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जंगलों की मौत का नया पता

 

जंगलों की मौत का नया पता—सोशल मीडिया का काला बाजार

[ऑनलाइन बाजार में बदलते जंगल और बेघर होते वन्यजीव]

[सोशल मीडिया के साए में पनपता वन्यजीव तस्करी का साम्राज्य]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


जंगलों का सन्नाटा अब पेड़ों में नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर कैद दिखता है। दुर्लभ पक्षियों, अजगर, पेंगोलिन और बाघों के अंगों की तस्वीरें बताती हैं कि वन्य जीवन अब डिजिटल बाजार का माल बन चुका है। मानव जुड़ाव के लिए बने सामाजिक मंच आज अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी के सबसे सुरक्षित अड्डे बन गए हैं। उंगलियों की मामूली स्क्रॉलिंग के साथ यह काला कारोबार कानून और धरती की जैव संपदा—दोनों को निगल रहा है। ग्लोबल इनिशिएटिव अगेंस्ट ट्रांसनेशनल ऑर्गनाइज़्ड क्राइम की रिपोर्ट ‘वाइल्डलाइफ़ हैज़ अ फेसबुक प्रॉब्लम’ के अनुसार अप्रैल 2024 से मार्च 2026 के बीच 22 हजार से अधिक जंगली जीवों और उनके अंगों की ऑनलाइन खरीद-बिक्री के विज्ञापन मिले। इनमें लगभग 75 प्रतिशत गतिविधियां अकेले फेसबुक पर दर्ज हुईं, जिनका अवैध कारोबार करीब 6.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। 

ये केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उस डिजिटल अराजकता का चेहरा हैं जहां कानून, नैतिकता और प्रकृति हार रहे हैं। जैव संपदा से समृद्ध भारत अब वन्यजीव तस्करों का आसान ठिकाना बनता जा रहा है। पेंगोलिन की खाल, बाघ के नाखून, भालू की पित्ताशय तथा दुर्लभ पक्षियों और सरीसृपों का अवैध व्यापार सामाजिक मंचों पर खुलेआम चल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, फेसबुक पर बिक्री के लिए मिले लगभग 84 प्रतिशत जीव ऐसे थे, जिनका अंतरराष्ट्रीय व्यापार कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडेंजर्ड स्पीशीज़ के परिशिष्ट-एक के तहत प्रतिबंधित है, फिर भी उनकी खरीद-बिक्री जारी है। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि इनमें  आधे से अधिक प्रजातियां “अत्यंत संकटग्रस्त” या “संकटग्रस्त” श्रेणी में हैं। विडंबना यह है कि कठोर वन्यजीव कानूनों वाले भारत में भी फेसबुक जैसे मंचों पर ये नियम लगभग बेअसर हैं।

वन्यजीव तस्करी का यह अंधेरा केवल अपराधियों की चालाकी नहीं, सामाजिक मंचों की नाकामी भी है। फेसबुक का तंत्र अब तस्करों की ढाल बन चुका है। बंद समूह, गुमनाम खाते, संदिग्ध सामग्री को बढ़ावा देने वाले एल्गोरिदम और कमजोर निगरानी इस अपराध को खुली छूट दे रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 76 प्रतिशत अवैध गतिविधियां बंद समूहों में संचालित हो रही हैं। एक बार ऐसा विज्ञापन दिखते ही एल्गोरिदम वैसी ही और सामग्री फैलाने लगता है, जिससे अपराध का जाल लगातार फैलता जाता है। तस्कर कोड भाषा, प्रतीकों और “विदेशी पालतू” जैसे शब्दों से निगरानी को आसानी से धोखा दे देते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि 2018 में ‘कोएलिशन टू एंड वाइल्डलाइफ़ ट्रैफिकिंग ऑनलाइन’ से जुड़कर 80 प्रतिशत कमी का दावा करने वाला फेसबुक 2026 तक इस संकट को क्यों नहीं रोक सका।

