जैसलमेर बस अग्निकांड: आग नहीं, लापरवाही ने ली 21 जिंदगियाँ
[आग की लपटों में सवाल: क्या बसें कब्रगाह बनती रहेंगी?]
राजस्थान के जैसलमेर जिले में एक चलती हुई एसी स्लीपर बस अचानक आग का गोला बन जाती है, तो वह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की लापरवाही का आईना है। 14 अक्टूबर को जैसलमेर से जोधपुर की ओर दौड़ रही यह बस—जो महज पांच दिन पहले नई खरीदी गई थी और स्लीपर में तब्दील की गई—अचानक धधक उठी। चालक को रोकने का मौका न मिला, मुख्य दरवाजा जाम हो गया, खिड़कियां तोड़ने की हताश कोशिशें विफल रहीं, और नतीजा? 21 लोग, जिनमें तीन मासूम बच्चे शामिल, जिंदा जलकर प्राण त्याग बैठे। बाकी यात्री 70% तक झुलस चुके थे, इलाज के दौरान कई और दम तोड़ गए। यह कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि क्रूर हकीकत है जो सिस्टम की कमियों को उजागर करती है—क्या नई बसों की सुरक्षा जांच, इमरजेंसी एग्जिट और अग्निरोधी सामग्री पर कोई सख्ती है? यह सवाल पीड़ित परिवारों को तो तोड़ रहा है, पूरे देश को झकझोर रहा है। ऐसे कांड बार-बार दोहरा रहे हैं: 2023 में महाराष्ट्र के समृद्धि एक्सप्रेसवे पर 25 यात्रियों की जलमृत्यु, 2013 में तेलंगाना के महबूबनगर का वोल्वो बस अग्निकांड जहां 45 जिंदगियां खाक हो गईं, या 2023 में दिल्ली-जयपुर हाईवे की बस फायर। इनसे क्या हमने सबक लिया? या लापरवाही की यह खतरनाक चेन अनंत तक चलेगी, और नई-नई जानें दांव पर लगती रहेंगी?
जैसलमेर हादसे की शुरुआत एक मामूली चिंगारी से हुई—एसी सिस्टम में शॉर्ट सर्किट की आशंका—मगर यह क्षणभर में मौत का भयावह तांडव बन खड़ा हुआ। बस के पिछले हिस्से से धुआं उमड़ पड़ा, चालक ने इमरजेंसी ब्रेक लगाया, किंतु आग ने कुछ ही सेकंडों में वाहन को लपटों में समेट लिया। पुलिस जांच से साफ है कि एकमात्र मुख्य दरवाजा तपिश से जाम पड़ गया, यात्री फंसकर चीखते-चिल्लाते रहे। आइल में ढेर मिले शव—भागने की व्यर्थ कोशिशों के जीवंत साक्ष्य। स्थानीय लोग, राहगीर और सेना के जवान बचाव में कूद पड़े, लेकिन फायर ब्रिगेड की 45 मिनट की घातक विलंब ने बहुमूल्य सेकंड्स में अनगिनत जानें निगल लीं। कुल 57 यात्री—परिवारों समेत पर्यटक—मौत के जबड़ों में; डीएनए टेस्टिंग से ही शवों की पहचान, क्योंकि भयंकर जलन ने चेहरों तक को मिटा डाला। पीएमएनआरएफ से मृतकों को 2 लाख, घायलों को 50 हजार रुपये—ये रकम दर्द की गहराई में बौनी। राज्य सरकार ने फिटनेस सर्टिफिकेट की लापरवाही के लिए दो अधिकारियों को निलंबित किया, जबकि जांच समिति कन्वर्शन, मेंटेनेंस और इलेक्ट्रिकल खामियों की परतें उघाड़ रही है। किंतु ये कदम अपर्याप्त हैं—यह सिस्टम की जड़ों तक फैली सड़न का खुला प्रमाण है।
