[प्रसंगवश – 29 जुलाई: ईश्वरचंद्र विद्यासागर पुण्यतिथि]
विचारों की लौ: क्या हम ईश्वरचंद्र विद्यासागर के सपनों के भारत में हैं?
[पथ-प्रदर्शक ईश्वरचंद्र विद्यासागर: अतीत की चेतना, वर्तमान की आवश्यकता]
जब अंधेरा इतना गहरा था कि समाज की आत्मा तक साँस नहीं ले पा रही थी, जब रूढ़ियों और अंधविश्वासों की बेड़ियाँ हर कदम पर मानवता को जकड़े हुए थीं, तब एक ज्योति प्रज्वलित हुई – एक ऐसी ज्योति जिसने न केवल बंगाल को, बल्कि पूरे भारतवर्ष को ज्ञान, करुणा और साहस का मार्ग दिखाया। वह ज्योति थी ईश्वरचंद्र विद्यासागर – एक नाम नहीं, एक क्रांति, एक विचार, एक ऐसी शक्ति जो आज भी हर उस हृदय में धड़कती है जो शिक्षा, समानता और मानवता के लिए संघर्ष करता है। उनकी पुण्यतिथि, 29 जुलाई, 1891, केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक पुकार है – एक पुकार जो हमें उनके सपनों के भारत को साकार करने के लिए प्रेरित करती है, हमें यह सवाल करने पर मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में उनके दिखाए मार्ग पर चल रहे हैं?
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के बीरसिंह गाँव में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता ठाकुरदास बंद्योपाध्याय और माता भगवती देवी की आर्थिक तंगी ने उनके बचपन को कठिनाइयों से भर दिया। फिर भी, उन्होंने इन परिस्थितियों को अपनी मंजिल की ओर बढ़ने में बाधा नहीं बनने दिया। सड़क के किनारे जलते तेल के दीपकों की मद्धम रोशनी में पढ़ाई करने वाला वह बालक न केवल संस्कृत का प्रकांड विद्वान बना, बल्कि पूरे देश के लिए ‘विद्यासागर’ बन गया। 1839 में कोलकाता के संस्कृत कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि मिली, जो उनके अथाह ज्ञान और समर्पण का प्रतीक थी। यह उपाधि केवल एक सम्मान नहीं थी, बल्कि उनके उस संकल्प की गवाही थी जिसने उन्हें समाज के लिए एक प्रेरणा बनाया।
विद्यासागर का सबसे बड़ा योगदान था समाज सुधार, विशेषकर स्त्री-शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के क्षेत्र में। 19वीं सदी का भारत एक ऐसा समाज था जहाँ स्त्रियों को शिक्षा देना पाप माना जाता था, जहाँ विधवाएँ सामाजिक बहिष्कार और तिरस्कार की शिकार थीं। विद्यासागर ने इस अंधकार को चुनौती दी। उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन कर यह सिद्ध किया कि विधवा पुनर्विवाह न केवल धार्मिक रूप से उचित है, बल्कि सामाजिक न्याय की माँग भी है। उनके अथक प्रयासों का परिणाम था 1856 का विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, जिसके तहत पहला विधवा पुनर्विवाह 7 दिसंबर, 1856 को कोलकाता में संपन्न हुआ। यह एक ऐतिहासिक क्षण था, जिसने समाज की सोच को बदलने की नींव रखी। इसके साथ ही, उन्होंने बंगाल में 35 से अधिक बालिका विद्यालय स्थापित किए, जिससे यह साबित हुआ कि नारी केवल घर की दीवारों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की प्रगति की आधारशिला है।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जीवन वैचारिक दृढ़ता और मानवीय संवेदना का अनुपम समन्वय था। वे न केवल विद्वान थे, बल्कि कर्मयोगी भी थे, जिन्होंने ज्ञान को समाज सेवा का माध्यम बनाया। उनकी कृति ‘वर्ण परिचय’ ने बंगाली भाषा को सरल और सुगम बनाकर प्रारंभिक शिक्षा का आधार प्रदान किया, जो आज भी प्रासंगिक है। विद्यासागर ने संस्कृत और अंग्रेजी शिक्षा के बीच सेतु बनाया, जिससे भारतीय युवा आधुनिक और परंपरागत ज्ञान का समन्वय प्राप्त कर सके। उनकी साहित्यिक कृतियों में कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ का बांग्ला अनुवाद, जिसे ‘शकुंतला’ के नाम से जाना जाता है, और ‘रामायण’ के कुछ हिस्सों का बांग्ला अनुवाद शामिल है, जिसमें सीता का चरित्र उभरकर सामने आता है। ये रचनाएँ केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि नैतिकता और मानवता के पाठ हैं, जो आज भी प्रेरणा देती हैं।
