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Dr. Srimati Tara Singh
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अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस

 

21 सितम्बर: अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस


शांति: युद्ध-विराम से आगेरोज़मर्रा की करुणा तक

[शांति दिवस: वैश्विक घोषणाओं से आगे, व्यक्तिगत संकल्पों तक]



अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस हर साल हमें एक गहन और विचारोत्तेजक सवाल के साथ आमने-सामने लाता है, क्या हम उस शांति की ओर बढ़ रहे हैं, जो मात्र युद्ध की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि हर इंसान के लिए गरिमा, न्याय और समानता का जीवंत प्रतीक हो? यह दिन हमें न केवल वैश्विक मंचों पर होने वाली चर्चाओं तक सीमित रखता है, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के विचारों, व्यवहारों और निर्णयों पर गहराई से आत्मचिंतन करने को प्रेरित करता है। शांति कोई स्थिर लक्ष्य नहीं, बल्कि एक सतत, जीवंत प्रक्रिया है, जो छोटे-छोटे कदमों, संवेदनशीलता और सामूहिक प्रयासों से फलती-फूलती है। आज, जब विश्व जलवायु संकट, आर्थिक असमानता, डिजिटल हिंसा और सामाजिक विभाजन जैसी जटिल चुनौतियों से जूझ रहा है, शांति का अर्थ और गहरा, व्यापक और अनिवार्य हो गया है।

शांति का विचार केवल युद्ध-विराम या सैन्य संघर्षों के अंत तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र, जो प्रतिवर्ष 21 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस मनाता है, इसे "शांति की संस्कृति" को बढ़ावा देने के लिए समर्पित करता है। 2025 की थीम, "शांतिपूर्ण विश्व के लिए अभी कार्य करें," हमें यह सशक्त संदेश देती है कि शांति केवल सरकारों या बड़े संगठनों की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि हर व्यक्ति, समुदाय और समाज की साझा प्रतिबद्धता का परिणाम है। लेकिन सवाल यह है, क्या हम वास्तव में इस दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं? विश्व बैंक के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर 9.2% आबादी, यानी लगभग 71.9 करोड़ लोग, अभी भी अत्यधिक गरीबी में जी रहे हैं। जब लाखों लोग भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं, तो शांति की बातें महज खोखले वादे बनकर रह जाती हैं। 

आज की दुनिया में हिंसा केवल युद्ध के मैदानों तक सीमित नहीं रही; यह सामाजिक, आर्थिक और डिजिटल रूपों में हमारे समाज के ताने-बाने को चुपके से कमजोर कर रही है। सामाजिक असमानता, लैंगिक भेदभाव, नस्लीय पूर्वाग्रह और आर्थिक शोषण जैसे मुद्दे शांति की नींव को खोखला कर रहे हैं। यूनिसेफ की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में 14.8 करोड़ से अधिक बच्चे बाल श्रम की क्रूरता में फंसे हैं। जब बच्चे अपनी मासूमियत और शिक्षा के अधिकार से वंचित होकर मेहनत-मजदूरी में धकेल दिए जाते हैं, तो यह हिंसा का वह रूप है, जो समाज की आत्मा को चोट पहुँचाता है। इसी तरह, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2025 में खुलासा किया कि हर साल लगभग 13 लाख लोग हिंसक हमलों का शिकार होते हैं, जिनमें से अधिकांश घरेलू हिंसा और सामुदायिक तनाव से उपजते हैं। ये आँकड़े हमें यह सोचने पर विवश करते हैं कि शांति केवल बाहरी स्थिरता नहीं, बल्कि सामाजिक और आंतरिक सामंजस्य की जीवंत अवस्था है।

