[प्रसंगवश – 06 अगस्त: जलपुरुष राजेंद्र सिंह का जन्मदिन]
सूखी धरती का संकल्पनायक: जलपुरुष राजेंद्र सिंह
[जहाँ नदियाँ इतिहास से वर्तमान बनीं: जलपुरुष राजेंद्र सिंह का पुनर्जनन यज्ञ]
पानी की एक-एक बूंद में जीवन की सांस, सूखी धरती पर हरियाली का स्वप्न और समाज को जगाने की अटल जिद—यह है ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह की प्रेरक गाथा। 6 अगस्त 1959 को उत्तर प्रदेश के बागपत के डौला गांव में जन्म लेकर राजस्थान की बंजर भूमि को जीवन का आलिंगन दिया। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतना हैं, जो कहती है कि अगर इरादा पक्का हो, तो सूखी नदियां फिर से गीत गा सकती हैं और बंजर खेत फसलों से लहलहा सकते हैं। ‘जलपुरुष’ के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह ने न केवल पानी को बचाया, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को यह सिखाया कि प्रकृति और मानवता का रिश्ता अटूट है। उनकी यह यात्रा केवल जल संरक्षण की नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण के प्रति प्रेम की है, जो हर दिल को छूती है और हर मन को प्रेरित करती है।
राजस्थान— वह धरती, जहां सूखा जीवन का पर्याय था, कुएं खामोश थे और नदियां केवल लोककथाओं में सिमटी थीं। ऐसे में राजेंद्र सिंह ने वह कर दिखाया, जो असंभव प्रतीत होता था। न सरकारी योजनाओं की बाट जोही, न विदेशी तकनीकों का सहारा लिया। उनका सबसे बड़ा हथियार था—लोगों का विश्वास और सामूहिक श्रम। अपने चार साथियों—नरेंद्र, सतेन्द्र, केदार और हनुमान—के साथ उन्होंने तरुण भारत संघ को जल संरक्षण और ग्रामीण सशक्तिकरण का प्रतीक बनाया। उनकी रणनीति सरल थी, पर प्रभाव इतना गहरा कि राजस्थान की तस्वीर बदल गई। जोहड़, तालाब और चेकडैम जैसी प्राचीन जल संरचनाओं को उन्होंने आधुनिक दृष्टिकोण से पुनर्जनन दिया। यह केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति थी, जिसने ग्रामीणों को उनके संसाधनों का सच्चा स्वामी बनाया।
चुनौतियों का पहाड़ सामने था। गांववाले राजेंद्र सिंह के विचारों को हवाई ख्वाब मानते थे—कुछ ने हंसी उड़ाई, कुछ ने समय की बर्बादी करार दिया। मगर राजेंद्र सिंह का इरादा अडिग रहा। उन्होंने समझाया कि पानी की कमी प्रकृति का कोप नहीं, मानव की लापरवाही का परिणाम है। उनकी बातों ने धीरे-धीरे दिलों को छुआ, और गांववाले उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़े। जोहड़ बनने शुरू हुए, और फिर चमत्कार साकार हुआ। सूखे कुओं में पानी की लहरें गूंजीं, बंजर खेत हरियाली से मुस्कुराए, और गांवों में जीवन की रौनक लौट आई। यह केवल पर्यावरण का पुनर्जनन नहीं, बल्कि एक नई चेतना का उदय था, जिसने लोगों को सिखाया कि बदलाव का बीज जमीनी स्तर पर ही बोया जाता है।
आंकड़े उनके काम की महानता को चीख-चीखकर बयां करते हैं। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में राजेंद्र सिंह ने 1,000 से अधिक गांवों में 6,500 से ज्यादा जोहड़ और चेकडैम बनवाए। इन संरचनाओं ने भूजल स्तर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और अरावरी, रूपारेल, सासा व भगानी जैसी नदियों को पुनर्जनन दिया। अरावरी नदी, जो कभी कहानियों में सिमटी थी, आज फिर बहती है—राजेंद्र की मेहनत और सामुदायिक एकता का जीवंत प्रतीक। उनके प्रयासों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जागृत किया। खेती फिर से लाभकारी बनी, पलायन रुका और गांववासियों में आत्मविश्वास जगा कि वे अपनी तकदीर खुद लिख सकते हैं।
