तस्वीर नहीं, व्यवस्था बदलनी है - निलंबन नहीं, इंसानियत बहाल करो
[शर्म का वीडियो वायरल हुआ, जवाबदेही का नहीं]
[वीडियो से नहीं, विवेक से डरो — तभी बदलाव आएगा]
मध्यप्रदेश श्योपुर जिले के विजयपुर विकासखंड के तिरंगापुरा मिडिल स्कूल में मिड-डे मील की शर्मनाक हकीकत सामने आई है। धूप में ज़मीन पर बैठे मासूम बच्चे, सामने बिछे रद्दी अख़बार के टुकड़े। उस पर रखी रोटी, थोड़ी दाल/सब्जी, और ऊपर से अख़बार पर छपी होगी — “विकास की रफ़्तार दोगुनी” जैसी खबरें; जो उनके भूख और हालात की सच्चाई से बिल्कुल उलझती हुई लगती हैं। बच्चे हाथ बढ़ाते हैं, स्याही लगती है उंगलियों पर, ज़हर घुलता है खाने में। यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं। यह उस वीडियो का सच्चाई है जो वायरल हुआ और पूरे तंत्र को हिला गया। पर असली सवाल यह नहीं कि यह हुआ — बल्कि यह है कि ऐसी सच्चाई अब तक छिपी कैसे रही?
जिस दिन वीडियो सामने आया — उसी दिन निलंबन हुए। जिस दिन कैमरा चला — उसी दिन जांच बैठी। और जिस दिन लाखों लोगों ने देखा — उसी दिन “सख़्त निर्देश” जारी कर दिए गए। यह कोई संयोग नहीं, यह व्यवस्था का डर है — कैमरे का डर, सोशल मीडिया का डर, जनता की नज़रों का डर। जब तक कोई फ़ोन नहीं उठा, जब तक किसी बच्चे ने रिकॉर्ड नहीं किया — तब तक यह सब यूँ ही चलता रहा। तो सवाल उठता है — क्या यह सिर्फ़ एक स्कूल की गलती थी, या पूरे सिस्टम की मिलीभगत? ना जाने कब से बच्चों को रद्दी अखबार पर खाना परोसा जा रहा था, निरीक्षक कहाँ थे? मॉनिटरिंग कमेटी कहाँ थी? और वह फंड, जो बच्चों के पोषण के नाम पर आता है — आखिर ग़ायब कहाँ हो गया?
बस एक बार गूगल पर “मिड-डे मील घोटाला” लिखिए — और सामने खुल जाएगी देश-प्रदेश के स्कूलों की कटु सच्चाई। कहीं दाल में कीड़े मिले, कहीं आटे में घुन, कहीं चावल में इल्लियाँ रेंगती दिखीं, कहीं सब्ज़ी से सड़ांध उठी — और कहीं मासूम बच्चों को आधी रोटी में पूरा दिन काटना पड़ा। सवाल यह है — क्या हर बार एक वीडियो ही आँखें खोलेगा? क्या हर गाँव को सच्चाई दिखाने के लिए एक पत्रकार चाहिए? नहीं। ज़रूरत है ऐसी निगरानी की मज़बूत ज़ंजीर की — जो हर स्कूल तक पहुँचे, हर रसोई में झाँके, हर थाली तक गिनती करे। ताकि सच्चाई कैमरे या वायरल वीडियो का मोहताज न रहे, ज़मीर की नज़र से देखी जाए।
निलंबन बस एक पर्दा है — जवाबदेही पर नहीं, शर्म पर डाला गया आवरण। चेहरे बदल दिए जाते हैं, लेकिन सिस्टम जस का तस रहता है। अगले हफ़्ते नया प्रभारी आएगा, और फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी। समाधान कार्रवाई नहीं, निगरानी है — वह भी स्थायी। हर स्कूल में सीसीटीवी हो, जिसकी लाइव फ़ीड अभिभावक अपने ऐप पर देख सकें। हर मिड-डे मील ग्रुप का ऑडिट हर 15 दिन में हो और रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए। हर बच्चे के अभिभावक को बिना सूचना के स्कूल में जाकर निरीक्षण करने का अधिकार मिले। और हर दिन परोसे गए भोजन की एक फ़ोटो अपलोड की जाए — जीपीएस और टाइमस्टैम्प सहित, ताकि जवाबदेही सिर्फ़ कागज़ों में नहीं, ज़मीनी हकीकत में दिखे।
ये बच्चे सिर्फ़ पेट नहीं भरते — वे देश का भविष्य गढ़ते हैं, सपनों को संवारते हैं, उम्मीदों को जीवन देते हैं। उनकी थाली केवल स्टील की नहीं होती, वह सम्मान, समानता और अधिकार का प्रतीक होती है। पर जब कोई बच्चा ज़मीन पर बैठकर रद्दी अख़बार पर खाना खाता है, तो वह निवाला नहीं खाता — अपना आत्मसम्मान निगलता है। उसे सिखाया जाता है — “तेरी जगह नीचे है, तू दूसरी श्रेणी का है।” यह सिर्फ़ भूख की नहीं, आत्मविश्वास, गरिमा और सपनों की हत्या है। और हर ऐसी थाली, जिस पर रोटी से पहले अपमान परोसा जाता है — उस पर पूरे तंत्र की नाकामी की छाप उभर आती है।
आज एक वीडियो ने सिस्टम को हिला दिया — पर बदलाव वो नहीं जो कैमरे दिखाएँ, बदलाव वो है जो कैमरा बंद होने के बाद भी कायम रहे। अब वक्त है निलंबन की फाइलें बंद करने का, और जवाबदेही की स्क्रीनें हमेशा चालू रखने का। हर बच्चे की थाली में सिर्फ़ रोटी नहीं, सम्मान, बराबरी और इंसाफ़ परोसने का। क्योंकि वीडियो वायरल होते हैं, लेकिन जख्म़ हमेशा भीतर रह जाते हैं। क्योंकि कैमरे एक दिन बंद हो जाएँगे — पर बच्चे की नज़र, उसका सवाल, उसकी याद कभी नहीं बंद होगी। और जब वही बच्चा बड़ा होकर पूछेगा — “आप कहाँ थे जब हमें अख़बार पर खाना परोसा गया?” तो उस दिन जवाब तैयार रखना चाहिए — “हमने तस्वीर नहीं, व्यवस्था बदली थी। हमने ऐसा सिस्टम बनाया था, जहाँ सच को वीडियो की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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