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Dr. Srimati Tara Singh
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क्या सभ्यता अब भी युद्ध से सीखना नहीं चाहती?

 

क्या सभ्यता अब भी युद्ध से सीखना नहीं चाहती?

[खून, आँसू और ध्वस्त बचपन: युद्ध की असली कीमत]



जब युद्ध की खबरें हवाओं में तूफान बनकर गूँजती हैं, तो वे महज हथियारों की कर्कश गर्जना, सैन्य रणनीतियों की बर्फीली चालबाजियाँ या सत्ता के क्रूर खेल की दास्तानें नहीं लातीं। वे लाती हैं—मूक आँसुओं का कराहता समंदर, टूटे सपनों की हृदयविदारक सिसकियाँ और उन अनगिनत जिंदगियों की त्रासदी, जो युद्ध की लपटों में राख बनकर बिखर जाती हैं। एक मासूम बच्चा, जो किताबों की स्याही के बजाय बारूद की गंध में खोया है, बमों की गूँज में सिहरता है। एक माँ, जो अपने लाल के लिए रोटी की जगह सिर्फ़ भय और अनिश्चितता का अंधेरा जुटा पाती है। एक बुजुर्ग, जो अपने जीवन की सारी मेहनत को मलबे के ढेर में दफ़न होते देखता है, बेबस और लाचार। इनके अनमोल दर्द की कीमत कौन चुकाएगा? युद्ध की चकाचौंध में आम इंसान की पुकार, उसकी आहट, कहीं गुम हो जाती है। 

युद्ध, मानव सभ्यता का वह काला साया है, जो सदियों से उसका पीछा करता आया है। प्रथम विश्व युद्ध ने 1 करोड़ जिंदगियों को लील लिया, तो द्वितीय विश्व युद्ध ने 4-5 करोड़ मासूमों को अपनी क्रूर भेंट चढ़ा दिया। क्या यह दिल दहलाने वाली त्रासदी महज इतिहास की धूल भरी किताबों तक सिमटी है? कदापि नहीं। आज यूक्रेन-रूस संघर्ष की गूँज और इज़राइल-हमास युद्ध की चीखें हमें बार-बार उस कटु सत्य से रूबरू कराती हैं—युद्ध का सबसे बड़ा शिकार हमेशा आम इंसान होता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) की रिपोर्ट चीख-चीखकर बताती है कि फरवरी 2025 तक यूक्रेन में 10,000 से अधिक निर्दोष नागरिक मौत के आगोश में समा चुके हैं, 20,000 से ज्यादा घायल हुए हैं, और असल संख्या इससे भी कहीं अधिक भयावह हो सकती है। 1.4 करोड़ लोग अपनी जड़ों से उखड़कर बेघर हो गए, जिनमें 60 लाख शरणार्थी पड़ोसी देशों में आश्रय की तलाश में भटकने को मजबूर हैं। 

गाजा की तस्वीर मानवता के माथे पर एक ऐसा दाग है, जो रक्त और आँसुओं से लिखा गया है। गाजा स्वास्थ्य मंत्रालय के जनवरी 2025 के आँकड़े दिल दहलाने वाली सच्चाई उजागर करते हैं—43,000 से अधिक जिंदगियाँ युद्ध की भेंट चढ़ चुकी हैं, जिनमें 60% से ज्यादा मासूम महिलाएँ और बच्चे हैं। 23 लाख की आबादी में से 19 लाख लोग अपनी जड़ों से उखड़कर बेघर भटक रहे हैं, और 70% बुनियादी ढाँचा—घर, स्कूल, अस्पताल—मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। ये आँकड़े महज ठंडी संख्याएँ नहीं, बल्कि टूटे हुए सपनों की सिसकियाँ, बिखरे हुए परिवारों की चीखें और छिनी हुई जिंदगियों की कराह हैं। 

युद्ध केवल जिंदगियों का काल नहीं, बल्कि सभ्यता का वह क्रूर विध्वंसक है, जो समाज के हर ताने-बाने को तार-तार कर देता है। विश्व बैंक के 2024 के अनुमान चीख-चीखकर बताते हैं कि यूक्रेन की अर्थव्यवस्था $150 अरब से अधिक के नुकसान के बोझ तले दब चुकी है। स्कूलों के दरवाजे बंद, अस्पताल मलबे में तब्दील, बाजारों की रौनक खामोश—आमजन की आजीविका युद्ध की भट्टी में राख हो गई। गाजा का दृश्य और भी हृदयविदारक है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की रिपोर्ट के अनुसार, 80% आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर है, जहाँ भुखमरी, बेरोजगारी और बेघरी की त्रासदी ने लाखों लोगों को जीते-जी मृत्यु के कगार पर ला खड़ा किया है। भारत के इतिहास पर नजर डालें, तो प्रथम विश्व युद्ध में 8 लाख भारतीय सैनिकों ने अपनी जान जोखिम में डाली, जिनमें 47,746 ने अपनी आहुति दी और 65,000 घायल हुए। उस दौर में आम भारतीय अकाल, भारी करों और औपनिवेशिक शोषण की चक्की में पिसता रहा। आज भी, भारत-चीन सीमा तनाव और कश्मीर में अशांति की खबरें सीमावर्ती गाँवों के लिए रोज़मर्रा का डर बनकर मंडराती हैं। 

