका है।
अदालतें जब समय हारने लगती हैं, तब अपराधी मुकदमे नहीं, अवसर गिनते हैं। पंजाब में लगभग साठ हजार और केरल में करीब पचास हजार एनडीपीएस मामले वर्षों से लंबित हैं। विशेष अदालतें जरूरत से कम हैं, न्यायाधीश सीमित हैं और मुकदमों की चाल इतनी सुस्त है कि अनेक आरोपी जमानत पर बाहर आकर अपना तंत्र फिर खड़ा कर लेते हैं। यहीं न्याय की देरी अपराध का सबसे विश्वसनीय संरक्षण बन जाती है। जितने अधिक मामले दर्ज होते हैं, उतना ही बैकलॉग बढ़ता है और उतना ही यह विश्वास गहराता है कि गिरफ्तारी अंत नहीं, केवल एक औपचारिक पड़ाव है। नशा मुक्त अभियान अपराध को सामाजिक अभिशाप बताते हैं, लेकिन न्यायिक विलंब उसी अभिशाप की उम्र बढ़ाता रहता है। यह ऐसा विरोधाभास है, जिसे अब कोई सरकारी उपलब्धि ढक नहीं सकती।
नशे का बाजार अब गलियों से निकलकर मोबाइल की स्क्रीन पर फल-फूल रहा है। इतिहास में पहली बार गली हार गई और स्क्रीन जीत गई। एन्क्रिप्टेड ऐप, डार्क वेब और सोशल मीडिया के बंद समूहों ने खरीद-बिक्री को इतनी गोपनीयता दे दी है कि ग्राहक को घर से बाहर निकलने की भी जरूरत नहीं पड़ती। जिन कॉलेजों में नशा विरोधी रैलियां निकलती हैं, वहीं के छात्र मोबाइल से सप्लायर तक पहुंच जाते हैं। पुलिस पुराने तस्करों को पकड़ती है, लेकिन तब तक डिजिटल दुनिया नए चेहरे तैयार कर चुकी होती है। हमारी कार्रवाई आज भी एनालॉग सोच में अटकी है, जबकि अपराध पूरी तरह डिजिटल हो चुका है। यही फासला अभियानों को प्रतीक और नशे को सुविधा बना देता है। जब तकनीक ही अपराध का सबसे भरोसेमंद माध्यम बन जाए, तब पोस्टर और शपथ उसकी रफ्तार नहीं रोक सकते।
जब ईमानदार श्रम की कीमत घटने लगे और जोखिम सबसे लाभकारी रोजगार बन जाए, तभी अपराध कारोबार बन जाता है। बेरोजगारी, त्वरित कमाई का आकर्षण और फैलता अवैध धन युवाओं को नशे की सप्लाई चेन में खींच लाता है। छोटे वाहक गिरफ्तार होते हैं, उनके परिवार बिखरते हैं और समाज उन्हें अपराध का चेहरा मान लेता है। उधर बड़े तस्कर कमजोर अभियोजन, लंबी कानूनी प्रक्रिया और तकनीकी खामियों की आड़ में बच निकलते हैं। अभियान युवाओं को नैतिकता का उपदेश देते हैं, लेकिन व्यवस्था सम्मानजनक आर्थिक विकल्प नहीं दे पाती। नशा केवल लत नहीं, कुछ परिवारों की छिपी आजीविका बन जाता है। जब तक यह आर्थिक सच स्वीकार नहीं किया जाएगा, हर अभियान बीमारी नहीं, उसके लक्षणों का उपचार करेगा।
आंकड़े कभी-कभी ऐसी जीत का उत्सव मनाते हैं, जिसे सच्चाई चुपचाप हार में बदल चुकी होती है। हर वर्ष प्रवर्तन एजेंसियां बड़ी जब्तियों का दावा करती हैं। मीडिया में सुर्खियां बनती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं और इसे सफलता बताया जाता है। लेकिन इतनी बरामदगी के बाद भी यदि बाजार में नशा पहले जैसी सहजता से उपलब्ध है और कीमतों में उल्लेखनीय उतार-चढ़ाव नहीं आता, तो स्पष्ट है कि एक सप्लाई लाइन की जगह दूसरी खड़ी हो चुकी है। तब बरामदगी उपलब्धि नहीं, बल्कि लगातार रास्ते बदलते विशाल नेटवर्क का प्रमाण बन जाती है। जब्ती के आंकड़े जितने बढ़ते हैं, प्रश्न उतना बड़ा होता है कि उपलब्धता क्यों नहीं घट रही। सफलता की असली कसौटी बरामद माल नहीं, घटती मांग और कठिन होती पहुंच होनी चाहिए।
हर अभियान की सबसे बड़ी चूक यह है कि वह घरों के भीतर पसरे सन्नाटे को सुन ही नहीं पाता। परिवारों की त्रासदी सबसे कम दिखाई देती है, जबकि सबसे अधिक वही भुगतते हैं। एक ओर उन्हें जागरूकता कार्यक्रमों में नशे से दूर रहने की सीख मिलती है, दूसरी ओर वही नशा डिजिटल रास्तों से उनके बच्चों तक पहुंच जाता है। परिवार का कोई सदस्य नशे के आरोप में वर्षों अदालतों के चक्कर काटे, तो आर्थिक बोझ, सामाजिक अपमान और मानसिक थकान पूरे घर को तोड़ देती है। न्याय में देरी केवल एक मुकदमे को लंबा नहीं करती, बल्कि व्यवस्था से नागरिक का भरोसा भी कम करती है। नशा छोड़ने का संदेश हवा में तैरता रहता है, जबकि नशे की उपलब्धता घर के भीतर प्रवेश करती रहती है। यही सबसे भयावह असमानता है, जिसे कोई नारा ढंक नहीं सकता।
किसी भी अभियान का अंतिम फैसला नारों से नहीं, जमीन की हकीकत से होता है। यदि विशेष अदालतें पर्याप्त नहीं होंगी, फॉरेंसिक रिपोर्ट महीनों अटकी रहेंगी, डिजिटल सप्लाई चेन पर ठोस रोक नहीं लगेगी और छोटे मामलों के लिए प्रभावी सुधार व्यवस्था नहीं होगी, तो अभियान व्यवस्था की कमजोरियों पर परदा डालेंगे। अभियान जितना बड़ा होगा, भ्रम उतना गहरा होगा। नशा-मुक्त भारत की असली पहचान शपथों से नहीं, बल्कि इस बात से होगी कि क्या नशा कठिनाई से उपलब्ध हो रहा है। आज तस्वीर उलटी है—उपलब्धता और अभियान, दोनों बढ़ रहे हैं। इसलिए लड़ाई का केंद्र बदलना होगा। शब्दों की मशाल नहीं, न्याय की गति, तकनीक की तैयारी और प्रशासनिक ईमानदारी ही नशे को सुलभ बनाने वाली सुविधाएं तोड़ सकती हैं। सुविधा टूटते ही अभियान पहली बार सच के साथ खड़े दिखाई देंगे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
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