एक देह का विदा होना, कई घरों में सूर्योदय बन सकता है
[जिसे हम शव कहते हैं, वह किसी का जीवन बन सकता है]
[जब व्यवस्था संवेदनशील होती है, तब मृत्यु भी जीवन बाँटती है]
· प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
जीवन का सबसे कठिन संघर्ष अक्सर अस्पताल की चारदीवारी के भीतर लिखा जाता है, जहाँ हर साँस उम्मीद और समय के बीच अंतिम संवाद बन जाती है। कहीं माँ की प्रार्थनाएँ बेटे की धड़कनों का सहारा हैं, कहीं पिता की आँखें बेटी के लिए एक अंग की प्रतीक्षा में हैं, तो कहीं एक मासूम अनजान है कि उसका कल किसी अजनबी के निर्णय पर टिका है। विज्ञान ने एक देह से कई जीवनों को फिर धड़काने की शक्ति पा ली है, लेकिन संवेदनहीन व्यवस्था सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। इसलिए भारत में अंगदान केवल चिकित्सा नहीं, हमारी सामूहिक मानवता की परीक्षा है। जब तक यह संवेदना सशक्त नीतियों में नहीं उतरती, तब तक प्रतीक्षा सूची का हर नाम किसी मरीज का नहीं, बल्कि अधूरी ज़िंदगी की मौन पुकार बना रहेगा।
संवेदनशील समाज केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि करुणा को व्यवस्था का आधार बनाता है। अमेरिका के मिशिगन राज्य ने इसे कानून का रूप दिया है। वहाँ जीवित अंगदाता बनने वाले कर्मचारी के लिए नियोक्ता को 12 सप्ताह के वेतन के बराबर टैक्स क्रेडिट मिलता है। यह केवल आर्थिक प्रोत्साहन नहीं, बल्कि जीवन बचाने के निर्णय का सम्मान है। इससे कर्मचारी को न नौकरी खोने का डर रहता है, न आय घटने की चिंता, और नियोक्ता भी बिना अतिरिक्त बोझ के उसका साथ दे सकता है। भारत में निजी क्षेत्र के अनेक कर्मचारी इच्छा होने पर भी आर्थिक असुरक्षा के कारण अंगदान का साहस नहीं जुटा पाते। ऐसे में यह मॉडल संवेदना और व्यवस्था का प्रभावी उदाहरण बन सकता है।
भारत की सबसे बड़ी कमी अंगदान की इच्छा नहीं, बल्कि उसे संभव बनाने वाली व्यवस्था है। अधिकांश प्रत्यारोपण आज भी जीवित रिश्तेदारों के दान पर निर्भर हैं, जबकि मृतक अंगदान की दर प्रति मिलियन आबादी पर एक से भी कम है। हर वर्ष लगभग 1.6 लाख सड़क दुर्घटना मौतों के बावजूद केवल 1,000–1,200 मृतक अंगदान हो पाते हैं। इसके विपरीत, स्पेन ने यह दर 48 प्रति मिलियन तक पहुँचा दी है। नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (नॉटो) के अनुसार 2025 में लगभग 20 हजार प्रत्यारोपण हुए, जबकि आवश्यकता इससे कहीं अधिक है। हर वर्ष लाखों लोग अंगों की प्रतीक्षा में दम तोड़ देते हैं। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि अंगदान को राष्ट्रीय सामाजिक संपदा न मानने वाली नीतिगत सोच का परिणाम है। जहाँ लोग अंगों के अभाव में मरें, वहाँ संकट संसाधनों का नहीं, दृष्टिकोण का होता है।
किसी अनजान को जीवन देने का साहस तभी जन्म लेता है, जब व्यवस्था सुरक्षा का विश्वास दे। भारत में अंगदान की सबसे बड़ी बाधा चिकित्सा नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा है। परिवार की हिचक, उपचार का खर्च, लंबी रिकवरी और नौकरी का भय लोगों को पीछे हटा देता है। मिशिगन मॉडल इसी समस्या का समाधान देता है। यदि भारत में भी कंपनियों को कर प्रोत्साहन मिले, तो वे कर्मचारियों को सवेतन अवकाश दे सकेंगी। आज 82 हजार से अधिक लोग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा में हैं, जबकि एक मृतक अंगदाता आठ से दस जीवन बचा सकता है। कई बार एक संवेदनशील नीति, हजारों अपीलों से अधिक जीवन बचा देती है।
