जब सुरक्षा सिर्फ़ शब्द बन जाए, और मौत आम हो जाए
[गुलशन की मौत: लापरवाही का पूर्व-निर्धारित परिणाम]
[जानलेवा मांझा: प्रतिबंध के बावजूद बची कौन-सी जिम्मेदारी?]
इंदौर की सड़क पर 16 साल के गुलशन का बहता हुआ खून सिर्फ एक हादसे की कहानी नहीं था—यह उस सिस्टम की नाकामी का लाल छींटों वाला सबूत था, जो हर आदेश को कागज़ पर तो लिख देता है, पर ज़मीन पर लागू करने की ताक़त कभी नहीं जुटा पाता। चार दिन पहले का प्रतिबंध, कलेक्टर की सख़्त हिदायतें, और पशु कल्याण बोर्ड ऑफ इंडिया की सिफारिशों के बाद 2024 से लागू राष्ट्रीय पाबंदी—ये सब उस वक्त ध्वस्त हो गए, जब एक जानलेवा मांझा हवा में तैरता हुआ एक बच्चे की गर्दन कूट गया। क्योंकि कानून नहीं, कार्रवाई ज़िंदगियाँ बचाती है—और कार्रवाई वहीं मर जाती है, जहाँ जिम्मेदारी सिर्फ फाइलों में दर्ज रह जाती है।
उस दिन सड़क पर जो हुआ, उसने साफ़ कर दिया कि हमारी संस्थाओं की प्राथमिकताएँ कहीं और हैं; जनता की सुरक्षा उनमें शामिल ही नहीं। एक नाबालिग बच्चा दर्द से कराहता हुआ घुटनों के बल गिरा, उसकी नसें कट चुकी थीं; उसका दोस्त, जो उसे बचाने की कोशिश कर रहा था, खुद खून में लथपथ हो गया; और कुछ ही पलों में एक परिवार की दुनिया हमेशा के लिए अंधेरे में डूब गई। यह सिर्फ मौत नहीं थी, यह हमारी सामूहिक विफलता का सबसे क्रूर प्रमाण था।
यह घटना सिर्फ “चाइनीज मांझे ने काटा” जैसी साधारण पंक्ति नहीं है, यह एक कठोर सवाल है। जवाब देना होगा उस दुकानदार को जिसने प्रतिबंध जानते हुए मांझा बेचा; उस अधिकारी को जिसने नियम बनाए, पर लागू नहीं किए; उस खरीदार को जिसने खतरा समझकर भी इसे उठाया; और उस नागरिक को जिसने सब देखते हुए मौन रखा। प्रतिबंधित मांझे का खुलेआम बिकना इस बात का प्रमाण है कि मौत का यह कारोबार जनता और प्रशासन—दोनों की आंखों के सामने फलता रहा, और रोकने की जिम्मेदारी कोई निभाने को तैयार नहीं था।
गुलशन दोस्तों के साथ लौट रहा था। एक सामान्य, खुशहाल रविवार, जिसमें कोई मौत की परछाई तक नहीं देख सकता था। सड़क पर तैरती एक पतली-सी डोरी ने किसी की जीवनरेखा छीन ली। कांच और नायलॉन से लिपटा यह मांझा अब पतंग काटने का साधन नहीं, बल्कि जान लेने के लिए तैयार खतरनाक हथियार बन चुका है। दोस्तों ने इसे हटाने की कोशिश की, पर उसकी धार इतनी भयानक थी कि उंगलियां फट गईं। इससे बड़ा सबूत और क्या चाहिए कि यह मांझा किसी भी सामान्य उपयोग के लायक नहीं, बल्कि एक जानलेवा हथियार है?
