Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

मुस्तफिजुर प्रकरण और टूटा विश्वास

 

एक खिलाड़ी से राष्ट्र तक: मुस्तफिजुर प्रकरण और टूटा विश्वास

[क्रिकेट पर सियासत की जीत: हार किसकी हुई?]

[यदि हर असहमति का उत्तर बहिष्कार हो, तो बचेगा क्या क्रिकेट में?]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


क्रिकेट का मैदान केवल खेल का स्थल नहीं होता, वह राष्ट्रों की भावनाओं, आकांक्षाओं और आपसी विश्वास का प्रतिबिंब भी होता है। जब इसी मैदान से किसी देश की अनुपस्थिति की घोषणा होती है, तो वह केवल खिलाड़ियों की कमी नहीं दर्शाती, बल्कि विचारों और संबंधों के टूटने का संकेत भी देती है। भारत में होने वाले टी20 विश्व कप से बांग्लादेश का बहिष्कार इसी टूटन की घोषणा है। यह फैसला खेल भावना से अधिक राजनीति की भाषा बोलता है। जिस विश्व कप को वैश्विक एकता, प्रतिस्पर्धा और उत्सव का प्रतीक होना चाहिए था, वह अब संदेह, टकराव और कूटनीति का अखाड़ा बनता जा रहा है। यह घटना बताती है कि आधुनिक क्रिकेट अब केवल बल्ले और गेंद का खेल नहीं रहा, बल्कि सत्ता और अस्मिता का माध्यम बन चुका है।

इस पूरे प्रकरण की शुरुआत एक खिलाड़ी से हुई, लेकिन उसका विस्तार पूरे राष्ट्र तक पहुंच गया। मुस्तफिजुर रहमान का आईपीएल से बाहर होना एक पेशेवर निर्णय था, जैसा हर लीग में होता है, किंतु बांग्लादेश ने इसे सम्मान और सुरक्षा से जोड़कर देखा। यहीं से खेल निर्णय राजनीतिक मुद्दा बन गया। बीसीबी द्वारा मैच भारत से हटाकर श्रीलंका में कराने की मांग, आईसीसी का इनकार और फिर सीधा बहिष्कार, यह सब इस बात का प्रमाण है कि फैसले खेल तर्क से नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव में लिए गए। खेल सलाहकार और सरकारी नेतृत्व के तीखे बयान यह स्पष्ट करते हैं कि यह निर्णय क्रिकेट बोर्ड का नहीं, बल्कि सत्ता संरचना का था। परिणामस्वरूप संवाद की संभावना समाप्त हो गई और टकराव ने जगह ले ली।

भारत और बांग्लादेश के क्रिकेट संबंध ऐतिहासिक रूप से जटिल लेकिन सौहार्दपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों ने संघर्ष और सहयोग, दोनों के उदाहरण पेश किए हैं। उनके बीच खेले गए मुकाबले केवल अंक तालिका की लड़ाई नहीं थे, बल्कि साझा इतिहास और क्षेत्रीय पहचान की अभिव्यक्ति भी थे। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाओं ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। बांग्लादेश के भीतर भारत विरोधी भावनाएं तेज हुई हैं और क्रिकेट उनका सबसे प्रभावी मंच बन गया है। मुस्तफिजुर प्रकरण को राष्ट्रीय अपमान के रूप में प्रस्तुत कर सरकार ने जनभावनाओं को संगठित किया। ऐसे वातावरण में पीछे हटना राजनीतिक कमजोरी माना जाता है। यही कारण है कि क्रिकेट अब खेल कम और भावनात्मक राजनीति का औजार अधिक बनता जा रहा है।

इस बहिष्कार का सबसे गहरा और प्रत्यक्ष प्रभाव स्वयं बांग्लादेश क्रिकेट पर पड़ेगा। आर्थिक नुकसान केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं होता, वह पूरी खेल संरचना को प्रभावित करता है। आईसीसी से मिलने वाली राजस्व हिस्सेदारी, प्रायोजक अनुबंध, मैच फीस और पुरस्कार राशि का नुकसान बोर्ड को वर्षों पीछे धकेल सकता है। खिलाड़ियों के लिए विश्व कप केवल एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पहचान और करियर निर्माण का मंच होता है। वहां से बाहर होना उनके भविष्य की दिशा बदल सकता है। अनुभवी खिलाड़ियों के साथ-साथ युवा प्रतिभाओं के सपने भी अधर में लटक गए हैं। सुरक्षा के नाम पर लिया गया यह फैसला अंततः खिलाड़ियों से सबसे बड़ी कीमत वसूल करता दिखाई देता है।