युद्ध का जहर न केवल शरीर को छलनी करता है, बल्कि मन, आत्मा और संस्कृति को भी रौंद डालता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की चेतावनी बताती है कि युद्धग्रस्त क्षेत्रों में 20-30% लोग पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) की चपेट में आते हैं, जहाँ दिमाग़ में बार-बार लौटने वाली भयावह यादें जीवन को नरक बना देती हैं। यूक्रेन में बच्चों और महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ 40% तक बढ़ चुकी हैं, जो हर रात बमों की गूँज और अपनों के खोने के दर्द में सिसकते हैं। गाजा का दृश्य और भी हृदयविदारक है—यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, 90% बच्चे मानसिक तनाव की ऐसी गिरफ्त में हैं कि उनका बचपन बमों की आवाज़ और मौत की छाया में दम तोड़ रहा है। सांस्कृतिक विनाश का घाव भी कम गहरा नहीं। सीरिया के गृहयुद्ध ने 500 से अधिक सांस्कृतिक धरोहरों को मलबे में बदल दिया, जबकि यूक्रेन में, यूनेस्को के 2024 के आँकड़ों के मुताबिक, 250 से ज्यादा सांस्कृतिक स्थल युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं। ये महज पत्थर और इमारतें नहीं, बल्कि समुदायों की पहचान, इतिहास की साँसें और आने वाली पीढ़ियों का गौरव हैं, जो युद्ध की आग में स्वाहा हो रहे हैं। 

यमन का गृहयुद्ध, जो 2015 से मानवता को लहूलुहान कर रहा है, 3.77 लाख जिंदगियों को निगल चुका है, जिनमें 70% मासूम नागरिक थे—वह बच्चे, माएँ और बुजुर्ग, जिनका गुनाह बस इतना था कि वे गलत समय पर गलत जगह थे। लेकिन वैश्विक मंचों पर यह त्रासदी महज ठंडे आँकड़ों का हिस्सा बनकर रह जाती है। भूख से बिलखते बच्चे, बीमारी से जूझते परिवार, और बेघर होकर सड़कों पर भटकते लोग—इनकी चीखें क्या कोई सुनता है? संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस और डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स जैसे संगठन राहत के लिए जूझते हैं, मगर उनकी कोशिशें समंदर में बूँद सरीखी हैं। गाजा में 2024 में मात्र 30% आवश्यक सहायता ही पहुँच सकी, बाकी सब युद्ध की भट्टी में जल गया। जेनेवा संधि जैसे अंतरराष्ट्रीय कानून नागरिकों की रक्षा की दुहाई देते हैं, पर इनका उल्लंघन अब रोज़मर्रा की बात हो चुकी है। ड्रोन हमले और साइबर युद्ध जैसे नए खतरे आम इंसान की जिंदगी को और भी भयावह बना रहे हैं। भारत, जो शांति का पक्षधर है और यूएन शांति मिशनों में सबसे अधिक सैनिक भेजता है, फिर भी अपने सीमावर्ती गाँवों में रहने वाले लोग युद्ध की आशंका के साये में हर साँस लेते हैं। 

युद्ध की खबरें महज रणनीतियों का शोर या सत्ता का क्रूर खेल नहीं; वे उन लाखों बिखरे सपनों, टूटी जिंदगियों और मूक चीखों की गूँज हैं, जो अपने घर, आशाएँ और अपनों को खो चुके हैं। गाजा में 43,000 मौतें और यूक्रेन में 1.4 करोड़ विस्थापित लोग—ये ठंडे आँकड़े नहीं, बल्कि मानवता के माथे पर लगे वो जख्म हैं, जो हमें ललकारते हैं। आम इंसान की कराह को सुनना, उनकी हिफाज़त को सर्वोपरि रखना और युद्ध की आग को थामने के लिए ठोस कदम उठाना—यही आज का सबसे ज्वलंत कर्तव्य है। अगर हम इन बेबस आवाज़ों को अनसुना छोड़ देंगे, तो कल हमारी मानवता का भविष्य अंधेरे की गर्त में डूब जाएगा। यह सवाल हर दिल को झकझोरता है—और इसका जवाब हमारी साझा ज़िम्मेदारी में छिपा है, जो हमें आज, अभी, एकजुट होकर जवाब देना होगा।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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