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Dr. Srimati Tara Singh
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मिट्टी मौन है, पर संकट मुखर — हम कब जागेंगे?

 

प्रसंगवश – 05 दिसम्बर: विश्व मृदा दिवस] - मिट्टी मौन है, पर संकट मुखर — हम कब जागेंगे?




मिट्टी मौन हैपर संकट मुखर — हम कब जागेंगे?

[मिट्टी: सभ्यता की मौन लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण नींव]

[उपजाऊ धरती का क्षय: सभ्यता के अस्तित्व पर बढ़ता खतरा]



हर सुबह जब सूरज की पहली किरण धरती के देह पर पड़ती है, हममें से शायद ही कोई ठहरकर यह सोचता है कि हमारे पैरों तले बिछी मिट्टी सिर्फ धूल का ढेर नहीं—एक धड़कता, सांस लेता, बहुस्तरीय ब्रह्मांड है। वही मिट्टी, जिसके भीतर अनगिनत अदृश्य जीव पलते हैं; जो हमारे भोजन का कण उगाती है; जो जल की हर बूंद को छानकर जीवनदायी बनाती है; जो पेड़ों को थामे रखती है और पृथ्वी के सूक्ष्म से विशाल हर चक्र को संतुलित करती है। विश्व मृदा दिवस हमें झकझोर कर याद दिलाता है कि यह मिट्टी वह अनसुनी, अनदेखी और लगभग भुला दी गई नायिका है, जिसके बिना कोई सभ्यता नींव नहीं पा सकती और कोई भविष्य आकार नहीं ले सकता।

दरअसल, मिट्टी निर्जीव कणों का ढेर नहीं— यह एक जीवित, जटिल और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है, जहां हर कण में जीवन की कहानी चलती है। एक मुट्ठी स्वस्थ मिट्टी में जितने सूक्ष्मजीव होते हैं, मानव जाति की कुल संख्या भी उनके आगे छोटी पड़ जाए। यही सूक्ष्मजीव, फंगी, केंचुए और जड़ें मिलकर एक अदृश्य संगीत रचते हैं—जो पौधों की वृद्धि, जल चक्र, पोषक तत्वों के प्रवाह और धरती की उर्वरता का पूरा तंत्र चलाता है। लेकिन विडंबना यह है कि यही मिट्टी आज सबसे भीषण संकट से गुजर रही है। हर पाँच सेकंड में एक फुटबॉल मैदान जितनी उपजाऊ मिट्टी हमारे हाथों से फिसलती जा रही है—कटाव, अंधाधुंध खेती, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की भेंट चढ़कर।

मानव इतिहास पर नजर डालें तो सभ्यताएँ मिट्टी की गोद में ही जन्मी और पनपी हैं। सिंधु घाटी की पकी ईंटें, मिस्र के पिरामिडों की नींव, माया सभ्यता की खेती—सब कुछ मिट्टी के भरोसे था। पर विडंबना यह है कि जिस मिट्टी ने हमें सभ्य बनाया, आधुनिकता की अंधी रफ्तार में हमने उसी को कभी न खत्म होने वाला संसाधन समझकर बेरहमी से निचोड़ डाला। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन की रिपोर्ट साफ चेतावनी देती है—दुनिया की लगभग 33% मिट्टी पहले ही क्षरण की चपेट में है। भारत में स्थिति और भी गंभीर है—हर साल 5.3 अरब टन उपजाऊ मिट्टी नदियों में बहकर या मरुस्थलीकरण की गिरफ्त में आकर खो जाती है। इतना ही नहीं, देश के अनाज भंडार कहे जाने वाले पंजाब और हरियाणा में भी मिट्टी का जैविक कार्बन 0.1–0.3% तक गिर गया है, जबकि स्वस्थ मिट्टी के लिए कम से कम 2% आवश्यक माना जाता है—यह गिरावट सिर्फ संख्या नहीं, आने वाले खतरे की स्पष्ट घंटी है।