ऐसी विपत्तिपूर्ण घटनाओं से प्राप्त सबक हृदयस्पर्शी और बहुआयामी होते हैं, जो मानव जीवन की नाजुकता को उजागर करते हैं। सर्वोपरि शिक्षा यह है कि सुरक्षा कभी प्रतिबंधित नहीं होनी चाहिए—यह जीवनरक्षा का अटल कवच है। भारत के सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार, 2023 में 4.8 लाख भयावह सड़क हादसों ने 1.73 लाख प्राण हर लिए, जिनमें वाहन अग्निकांड एक क्रूर हत्यारा सिद्ध हुए। जैसलमेर जैसी त्रासदीपूर्ण घटनाएँ चीख-चीख कर चेतावनी देती हैं कि अनटेस्टेड नई तकनीकें, जैसे एसी कन्वर्शन, घातक जाल बुन सकती हैं। प्रथम सबक, वाहन डिजाइन में फायर-सेफ्टी को सर्वोच्च प्राथमिकता दें—यह मृत्यु के दाँतों से बचाव का हथियार है। बसों में एकमात्र दरवाजा होना तो मृत्यु को स्वयं आमंत्रित करना है! यूरोपीय बस नियमों की भाँति, कम से कम दो इमरजेंसी एग्जिट—एक अग्रभाग में, एक पश्च में—अनिवार्य हैं। भारत का एआईएस-135 मानक विद्यमान है, किंतु उसका पालन ढीला-ढाला, जिससे विपदा निमंत्रित होती है। महाराष्ट्र के 2024 बस अग्निकांड के बाद एआरएआई (ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया) ने स्लीपर कोच डिजाइन की कठोर समीक्षा की, जिसमें फ्लेम रिटार्डेंट सामग्रियों (जैसे ब्रोमिनेटेड कंपाउंड्स) का बाध्यकारी उपयोग सिफारिश किया गया। द्वितीय सबक, मेंटेनेंस की उपेक्षा घातक विषैली साँप की तरह प्रहार करती है। वह बस मात्र चार यात्राओं पुरानी थी, तथापि शॉर्ट सर्किट ने ज्वाला का तांडव रच दिया—कारण? दोषपूर्ण वायरिंग या अप्रूव्ड एसी स्थापना। पुरानी त्रासदियों से प्रेरित होकर, 2013 महबूबनगर हादसे के पश्चात तेलंगाना सरकार ने प्राइवेट बसों हेतु मासिक इलेक्ट्रिकल जाँच अनिवार्य की, जिससे अग्निकांड 20% तक ठहर गए—यह है सतर्कता की विजय!
जैसलमेर के इस भयानक हादसे ने साफ उजागर किया कि सुरक्षा के नाम पर खिलवाड़ कितना घातक साबित हो सकता है। सबसे बड़ी कमी थी इमरजेंसी एग्जिट की पूर्ण अनुपस्थिति। बस में ब्रेकेबल विंडोज तो थे, मगर यात्रियों के पास तोड़ने का न तो समय था और न ही कोई टूल। नतीजा? आग ने महज मिनटों में सब कुछ लील लिया। दूसरी घातक चूक फायर एक्सटिंग्विशर की अनुपलब्धता रही। जांच रिपोर्ट्स से पता चला कि जो एक्सटिंग्विशर थे, वे केवल ड्राइवर तक सीमित थे—यात्रियों की सीटों पर एक भी नहीं। आग लगते ही कोई त्वरित कार्रवाई असंभव हो गई। तीसरी समस्या, ड्राइवर और कंडक्टर के अपर्याप्त प्रशिक्षण की। कंडक्टर ने वीरतापूर्वक कई यात्रियों को दरवाजा खोलकर बचाया, लेकिन सामान्य ट्रेनिंग में फायर ड्रिल जैसी बुनियादी तैयारी का अभाव था। चौथी कमी, इलेक्ट्रिकल सिस्टम की खराबी से जुड़ी। नई कन्वर्टेड बस में एसी गैस लीक होने से आग ने रफ्तार पकड़ी, क्योंकि कोई सेफ्टी ऑडिट ही नहीं हुआ था। पांचवीं, इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम की कमजोरी—फायर ब्रिगेड की देरी ग्रामीण इलाकों की पुरानी समस्या है, जहां स्टेशन दूर होने से बचाव में घंटों लग जाते हैं। छठी, ओवरलोडिंग और अनियमित परमिट ने हालात बिगाड़े; 57 यात्री सवार थे, जबकि स्लीपर कोच की क्षमता सिर्फ 40 की थी। सातवीं, कमी यात्रियों में जागरूकता की कमी—कोई फायर अलार्म या एग्जिट का सही इस्तेमाल नहीं जानता था। आठवीं, कानूनी ढील—मोटर व्हीकल एक्ट 1988 में फायर सेफ्टी के प्रावधान हैं, लेकिन उनका पालन और एनफोर्समेंट नाममात्र का। नौवीं, मैन्युफैक्चरिंग फॉल्ट—नई बस में चाइनीज पार्ट्स की क्वालिटी चेक ही नहीं हुई। दसवीं चूक पोस्ट-हादसा मैनेजमेंट की—शवों की पहचान में देरी ने पीड़ित परिवारों का दर्द दोगुना कर दिया।
