Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मनुष्य का पहला धर्म

 

  स्वयं के प्रति ईमानदार होना

[धर्म नहीं, अंतर्दृष्टि मनुष्य को बदलती है]

[जो स्वयं को खो देता है, वही भगवान को खोजता फिरता है]


दिन का कोलाहल सत्य को दबा सकता है, पर रात का सन्नाटा उसे जगा देता है। जब सारी आवाज़ें थम जाती हैं, तब मनुष्य अपनी ही अंतरात्मा के न्यायालय में खड़ा होता है, जहाँ न बहाने चलते हैं, न मुखौटे टिकते हैं। दिनभर तर्क और धर्म की ओट लेने वाला मन अंततः एक ही प्रश्न से घिरता है—आज तुमने सच में कितना जिया और कितना खो दिया? विडंबना यह है कि इसी आत्म-पड़ताल से बचने के लिए हम कहते हैं—"भगवान सब देख रहा है।" यदि इस पर सच्चा विश्वास होता, तो विचार, कर्म और व्यवहार की छोटी-छोटी बेईमानियाँ स्वयं समाप्त हो जातीं। क्योंकि सबसे बड़ी चोरी किसी और की नहीं, अपने ही जीवन की होती है। हम अपने वर्तमान, अपनी सच्चाई, अपनी मुस्कान और अपने अस्तित्व को ही धीरे-धीरे लूटते रहते हैं, फिर भी स्वयं को निर्दोष मानते हैं।

ईश्वर का नाम अक्सर वहीं सबसे अधिक लिया जाता है, जहाँ विश्वास कम और भय अधिक होता है। जब कोई कहता है—"भगवान सब देख रहा है," तो उसके शब्दों से अधिक उसका डर बोलता है। हमने परमात्मा को प्रेम का स्रोत नहीं, अपराध पकड़ने वाला प्रहरी बना दिया है। जबकि प्रेम पहरा नहीं देता और करुणा भय नहीं जगाती। भय अभिनय सिखाता है, चरित्र नहीं; इसलिए बाहर धर्म दिखता है और भीतर छल पलता है। सच तो यह है कि परमात्मा कोई दंडाधिकारी नहीं, बल्कि हृदय का मौन साक्षी है, जहाँ दंड नहीं, केवल करुणा है। हम उसकी पुकार सुनने के बजाय भय जगाने वाले धार्मिक वाक्यों में उलझे रहते हैं।

जीवन की सबसे बड़ी बेईमानियाँ अक्सर इतनी साधारण होती हैं कि हम उन्हें अपराध ही नहीं मानते। हर सुबह हम अपना वर्तमान भविष्य की चिंताओं और बीते कल की परछाइयों में गिरवी रख देते हैं। किसी का मन दुखाकर उसे मज़ाक कह देते हैं, वचन भूल जाते हैं, परिवर्तन टालते हैं, भय से अपनी प्रतिभा दबा देते हैं और संबंधों में अधूरे रह जाते हैं। दिन तो बीत जाता है, पर रात की निस्तब्धता में भीतर की चेतना एक ही प्रश्न करती है—"तुमने दूसरों के साथ नहीं, अपने ही जीवन के साथ क्या किया?" यही वह प्रश्न है, जिसके सामने हर तर्क, बहाना और मुखौटा ढह जाता है।

एक प्राचीन प्रसंग है। वन में भटका एक बालक अँधेरा घिरते ही भयभीत हो गया। उसने एक फकीर से पूछा—"क्या भगवान मुझे देख रहे हैं?" फकीर ने उसका हाथ उसके हृदय पर रखकर कहा—"सबसे निकट की दृष्टि यहीं जाग रही है।" उसी क्षण उसका भय शांत हो गया, क्योंकि उसे समझ आ गया कि संरक्षण बाहर नहीं, भीतर है। हम भी जीवनभर मंदिरों, नियमों और बाहरी सहारों में सुरक्षा खोजते रहते हैं, जबकि परमात्मा का सबसे पवित्र देवालय हमारे अंतर्मन में ही प्रकाशित है। जिस दिन मनुष्य भीतर के उस मौन साक्षी से परिचित हो जाता है, उसी दिन उसकी बेईमानियाँ स्वतः मिटने लगती हैं; क्योंकि तब उसे डराने वाला कोई बाहरी देवता नहीं, जगाने वाला अपना विवेक होता है।

मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह अपना ही जीवन खोकर भी स्वयं को धर्ममार्गी मानता रहता है। वह वर्तमान, माता-पिता का समय, बच्चों का बचपन, मित्रों का विश्वास और संबंधों की आत्मीयता गँवा देता है। भय से अपनी प्रतिभा पर ताला लगाकर फिर निश्चिंत हो कहता है—"भगवान सब देख रहा है, वह क्षमा कर देगा।" किंतु परमात्मा क्षमा से अधिक जागृति चाहता है। जहाँ चेतना जागती है, वहाँ भूलें स्वयं मिटने लगती हैं। जिस क्षण मनुष्य अपने हर विचार, शब्द और कर्म में भीतर के मौन साक्षी का अनुभव कर लेता है, उसी क्षण जीवन बदल जाता है—कर्म पूजा बन जाता है, वाणी प्रार्थना और मौन आत्मबोध।

यहीं से जीवन की वास्तविक यात्रा आरंभ होती है। भय प्रेम में, बंधन स्वतंत्रता में और स्वार्थ उत्तरदायित्व में बदल जाता है। तब मनुष्य दूसरों पर अधिकार नहीं, अपने समय, संबंधों, चेतना और जीवन का सजग संरक्षक बनता है। "भगवान सब देख रहा है" तब डराने वाला वाक्य नहीं, स्वयं को जगाने वाला मंत्र बन जाता है। जो लोग इस सत्य को जी लेते हैं, उनके शब्द भय या अपराधबोध नहीं, बल्कि विश्वास और आत्मबोध जगाते हैं। क्योंकि तब अनुभव होता है कि देखने वाला और देखा जाने वाला अलग नहीं, एक ही चेतना के दो प्रतिबिंब हैं।

जब भी सुनें—"भगवान सब देख रहा है," तो उसे दूसरों के लिए नहीं, अपने लिए सुनिए। एक क्षण ठहरकर स्वयं से पूछिए—क्या मैं अपने समय, अपने सत्य, अपने संबंधों और अपने वर्तमान के साथ न्याय कर रहा हूँ, या स्वयं को ही छल रहा हूँ? इन प्रश्नों से मत बचिए, क्योंकि परिवर्तन का द्वार यहीं खुलता है। जो अपनी भीतरी चोरियों को पहचान लेता है, उसे उन्हें छोड़ने में देर नहीं लगती। तब जीवन का भार हल्का हो जाता है, हर कर्म साधना, हर संबंध उपहार और हर साँस कृतज्ञता की प्रार्थना बन जाती है।

संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा अंततः एक ही सत्य पर आकर ठहरती है—परमात्मा की दृष्टि दंड की नहीं, करुणा की होती है। वह हमारी भूलों का हिसाब रखने नहीं, भीतर सोई चेतना को जगाने आती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि भगवान हमें देख रहा है या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या हम स्वयं को देख पा रहे हैं? जिस दिन यह अंतर्दृष्टि जाग जाती है, उसी दिन छल, पाखंड और दिखावा स्वतः समाप्त होने लगते हैं। तब भय समर्पण में, अशांति शांति में और भ्रम सत्य में विलीन हो जाता है। उसी क्षण मनुष्य पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित होता है—निर्मल, अखंड और पूर्णतः मुक्त।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com




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