हमने मिट्टी को खेतों की एक ‘उत्पादन मशीन’ समझ लिया—जितना खाद डालो, उतना उगाओ। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के लगातार प्रयोग ने मिट्टी के भीतर के जीव-जगत को लगभग सुन्न कर दिया। मिट्टी सख्त होती गई, उसकी पानी सोखने की क्षमता घटती गई, और नतीजतन सूखे और बाढ़ दोनों ही बढ़ते गए। वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है—यदि यही रफ्तार जारी रही तो 2050 तक पृथ्वी की 90% मिट्टी इतनी क्षतिग्रस्त हो जाएगी कि उसे पुनर्जीवित करना लगभग असंभव होगा। और इसका अर्थ केवल यह नहीं कि फसलें कम होंगी; इसका अर्थ है कि हम आने वाली पीढ़ियों से वह आधार छीन लेंगे, जिस पर पूरी मानव खाद्य सुरक्षा टिकी है।

लेकिन मिट्टी की कहानी केवल खतरे का ऐलान नहीं—नई उम्मीद का उजाला भी है। उसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह खुद को पुनर्जीवित कर सकती है—बस उसे मौका चाहिए। दुनिया भर में रीजेनरेटिव कृषि, जैविक खाद, फसल-चक्र, कवर-क्रॉपिंग और एग्रोफॉरेस्ट्री जैसे विकल्प साबित कर रहे हैं कि उत्पादन बढ़ाते हुए भी मिट्टी को बचाया जा सकता है। राजस्थान के सूखा–पीड़ित क्षेत्रों में जल-संरक्षण और प्राकृतिक खेती के मॉडल ने न सिर्फ किसानों को दोगुना उत्पादन दिया, बल्कि मिट्टी के भीतर मृतप्राय कार्बन को भी फिर से सांसें लेने का मौका दिया। केरल के पोखाली गाँव में महिलाओं ने स्थानीय बीजों, कम्पोस्ट और परंपरागत खेती पद्धतियों से यह दिखा दिया कि मिट्टी को जीवित करना किसी बड़ी तकनीक का नहीं, सही दृष्टिकोण का सवाल है। देश के कई कोनों में ‘किचन गार्डन’ और ‘मिट्टी बैंक’ जैसी पहलें शहरों को भी इस पुनरोद्धार की मुहिम का सक्रिय हिस्सा बना रही हैं।

विश्व मृदा दिवस का उद्देश्य सिर्फ जागरूकता नहीं—एक जनआंदोलन की शुरुआत करना है। हमें समझना होगा कि हर प्लास्टिक की थैली जो हम जमीन में फेंक देते हैं, हर रासायनिक छिड़काव जो खेत में करते हैं, वह धीरे-धीरे मिट्टी के पेट में जहर बनकर उतरता है, जो आने वाले कल की जड़ों को खोखला करता है। अब समय है कि हम मिट्टी की गरिमा को फिर से स्थापित करें—केंचुओं की वापसी का मार्ग खोलें, खेतों में नमी संजोने वाली तकनीकों को अपनाएँ, और खाद का स्रोत उद्योग नहीं, अपने ही खेतों और रसोई के अपशिष्ट को बनाएं। शहरों के लिए यह समय है कि बालकनी, छत और छोटे खाली स्थानों को मिट्टी की प्रयोगशाला बनाया जाए, जहां बच्चे और बड़े दोनों समझें कि सब्जियाँ दुकान में नहीं, मिट्टी में पैदा होती हैं।

मिट्टी आज भी मौन है, लेकिन उसकी यह चुप्पी किसी निष्क्रियता की नहीं—एक गहरी, करुण पुकार की है। वह कहती है—“मैंने तुम्हें सहारा दिया, तुम्हें पाला, तुम्हें जीवन दिया, तुम्हारे घर-आंगन को थामे रखा; अब मेरी रक्षा तुम्हारे हाथ में है।” विश्व मृदा दिवस हमें यही याद दिलाता है कि यह दिन कोई औपचारिकता नहीं—यह मानव अस्तित्व की सबसे मूलभूत लड़ाई का उद्घोष है। आज हम जो रास्ता चुनेंगे, वही आने वाली पृथ्वी की शक्ल तय करेगा। इसलिए आवश्यक है कि हम संकल्प लें—अगली बार जब यह दिन लौटे, हम सिर उठाकर कह सकें कि हमने मिट्टी को खोखला करने नहीं, उसे फिर से सांसें लौटाने की दिशा चुनी है। क्योंकि जिस दिन मिट्टी ने हार मान ली, उसी दिन मानव सभ्यता का अंतिम अध्याय लिखना शुरू हो जाएगा—और उस भयावह क्षण से पहले जागना, समझना और कार्रवाई करना हमारी साझा ज़िम्मेदारी है।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

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