यदि भारत इस दिशा में निर्णायक पहल करे, तो उसका प्रभाव केवल प्रत्यारोपण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व की परिभाषा भी बदलेगी। अस्पताल बनाना और उपकरण दान करना महत्वपूर्ण है, पर अब अपने कर्मचारियों की जीवनदायी संवेदना को संरक्षण देना भी आवश्यक है। मिशिगन की तर्ज पर कर प्रोत्साहन मिलने पर कंपनियाँ सवेतन अवकाश के साथ उपचार, रिकवरी और पुनर्वास में सहयोग दे सकेंगी। यह ऐसा निवेश होगा, जिसका प्रतिफल बैलेंस शीट में नहीं, बल्कि बची हुई धड़कनों और लौटी मुस्कानों में दिखाई देगा। इसके साथ नॉटो और राज्य स्तरीय अंगदान नेटवर्क का विस्तार भी आवश्यक है, ताकि दान और प्रत्यारोपण के बीच समय की दूरी घट सके।
भारत के कुछ राज्यों ने साबित किया है कि अंगदान की दिशा संसाधनों से नहीं, संकल्प और सुदृढ़ व्यवस्था से बदलती है। तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना इसके उदाहरण हैं, जबकि उत्तर और पूर्वी भारत के कई राज्य अब भी पीछे हैं। मध्य प्रदेश सरकार दानकर्ताओं को ‘गॉड ऑफ ऑनर’ का सम्मान देकर उन्हें समाज का हीरो बनाती है। यह अंतर सुविधाओं से अधिक नीतिगत प्राथमिकताओं का है। यदि केंद्र सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ समान राष्ट्रीय नीति लागू करे, तो यह असमानता सिमट सकती है। भरोसेमंद प्रत्यारोपण तंत्र न केवल लाखों जीवन बचाएगा, बल्कि भारत को वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल टूरिज्म का विश्वसनीय केंद्र भी बना सकता है।
स्थायी परिवर्तन तब जन्म लेते हैं, जब नीति, समाज और संस्थाएँ एक ही लक्ष्य के साथ आगे बढ़ती हैं। अंगदान भी इसका अपवाद नहीं है। सरकार नीतिगत संरक्षण दे, उद्योग जगत आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करे और स्वयंसेवी संस्थाएँ जनजागरण का दायित्व निभाएँ—यही साझेदारी इस अभियान को जनआंदोलन बना सकती है। भारत में 4.8 लाख से अधिक नागरिक मृत्यु के बाद अंगदान के लिए पंजीकरण करा चुके हैं। यह प्रमाण है कि संवेदना का अभाव नहीं, बल्कि भरोसे की कमी है। जिस दिन हर दानकर्ता परिवार को सम्मान और सुरक्षा का विश्वास मिलेगा, उसी दिन यह संख्या कई गुना बढ़ सकती है।
आख़िरकार प्रश्न केवल अंगदान का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो करुणा को साहस में बदल सके। भारत में अंगदान अब केवल व्यक्तिगत सद्कर्म नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति और सामाजिक सहभागिता का विषय बनना चाहिए। मिशिगन का मॉडल बताता है कि नीतिगत संरक्षण मिलने पर संवेदना हजारों परिवारों के लिए आशा बन जाती है। प्रतीक्षा सूची का हर नाम केवल एक मरीज नहीं, बल्कि पूरे परिवार के अधूरे भविष्य का प्रतीक है। आवश्यकता केवल अंगदान बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जहाँ जीवन बचाने वाला व्यक्ति स्वयं असुरक्षा का शिकार न बने। जिस दिन यह विश्वास स्थापित होगा, अंगदान अभियान नहीं, भारत की मानवीय चेतना का स्वाभाविक संस्कार बन जाएगा।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
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