भारत के लिए यह स्थिति पहली नजर में सहज प्रतीत हो सकती है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम कहीं अधिक गंभीर हैं। कमजोर प्रतिद्वंद्वी की अनुपस्थिति से प्रतियोगिता की गुणवत्ता प्रभावित होगी। अंतरराष्ट्रीय मंच पर आईसीसी और मेजबान देश की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। यदि अन्य देश भी इसी मार्ग पर चलते हैं, तो विश्व कप की विश्वसनीयता कमजोर हो जाएगी। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का समर्थन इस बात का संकेत है कि यह संकट सीमित नहीं रहेगा। दर्शक क्रिकेट को रोमांच और प्रतिस्पर्धा के लिए देखते हैं, राजनीतिक रणनीति के लिए नहीं। यदि यह संतुलन टूटा, तो दर्शकों का विश्वास भी धीरे-धीरे कम होता जाएगा।

क्रिकेट और राजनीति का संबंध नया नहीं है, लेकिन उसका यह खुला और आक्रामक स्वरूप अत्यंत चिंताजनक है। जब सरकारें खेल निर्णयों में हस्तक्षेप करने लगती हैं, तब खिलाड़ी केवल प्रतीक बनकर रह जाते हैं। खेल संघों की स्वायत्तता कमजोर होती है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं दबाव में आ जाती हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच पहले हुए बहिष्कारों ने चेतावनी दी थी, लेकिन उनसे कोई ठोस सबक नहीं लिया गया। यदि हर राजनीतिक असहमति का उत्तर बहिष्कार होगा, तो विश्व कप का वैश्विक स्वरूप समाप्त हो जाएगा। आईसीसी को अब केवल तटस्थ रहने के बजाय स्पष्ट और कठोर नीति बनानी होगी।

यह बहिष्कार किसी एक टूर्नामेंट तक सीमित घटना नहीं है, बल्कि वह मोड़ है जो क्रिकेट के भविष्य की दिशा तय कर सकता है। वर्षों की साझी मेहनत से बनी एशियाई क्रिकेट की एकता आज स्पष्ट रूप से दरकती दिखाई दे रही है। यदि राजनीति लगातार खेल पर हावी होती रही, तो आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा क्रिकेट विरासत में मिलेगा जो विभाजित होगा, अधूरा होगा और अपने मूल उद्देश्य से भटका हुआ होगा। खेल का जन्म राष्ट्रों को जोड़ने के लिए हुआ था, न कि उनके बीच की खाइयों को और गहरा करने के लिए। क्रिकेट की आत्मा प्रतिस्पर्धा में बसती है, विरोध और वैमनस्य में नहीं। जब सीमाएं खेल के मैदान में दीवार बन जाएं, तब आत्ममंथन केवल आवश्यक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो जाता है।

फिर भी, संकट के इस दौर में आशा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। संवाद, पारदर्शिता और आपसी सम्मान ही इस टकराव से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता हैं। बीसीबी, बीसीसीआई और आईसीसी को राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर खेल के व्यापक हित में निर्णय लेने होंगे। क्रिकेट को शक्ति प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि विश्वास और संवाद का सेतु बने रहना चाहिए। यदि आज खेल को राजनीति की गिरफ्त से मुक्त नहीं किया गया, तो भविष्य में केवल विवादों की श्रृंखला बचेगी, उपलब्धियों की नहीं। मैदान पर संघर्ष बल्ले और गेंद से तय होना चाहिए, विचारधाराओं और सत्ता समीकरणों से नहीं। क्रिकेट की एकता की रक्षा करना अनिवार्य है, क्योंकि यही इस खेल की सबसे बड़ी पहचान भी है और उसकी सबसे बड़ी विजय भी।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com



Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