उनका साहस और स्वाभिमान उनकी पहचान था। अंग्रेजी शासन के दौर में भी उन्होंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कभी समझौता नहीं किया। जब उन्हें लगा कि अंग्रेजी सरकार के नियम अन्यायपूर्ण हैं, तो उन्होंने संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य पद से इस्तीफा दे दिया। यह उनका वह साहस था जो उन्हें समकालीन सुधारकों में विशिष्ट बनाता है। उन्होंने धर्म को मानवता के चश्मे से देखा और जब लोग धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर कुरीतियों को सही ठहराते थे, तब विद्यासागर ने शास्त्रों की पुनर्व्याख्या कर यह सिद्ध किया कि सच्चा धर्म वही है जो मानव कल्याण के लिए हो।
विद्यासागर की करुणा और संवेदनशीलता ने उन्हें जन-जन का प्रिय बनाया। एक बार एक गरीब विधवा की दयनीय स्थिति देखकर उन्होंने न केवल उसे तत्काल सहायता दी, बल्कि उसके लिए नियमित मदद की व्यवस्था भी की। ऐसे अनगिनत किस्से हैं जो उनकी मानवता को उजागर करते हैं। वे समाज के सबसे निचले तबके के लोगों के साथ उतनी ही आत्मीयता से मिलते थे जितनी कि उच्च वर्ग के लोगों के साथ। यह उनकी वह विशेषता थी जो उन्हें न केवल एक सुधारक, बल्कि एक सच्चे मानवतावादी बनाती थी।
आज, 29 जुलाई को, उनकी पुण्यतिथि पर हमें यह विचार करना होगा कि क्या हम उनके आदर्शों को जी रहे हैं? 2021 के साक्षरता आँकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 70.3% थी, जो पुरुषों की 84.7% से काफी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंतर और भी गहरा है। क्या यह स्थिति विद्यासागर के सपनों के भारत को दर्शाती है? आज जब समाज एक बार फिर कट्टरता, असमानता और जातिवाद की ओर बढ़ रहा है, विद्यासागर के विचारों को पुनर्जनन की आवश्यकता है। उनकी पुण्यतिथि हमें यह याद दिलाती है कि शिक्षा और समानता के लिए उनका संघर्ष अभी अधूरा है।
विद्यासागर का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची प्रगति तभी संभव है जब समाज का हर व्यक्ति – चाहे वह किसी भी जाति, लिंग या आर्थिक पृष्ठभूमि से हो – सम्मान और अवसर प्राप्त करे। उन्होंने यह भी दिखाया कि बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति से हो सकती है, बशर्ते उसमें दृढ़ संकल्प और मानवता के प्रति प्रेम हो। उनकी पुण्यतिथि पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके विचारों को केवल स्मरण ही नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारेंगे।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम आज भी हर उस व्यक्ति के हृदय में जीवित है जो शिक्षा को समाज का आधार मानता है। उनकी मृत्यु भले ही 1891 में हो गई, लेकिन उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वे उस दीपक की तरह हैं जो एक बार जलने के बाद कभी नहीं बुझता, बल्कि दूसरों को भी प्रज्वलित करता रहता है। उनकी पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके जैसे साहसी, संवेदनशील और समर्पित बनें। हमें शिक्षा को हर घर तक पहुँचाना होगा, हर उस व्यक्ति को सम्मान देना होगा जो समाज में हाशिए पर है, और यह विश्वास करना होगा कि सच्चा धर्म और सच्ची प्रगति वही है जो मानवता की सेवा में हो। जब तक भारत में ज्ञान की ज्योति जलती रहेगी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम अमर रहेगा – एक पथ-प्रदर्शक, एक कर्मयोगी और एक सच्चे मानवतावादी के रूप में।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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