वन्यजीव तस्करी केवल कुछ जीवों के घटते अस्तित्व का संकट नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति पर प्रहार है। पेंगोलिन आज दुनिया का सबसे अधिक तस्करी किया जाने वाला स्तनपायी बन चुका है और भारत में इसकी दोनों प्रजातियां गंभीर खतरे में हैं। सीमित संख्या में बचे बाघ भी अंधविश्वास और पारंपरिक उपचार की मांग के कारण लगातार शिकार बन रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार अवैध व्यापार में सरीसृपों की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत और पक्षियों की 40 प्रतिशत है। इन जीवों को जंगलों से छीनना केवल एक प्रजाति का अंत नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर करना है। खाद्य श्रृंखला टूटते ही जंगल, जलवायु और अंततः मानव जीवन भी संकट में पड़ जाता है।

मोबाइल स्क्रीन के पीछे फैलता यह काला कारोबार अब केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराधों का बड़ा तंत्र बन चुका है। इससे अर्जित धन आतंकवाद, हथियार तस्करी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों तक पहुंचता है। सोशल मीडिया ने इसे तेज, सरल और सुरक्षित बना दिया है। स्क्रीन स्क्रॉल करने वाला सामान्य व्यक्ति भी अनजाने में इसका हिस्सा बन जाता है। यही डिजिटल अपराध की सबसे भयावह सच्चाई है—यहां विनाश दिखता नहीं, लेकिन बेहद गहरा होता है। फेसबुक जैसे मंच तस्करों के लिए ऐसा बाजार बन गए हैं, जहां कानून कमजोर और मुनाफा बेहिसाब है।

भारत में यह संकट और गहरा है, क्योंकि यहां इंटरनेट और सोशल मीडिया का विस्तार बेहद तेज़ हुआ है। गांवों से शहरों तक करोड़ों लोग फेसबुक से जुड़े हैं। तस्कर स्थानीय भाषाओं, छोटे शहरों के खातों और क्षेत्रीय समूहों के सहारे पुलिस व वन विभाग की निगरानी से आसानी से बच निकलते हैं। ‘ट्रेड रिकॉर्ड्स एनालिसिस ऑफ फ्लोरा एंड फौना इन कॉमर्स’ और ‘वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर’ की पूर्व रिपोर्टें भी भारत को वन्यजीव तस्करी के स्रोत और मांग—दोनों बाजारों के रूप में चिन्हित कर चुकी हैं। अब यह खतरा जंगलों और सीमाओं से निकलकर सीधे मोबाइल स्क्रीन तक पहुंच गया है। जंगल सिमट रहे हैं, जैव विविधता संकट में है, फिर भी डिजिटल तस्करी का जाल लगातार फैल रहा है। यह तकनीकी अपराधों से निपटने की हमारी कमजोर तैयारी को उजागर करता है।

मोबाइल स्क्रीन पर फैलते इस अदृश्य अपराध को अब केवल चेतावनियों से नहीं रोका जा सकता। मेटा प्लेटफॉर्म्स को दावों से आगे बढ़कर सक्रिय निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पहचान प्रणाली और स्थानीय एजेंसियों के साथ त्वरित सहयोग सुनिश्चित करना होगा। भारतीय सरकार को साइबर इकाइयों को वन्यजीव तस्करी की डिजिटल जांच का विशेष प्रशिक्षण देना चाहिए। वन विभाग, पुलिस और तकनीकी संस्थाओं के बीच मजबूत समन्वय भी जरूरी है। साथ ही लोगों को ऐसे विज्ञापनों की पहचान और तुरंत शिकायत के लिए जागरूक करना होगा। विद्यालयों और महाविद्यालयों में डिजिटल नैतिकता तथा पर्यावरणीय जिम्मेदारी को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना समय की मांग है।

जंगलों की धड़कनें जब बाजार की वस्तु बनने लगें, तब खतरा केवल वन्यजीवों पर नहीं, मानव सभ्यता की संवेदना पर भी होता है। यदि यह तस्करी यूं ही बढ़ती रही, तो आने वाली पीढ़ियां जीवित जंगल नहीं, केवल स्क्रीन पर उभरती तस्वीरें देख पाएंगी। फेसबुक जैसी कंपनियों की संरचनात्मक विफलताएं और समाज की चुप्पी इस अपराध को लगातार बल दे रही है। अब समय केवल देखने और आगे बढ़ जाने का नहीं, बल्कि प्रतिरोध का है। प्रकृति बार-बार चेतावनी दे रही है—आज की अनदेखी कल जंगलों की जीवंत धड़कनों की जगह केवल स्क्रीन पर उभरती मृत तस्वीरें रह जाएंगी।



प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

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