राजेंद्र सिंह की सोच जल संरक्षण तक सीमित नहीं थी; वे जल, जंगल और जमीन को समाज की धड़कन मानते थे। उनका अटल विश्वास था कि जब तक ये संसाधन समाज के पास हैं, तभी सच्ची स्वतंत्रता जीवित है। लेकिन जब ये निजी कंपनियों या मुनाफाखोर ताकतों के चंगुल में जाते हैं, तो यह आधुनिक गुलामी का नया चेहरा है। उन्होंने जल निजीकरण के खिलाफ बुलंद आवाज उठाई और उन नीतियों की कड़ी निंदा की, जो पानी को बाजार का माल बनाती हैं। उनकी यह विचारधारा आज, जब जलवायु परिवर्तन और जल संकट वैश्विक आपदा बन चुके हैं, पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। उनका मानना था कि जल पर समाज का अधिकार अडिग होना चाहिए, क्योंकि पानी जीवन का आधार है, मुनाफे का साधन नहीं।
उनके कार्यों की गूंज स्थानीय सरहदों को पार कर वैश्विक मंच तक पहुंची। 1998 में ‘द वीक’ ने उन्हें ‘मैन ऑफ द ईयर’ का सम्मान दिया। 2001 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, जिसे एशिया का नोबेल कहा जाता है, उनके नाम रहा। 2005 में जमनालाल बजाज पुरस्कार ने उनके ग्रामीण विकास में योगदान को रेखांकित किया। 2015 में स्टॉकहोम वॉटर प्राइज, जल संरक्षण का सबसे प्रतिष्ठित वैश्विक सम्मान, उन्हें प्रदान किया गया। 2016 में अहिंसा पुरस्कार ने उनके समावेशी और अहिंसक दृष्टिकोण को सलाम किया। ये सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं, बल्कि उस दर्शन की जीत हैं, जो प्रकृति और समाज को एक-दूसरे का अभिन्न अंग मानता है।
आज, जब पानी की बोतलें दूध से भी महंगी हो चुकी हैं और नदियां प्रदूषण व लापरवाही की भेंट चढ़ रही हैं, राजेंद्र सिंह का जीवन एक प्रज्वलित मशाल की तरह हमें राह दिखाता है। उन्होंने सिद्ध किया कि विशाल बजट, जटिल तकनीक या सरकारी सहायता के बिना भी क्रांतिकारी बदलाव संभव है। उनकी सफलता का मूल मंत्र था—सादगी, सामुदायिक एकता और प्रकृति के प्रति गहन संवेदना। उन्होंने न केवल जल को संरक्षित किया, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को यह विश्वास दिलाया कि दृढ़ संकल्प के साथ बंजर धरती भी जीवन से लहलहा सकती है।
राजेंद्र सिंह को केवल ‘जलपुरुष’ कहना उनके विराट योगदान को सीमित करना होगा। वे एक जीवंत आंदोलन हैं, एक प्रेरणा का स्रोत, जो हमें सिखाता है कि परिवर्तन की शुरुआत एक छोटे से कदम से हो सकती है—एक जोहड़, एक तालाब, एक गांव से। उनका जीवन यह संदेश देता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही सच्ची प्रगति का मार्ग है। जब हम पानी की हर बूंद को सहेजते हैं, तो हम न केवल अपनी धरती को बचाते हैं, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध भविष्य का निर्माण भी करते हैं। राजेंद्र सिंह का संघर्ष और उनकी दूरदर्शी सोच आज भी हमें प्रेरित करती है कि एकजुट होकर कोई भी चुनौती अजेय नहीं। उनका जीवन एक ऐसी दीपशिखा है, जो हर उस व्यक्ति को मार्ग दिखाती है, जो इस धरती को हरा-भरा और जीवंत देखना चाहता है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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