अब बात जिम्मेदारियों की—सबसे पहले प्रशासन की। कलेक्टर ने 25 नवंबर को प्रतिबंध जारी किया। आदेश सही है, मगर आदेश केवल कागज पर नहीं, कार्रवाई में लागू होता है। यदि चार दिन बाद भी यह मांझा बाजार में बिक रहा था, इसका अर्थ साफ़ है—प्रशासन ने आदेश लागू करने में विफलता दिखाई। दुकानों पर कड़ी जांच नहीं हुई, गोदामों में छापे नहीं पड़े, और पुलिस ने सक्रिय रूप से बाजार का निरीक्षण नहीं किया। जब प्रतिबंध के बावजूद कोई उत्पाद बिक रहा है, तो यह केवल दुकानदार की गलती नहीं—यह प्रशासन की गहरी चूक है। और जितनी बड़ी चूक, उतना ही गंभीर परिणाम।
दूसरी जिम्मेदारी दुकानदारों की है। यह कोई मासूम व्यापार नहीं। जब कोई दुकानदार जानता है कि यह वस्तु जानलेवा है और फिर भी इसे बेचता है, तो वह सिर्फ़ नियम तोड़ने वाला नहीं—वह संभावित हत्यारा है। इस मांझे पर प्रतिबंध इसलिए लगाया गया क्योंकि यह पक्षियों की जान लेता है, लोगों की उंगलियां काटता है, और दोपहिया चालकों की गर्दन चीर सकता है। क्या कुछ रुपये की कमाई किसी की जिंदगी से ज्यादा कीमती हो सकती है? लेकिन कई दुकानदारों के लिए इसका जवाब “हाँ” है, और यही हमारी सामाजिक जड़ का सबसे काला सच है।
तीसरी जिम्मेदारी उपभोक्ताओं की है। हम वर्षों तक यह झूठ मानते रहे कि “जो मज़ा काटने वाले मांझे में है, वह सूती में नहीं।” लेकिन जब वही मज़ा किसी की जान ले ले, तब इसका क्या अर्थ बचता है? चेतावनी, राष्ट्रीय प्रतिबंध—सब बेअसर, क्योंकि युवा इस मांझे को रोमांच के नाम पर खरीदते हैं। माता-पिता अपनी आंखें बंद कर लेते हैं, बच्चों की खरीद पर ध्यान नहीं देते। यह लापरवाही भी अपराध के बराबर है। क्योंकि जब खरीद नहीं होगी, तो बिक्री अपने आप बंद हो जाएगी।
पुलिस की बात करें तो अक्सर हम देखते हैं कि घटना के बाद जांच शुरू होती है। लेकिन असली सवाल यही है—घटना से पहले रोकथाम क्यों नहीं? अगर पुलिस सक्रिय होती, तो बाजार में प्रतिबंधित मांझे की बिक्री पकड़ी जा सकती थी। जांच का मतलब केवल एफआईआर दर्ज करना नहीं होता है; इसका असली मकसद है—भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस ढांचा बनाना।
और अंत में, समाज की भूमिका। पूरे शहर में हर कोई जानता है कि चाइनीज मांझा प्रतिबंधित है। कई लोग जानते हैं कि कौन-सी दुकानें इसे बेचती हैं। फिर भी कोई रिपोर्ट नहीं करता, कोई विरोध नहीं करता। यही चुप्पी इन जानलेवा हादसों को जन्म देती है। हम तब चिल्लाते हैं, जब खून बह चुका होता है। जबकि समाज की असली जिम्मेदारी तभी शुरू होती है जब खतरा पहली बार दिखाई देता है।
सच यह है कि यह घटना “दुर्घटना” नहीं, बल्कि “लापरवाही का पूर्व-निर्धारित परिणाम” थी। यह चेतावनी है कि यदि अब भी नहीं जागे, तो आने वाले समय में गुलशन जैसे और बच्चे हमारी अखबारों की सुर्खियों में आएंगे—उसी मांझे से कटी हुई गर्दन के साथ। अब बहाने नहीं, कार्रवाई का समय है। प्रतिबंधित मांझे की बिक्री पर पूर्ण छापेमारी हो, दोषियों पर कठोरतम दंड लगे (गैर जमानती), उपभोक्ताओं को जवाबदेह बनाया जाए, और समाज सक्रिय होकर समस्या की जड़ तक पहुँचे।
कानून लिखने से सुरक्षा नहीं मिलती। सुरक्षा तब मिलती है जब जिम्मेदारी किसी का विकल्प नहीं, बल्कि उसकी आदत बन जाए। गुलशन की मौत हमें यह सिखा रही है कि चेतावनी और नियम तभी असर करते हैं जब उन पर ईमानदारी से अमल किया जाए। हमें मिलकर यह तय करना होगा कि अब कोई और बच्चा इन नायलॉन के धागों का शिकार न बने। यह केवल संकल्प नहीं, हमारी साझा जिम्मेदारी है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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