डिजिटल युग ने शांति के समक्ष अभूतपूर्व चुनौतियाँ खड़ी की हैं। सोशल मीडिया, जो हमें एक-दूसरे के करीब लाने का वादा करता था, अब नफरत, गलत सूचनाओं और ध्रुवीकरण का हथियार बन चुका है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की 2024 की एक स्टडी ने उजागर किया कि सोशल मीडिया पर फैलने वाली फेक न्यूज़ और भड़काऊ सामग्री ने कई देशों में सामाजिक अशांति को हवा दी है। उदाहरण के लिए, भारत में 2023 की मणिपुर हिंसा के दौरान सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों ने आग में घी डालने का काम किया। यह हमें एहसास कराता है कि शांति की रक्षा अब केवल भौतिक स्तर पर नहीं, बल्कि डिजिटल और मानसिक स्तर पर भी अनिवार्य है। हमें ऐसी तकनीकी नीतियों, जागरूकता अभियानों और समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो डिजिटल दुनिया को नफरत का अड्डा नहीं, बल्कि सौहार्द और सहयोग का मंच बनाए। 

शांति का अंकुर छोटे-छोटे प्रयासों में छिपा है, जो समाज के हर हिस्से में बोया जा सकता है। यह उन माता-पिता से शुरू होता है, जो अपने बच्चों को लैंगिक समानता और करुणा का पाठ पढ़ाते हैं। यह उस शिक्षक से शुरू होता है, जो किसी निर्धन बच्चे को मुफ्त शिक्षा देकर उसके सपनों को नई उड़ान देता है। यह उस समुदाय से शुरू होता है, जो अपने बीच के कमजोर लोगों को अपनाकर सामाजिक एकता की मिसाल बनता है। भारत में, प्रथम और गूंज जैसे गैर-सरकारी संगठन इस दिशा में प्रेरक कार्य कर रहे हैं। प्रथम की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने दस लाख से अधिक बच्चों को शिक्षा के अवसर दिए, जो सामाजिक शांति की नींव को और मजबूत करता है। उसी तरह, गूंज ने वंचित समुदायों को वस्त्र और अन्य संसाधन प्रदान कर उनकी गरिमा को बनाए रखा है। ये प्रयास हमें बताते हैं कि शांति केवल बड़े-बड़े वादों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे कार्यों की सजीवता में समाई है।

जलवायु परिवर्तन आज शांति के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाएँ हर साल लाखों लोगों को उनके घरों से बेदखल कर रही हैं। यह विस्थापन संसाधनों के लिए संघर्ष को जन्म देता है, जो सामाजिक अशांति और हिंसा का कारण बनता है। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश और भारत के कुछ हिस्सों में बाढ़ और समुद्र के बढ़ते जलस्तर ने स्थानीय समुदायों के बीच तनाव को बढ़ाया है। शांति की रक्षा के लिए जलवायु न्याय को अपनाना अब अपरिहार्य है। हमें ऐसी नीतियाँ और कार्ययोजनाएँ चाहिए, जो पर्यावरणीय असमानता को कम करें और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा दें। 

शांति का निर्माण केवल बाहरी कोशिशों से नहीं, बल्कि हमारे मन की गहराइयों में बदलाव लाने से संभव है। हमें अपने पूर्वाग्रहों, नफरत और उदासीनता को त्यागना होगा। शांति कोई स्थायी पड़ाव नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली यात्रा है, जो हर कदम पर हमारी प्रतिबद्धता माँगती है। यह उस बगीचे की तरह है, जिसे रोज़ पानी, खाद और देखभाल की ज़रूरत होती है, या उस नाजुक ओस की बूंद की तरह, जो सुबह की पहली किरण में चमकती है, लेकिन जरा सी लापरवाही से मिट सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस हमें यह एहसास दिलाता है कि शांति केवल हथियारों की खामोशी नहीं, बल्कि मानवता की सशक्त आवाज़ है। यह तब तक अधूरी रहेगी, जब तक हर इंसान को उसका हक़, सम्मान और गरिमा न मिले। शांति केवल राष्ट्रों की सुरक्षा का मसला नहीं, बल्कि हर जीवन को बेहतर बनाने का पवित्र संकल्प है। आज हमें यह प्रण करना होगा कि हम अपने विचारों, शब्दों और कर्मों से शांति को पोषित करेंगे। क्योंकि शांति का सच्चा भविष्य न हथियारों में है, न युद्धों में—यह उस मानवीय शक्ति में निहित है, जो हमें एकजुट करती है, हमें इंसान बनाती है और एक ऐसी दुनिया की रचना करती है, जहाँ हर दिल में शांति की गूंज हो।



प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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