Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

लाडकी बहीण योजना

 

लाडकी बहीण योजना – भाईचारा बेमिसाल

[लाडकीबाई से लाडका भाऊ तक – योजना की दास्तान]



जब सरकारें योजना बनाती हैं, तो जनता लाभ उठाती है। लेकिन जब योजना बहनों  के लिए हो और लाभ भाइयों  को मिल जाए, तो समझिए कि हम प्रगति की उस सीढ़ी पर चढ़ चुके हैं जहाँ लिंगभेद का पूर्ण अंत हो चुका है – कम से कम बैंक खाते में। 

महाराष्ट्र में ‘लाडकी बहीण योजना’ एक नेक उद्देश्य के साथ शुरू हुई थी कि समाज की बेटियों को आर्थिक संबल मिले, उनके विकास में रुकावट न आए, और माता-पिता बेटी होने पर दुखी न हों। योजना चल निकली। मंत्री जी ने घोषणा की, "अब हर लाडकी को मिलेगा सशक्तिकरण का चैक!" लेकिन शायद मंत्री जी यह भूल गए कि भारत की जनता योजना की लाडली नहीं, चतुर बहन है।

कुछ समझदार पुरुषों ने योजना का उद्देश्य तो पूरी श्रद्धा से समझा — "लाडकी बहनों के लिए पैसा" — पर उस उद्देश्य को अपने लाभ के चश्मे से देखा। कहते हैं, भावना को समझने के लिए हृदय चाहिए, लेकिन लाभ समझने के लिए आधार कार्ड, बैंक खाता और एक अदद जुगाड़ काफी होता है।

और जुगाड़ की तो क्या कहें! किसी ने खुद को "भावनात्मक रूप से महिला" घोषित कर दिया, किसी ने कहा "हमारा नाम लाडकू नहीं, लाडकी है – आधार पर टाइपो है", और किसी ने गाँव की सबसे बुज़ुर्ग महिला को गोद ले लिया – सिर्फ इसलिए कि उसका खाता पहले से योजना में शामिल था।

अब जब मंत्री जी ने खुद स्वीकार कर लिया है कि पुरुषों के खातों में पैसा गया है, तो इससे यह स्पष्ट होता है कि योजना सिर्फ "लाडकी बहीण" नहीं, "लाडका भाऊ" के लिए भी उतनी ही संवेदनशील थी। आखिर समता और समरसता की मिसाल इसी को तो कहते हैं!

एक गाँव में जब बैंक अधिकारी ने किसी रमेश भाऊ से पूछा, "तुम योजना के लिए पात्र कैसे हो सकते हो?" तो उन्होंने सीना चौड़ा कर कहा, "हमारे घर में दो बहनें हैं, उनकी चिंता में हम बीमार रहते हैं, तो ये पैसा हमारी चिंता की दवा है!" अधिकारी कुछ नहीं बोले, शायद वह भी योजना के 'लाभार्थी' थे।

सरकारें अक्सर कहती हैं कि योजना की निगरानी के लिए पुख़्ता इंतज़ाम हैं। और वह इंतज़ाम भी इतने पुख़्ता हैं कि जब तक जनता खुद सोशल मीडिया पर रील नहीं बनाती या टीवी डिबेट में मुंह से नहीं कहती — "हां भैय्या, पैसा मेरे खाते में आया", तब तक किसी को भनक तक नहीं लगती।

और रही बात नाम की, तो इसमें भी जनता ने कमाल कर दिखाया। एक महाशय ने अपनी बेटी का नाम रखा "लाडकीबाई" और योजना में दो बार आवेदन किया — एक बार खुद के नाम से और दूसरी बार बेटी के नाम से। जब अधिकारी ने पूछा, "दोनों के नाम एक जैसे क्यों हैं?", उन्होंने जवाब दिया, "हम परंपरा के अनुसार नाम रखते हैं, और परंपरा दो बार भी आ सकती है!"

ऐसा नहीं है कि यह सब बिना साजिश के हो गया। यह तो भारतीय प्रतिभा की वह झलक है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'जुगाड़' नाम से जाना जाता है और जिसे सरकारें योजनाओं में कभी रोक नहीं पाई हैं।

इस पूरी गड़बड़ी के बाद जब एक पत्रकार ने मंत्री से पूछा कि "अब क्या कार्रवाई होगी?", तो मंत्री जी बोले – "हमने जाँच समिति बना दी है, और जल्द ही दोषियों के खिलाफ सख़्त कदम उठाए जाएंगे।" यह सुनते ही जनता मुस्कुरा दी — क्योंकि भारत में ‘जाँच समिति’ बनना, ठीक वैसा ही है जैसे घर में छत टपकने पर 'फोटो खींचकर' छत को मरम्मत के लिए प्रेरित करना।

अब जब योजना का लाभ पुरुषों को भी मिल गया है, तो कुछ उत्साही संगठनों ने सरकार से अनुरोध किया है कि इसका नाम बदलकर "लाडकी-लाडका समता योजना" कर दिया जाए, ताकि सबको लगे कि भारत वाकई एक समभाव वाला राष्ट्र बन चुका है।

तो अगली बार जब कोई योजना आए, तो आप तैयार रहिए – क्योंकि उद्देश्य चाहे जो भी हो, असली खेल तो खाता नंबर और आधार लिंकिंग का है। और इसमें जो तेज़ है, वही सच्चा ‘लाडका’ है – चाहे योजना किसी की भी हो। 


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)


Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