इन कमियों को जड़ से मिटाने के लिए हर स्तर पर कड़े कदम उठाने होंगे। वाहन मालिकों को बस खरीदते समय एआईएस-152 फायर सेफ्टी सर्टिफिकेशन अनिवार्य रूप से जांचना चाहिए। एसी या कोई मॉडिफिकेशन तभी करें जब एआरएआई-अप्रूव्ड हो, वरना आग का खतरा बढ़ जाता है। हर बस में कम से कम दो ब्रेकेबल इमरजेंसी एग्जिट लगाएं—विंडोज पर हैमर या लिवर हमेशा उपलब्ध रखें। फ्लोर, सीट कवर फ्लेम-रिटार्डेंट मटेरियल से बने हों, इलेक्ट्रिकल वायरिंग हाई-टेम्परेचर रेसिस्टेंट हो और शॉर्ट सर्किट प्रिवेंटर इंस्टॉल हो। मेंटेनेंस में लापरवाही न बरतें: मासिक चेकलिस्ट से बैटरी, वायरिंग और एसी गैस लेवल की जांच करें। एक्सटिंग्विशर हर 10 सीटों पर एबीसी टाइप (ड्राई केमिकल) रखें, जो इलेक्ट्रिकल फायर पर सबसे प्रभावी है। ड्राइवर-कंडक्टर को आरटीओ द्वारा सालाना फायर ड्रिल सेशन अनिवार्य करें, जिसमें सिमुलेटेड आग में एग्जिट प्रैक्टिस शामिल हो। यात्री भी सजग रहें, बस में चढ़ते ही एग्जिट लोकेशन नोट करें, फायर अलार्म का सही इस्तेमाल सीखें। लंबी यात्रा में इमरजेंसी नंबर (100, 101) सेव रखें। धुआं दिखे तो घुटनों के बल रेंगकर निकलें—धुआं ऊपर चढ़ता है। बच्चों और बुजुर्गों को प्राथमिकता दें, ताकि जानें बच सकें। सरकार सड़क परिवहन मंत्रालय के माध्यम से जीपीएस-ट्रैकिंग सभी बसों में अनिवार्य करे, जिससे हादसे पर लोकेशन तुरंत मिले। ग्रामीण इलाकों में फायर ब्रिगेड नेटवर्क विस्तार करें—हर 50 किमी पर स्टेशन स्थापित करें। प्राइवेट बस परमिट में फायर ऑडिट क्लॉज जोड़ें। लापरवाही पर सजा कड़ी हो - 5-10 साल जेल और भारी जुर्माना। जागरूकता अभियान चलाएं—स्कूलों, स्टेशनों पर पोस्टर, वीडियो से फायर सेफ्टी सिखाएं।
ऐसे प्रयास पहले भी हुए, लेकिन अपर्याप्त। 2022 में इलेक्ट्रिक व्हीकल फायर के बाद एसएमईवी (सोसाइटी ऑफ मैन्युफैक्चरर्स ऑफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) को नोटिस जारी कर रिकॉल अनिवार्य किए गए। महाराष्ट्र ने समृद्धि हादसे पर एक्सप्रेसवे में स्पीड कैमरा और फायर पॉइंट्स लगाए, तेलंगाना ने 2013 हादसे के बाद ड्राइवर ट्रेनिंग एकेडमी खोली। जैसलमेर से सीख लें: कार्रवाई हेडलाइंस के बाद न हो, तुरंत हो। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करें, ताकि सबक सभी को मिले। जैसलमेर हादसा चेतावनी है—सुरक्षा खर्चा नहीं, निवेश है। 2017-2023 में भारत में 27,000 से अधिक फायर मौतें हुईं, यह शर्मनाक आंकड़ा है। डिजाइन से ड्रिल तक हर कदम पर सबक लें, तो आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित यात्रा करेंगी। पीड़ितों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सुनिश्चित करें कि उनकी मौत व्यर्थ न जाए। सरकार, ऑपरेटर और नागरिक—सभी की यह साझा जिम्मेदारी है। आग की लपटें ठंडी हों और जिंदगियां गर्म रहें—यही सच्ची प्रगति है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY