इतिहास का पलटवार: अब भारत देता है, ब्रिटेन लेता है
[लूट से नेतृत्व तक: ब्रिटेन के दरवाज़े पर भारत की दस्तक]
कभी वह दौर था, जब सूरज ब्रिटिश साम्राज्य पर नहीं डूबता था और भारत उसका सबसे कीमती लूट का रत्न था। दिल्ली, कोलकाता और मद्रास के खून-पसीने से लंदन की सड़कें चमकती थीं। जहाजों में ठूंसे गए भारतीय संसाधन और मजदूर ब्रिटेन के कारखानों में गुलामों-सा खटते थे। ब्रिटिश अहंकार दहाड़ता था कि भारत उनके बिना एक कदम भी नहीं चल सकता। लेकिन 10 अक्टूबर को, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर 125 उद्योगपतियों के साथ मुंबई की धरती पर उतरे, इतिहास ने पलटा खाया। आज भारत लूट का शिकार नहीं, बल्कि ब्रिटेन को निवेश का सहारा देने वाला शक्तिशाली राष्ट्र है। 64 भारतीय कंपनियों ने 1.3 बिलियन पाउंड (लगभग 13,800 करोड़ रुपये) के निवेश का ऐलान किया, जो ब्रिटेन में 6,900 नौकरियां पैदा करेगा। यह महज आर्थिक सौदा नहीं, बल्कि एक पूर्व उपनिवेश की वह हुंकार है, जो औपनिवेशिक शासक को घुटनों पर ला रही है। आइए, आंकड़ों और तथ्यों के साथ इस ऐतिहासिक क्षण की गहराई में उतरें।
18वीं सदी से 1947 तक, ब्रिटेन ने भारत को लूट का खुला अड्डा बनाए रखा। इतिहासकार यू.टी. पटेल के अनुसार, ब्रिटिश शासन ने भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर (आज की कीमतों में) की संपदा चुराई। कपास, चाय, नील और अफीम के साथ भारतीय मजदूरों को भी जहाजों में भरकर अमानवीय हालात में ब्रिटेन भेजा गया। 1700 में वैश्विक जीडीपी में भारत की 25% हिस्सेदारी 1947 तक 3% पर सिमट गई। ब्रिटिश नीतियों ने भारत को जानबूझकर पिछड़ा रखा—रेलवे लूट के लिए, शिक्षा क्लर्क गढ़ने के लिए। मगर स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी नियति खुद लिखी। 1991 के उदारीकरण से लेकर डिजिटल इंडिया तक, भारत ने आत्मनिर्भरता का रास्ता चुना। आज विश्व बैंक के आंकड़े गवाही देते हैं: 3.7 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि 3.3 ट्रिलियन पर ठहरे ब्रिटेन को पछाड़ चुका है। यह उलटफेर संयोग नहीं, बल्कि दशकों की मेहनत और नीतिगत सुधारों का परिणाम है।
8-9 अक्टूबर को कीर स्टार्मर का भारत दौरा कूटनीति से कहीं बढ़कर था—यह ब्रिटेन की आर्थिक मजबूरी का जीवंत दस्तावेज था। उनके साथ आए 125-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में बीपी, रोल्स-रॉयस और बीटी जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वार्ता में जुलाई 2025 में हस्ताक्षरित यूके-इंडिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) की समीक्षा हुई, जो 99% भारतीय निर्यात को ड्यूटी-फ्री पहुंच देता है। इस दौरे की सबसे बड़ी उपलब्धि थी 1.3 बिलियन पाउंड के निवेश की घोषणा, जिसके तहत 64 भारतीय कंपनियां ब्रिटेन में 6,900 नौकरियां सृजित करेंगी। ये नौकरियां बेसिंगस्टोक से बर्मिंघम, लंदन से लिवरपूल तक फैलेंगी, जो इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों को नई गति देंगी। ब्रेक्सिट के बाद आर्थिक मंदी से जूझ रहे ब्रिटेन के लिए यह निवेश किसी संजीवनी से कम नहीं। यह पल न केवल आर्थिक है, बल्कि उस ऐतिहासिक घाव का प्रतीकात्मक जवाब है, जो भारत ने कभी सहा था।
भारत की आर्थिक ताकत अब विश्व मंच पर गूंज रही है। टीवीएस मोटर कंपनी 250 मिलियन पाउंड के निवेश से सोलिहुल में नॉर्टन मोटरसाइकिल्स का विस्तार करेगी, जहां इलेक्ट्रिक वाहन और 1,000 नौकरियां जन्म लेंगी। साइएंट इंजीनियरिंग 100 मिलियन पाउंड से सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा में क्रांति लाएगी, जो ब्रिटेन को वैश्विक चिप युद्ध में बढ़त देगी। मस्तेक 2 मिलियन पाउंड से लंदन और लीड्स में एआई केंद्र स्थापित करेगी। एटुल-डेट पाम 11 मिलियन पाउंड से एग्री-टेक में सतत नवाचार लाएगी, तो नेओसेल्टिक ग्लोबल 5 मिलियन पाउंड से कार्डिफ और लंदन में 85 नौकरियों के साथ ऑर्थोपेडिक समाधान पेश करेगी। अल्कोर लॉजिस्टिक्स 4 मिलियन पाउंड से लिवरपूल में सप्लाई चेन को मजबूत करेगी। इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, ये सौदे एफटीए के तीन महीनों में ही फल दे रहे हैं—भारत के प्रति वैश्विक विश्वास का जीवंत प्रमाण।
ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन आर्थिक तूफान में फंसा है। 2024 में इसकी विकास दर महज 0.6% रही, महंगाई 2.5% पर अटकी, और बेरोजगारी 4.4% तक पहुंची, जिसमें युवा बेरोजगारी 13% के करीब है। ऐसे में भारतीय निवेश ब्रिटिश श्रमिकों के लिए संजीवनी है। स्टार्मर ने स्वीकारा, "ये निवेश हमारे लोगों की जेब में पैसा डालेंगे।" लेकिन विडंबना देखिए: जिस ब्रिटेन ने कभी भारत को "अक्षम" ठहराया, आज वह उसकी पूंजी पर निर्भर है। यूके में 950 भारतीय कंपनियां पहले से 600,000 नौकरियां दे रही हैं, और 2.6% भारतीय डायस्पोरा वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह आर्थिक जीत ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक विजय है—एक पूर्व उपनिवेश का अपने शासक को सहारा देना।
यह भारत के गर्व का क्षण है, मगर चुनौतियां बाकी हैं। स्टार्मर ने वीजा नियमों में ढील देने से इनकार किया, जो भारतीय पेशेवरों के लिए रुकावट है। फिर भी, यूके-इंडिया विजन 2035 रोडमैप—जो व्यापार, तकनीक, रक्षा, और जलवायु पर केंद्रित है—भविष्य की नींव रखता है। 7% विकास दर, 1 लाख से अधिक स्टार्टअप्स, और डिजिटल इंडिया की ताकत ने भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बनाया है। सेमीकंडक्टर से स्वच्छ ऊर्जा तक, भारत अब सिर्फ बाजार नहीं, नवाचार का स्रोत है।
यह कहानी निवेश की नहीं, शक्ति के उलटफेर की है। कभी "सूर्यास्त न होने वाला साम्राज्य" कहलाने वाला ब्रिटेन आज भारत की छाया में सांस ले रहा है। 1.3 बिलियन पाउंड और 6,900 नौकरियां महज आंकड़े नहीं, इतिहास का प्रतिशोध हैं। जैसा कि मोदी ने कहा, "यह साझेदारी नई ऊर्जा और विश्वास की है।" भारत अब सहारा नहीं मांगता, देता है। मगर सतर्कता जरूरी है—वैश्विक मंच पर संप्रभुता बनाए रखते हुए। यह वह क्षण है, जब भारत ने न केवल अपनी आजादी, बल्कि अपनी श्रेष्ठता साबित की। यह यात्रा अभी शुरू हुई है—एक ऐसे भविष्य की ओर, जहां भारत विश्व का नेतृत्व करेगा।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY