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Dr. Srimati Tara Singh
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अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस

 

29 जुलाई: अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस]


बाघ नहीं तो जंगल नहींजंगल नहीं तो जीवन नहीं

[बाघ एक प्रजाति नहीं, पर्यावरण की पहचान है]



जब जंगल की गहराइयों में बाघ की गर्जना गूंजती है, तो वह सिर्फ एक आवाज नहीं, बल्कि प्रकृति की सांसों की धड़कन है। वह गर्जना धरती के प्राचीन गीत की तरह है, जो जीवन, शक्ति और संतुलन की कहानी कहती है। लेकिन आज, उस गर्जना का स्वर धीमा पड़ रहा है। हमारी लापरवाही, लालच और अनियंत्रित विकास ने उस राजसी प्राणी को, जो कभी जंगलों का निर्विवाद स्वामी था, विलुप्ति के कगार पर ला खड़ा किया है। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस, जो हर साल 29 जुलाई को मनाया जाता है, केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक जागृति का आह्वान है—एक पुकार है उस प्राणी को बचाने की, जो हमारी धरती की आत्मा का प्रतीक है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि यदि बाघ की गर्जना खामोश हो गई, तो जंगल का संगीत हमेशा के लिए मौन हो जाएगा।

बाघ सिर्फ एक प्राणी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता का जीवंत प्रतीक है। भारत में, जहाँ इसे 1972 में राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिला, बाघ केवल जंगल का राजा नहीं, बल्कि हमारी पहचान का हिस्सा है। प्राचीन काल से ही बाघ को शक्ति और सम्मान का प्रतीक माना गया है। हिंदू पौराणिक कथाओं में माँ दुर्गा का वाहन होने के नाते यह आध्यात्मिक महत्व भी रखता है। लेकिन आज, यह प्राणी खतरे में है। विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के नवीनतम आँकड़ों (2024) के अनुसार, विश्व भर में जंगली बाघों की संख्या मात्र 4,500 के आसपास रह गई है, जो 20वीं सदी की शुरुआत में 1,00,000 से अधिक थी। भारत, जो विश्व की लगभग 70% बाघ आबादी का घर है, में 2022 की गणना के अनुसार 3,167 बाघ थे, जो 2018 के 2,967 से मामूली वृद्धि दर्शाता है। यह प्रगति आशाजनक है, लेकिन खतरे अभी भी बरकरार हैं।

बाघों की घटती संख्या के पीछे कई कारण हैं। अंधाधुंध वन कटाई ने उनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है। पर्यावरण मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, भारत ने 2015 से 2023 के बीच 2.3 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र खो दिया, जो बाघों के लिए एक बड़ा झटका है। अवैध शिकार और बाघों के अंगों की तस्करी ने भी इस प्रजाति को गहरी चोट पहुँचाई है। 2023 में, भारत में कम से कम 121 बाघों की मृत्यु दर्ज की गई, जिनमें से कई अवैध शिकार का शिकार बने। एशियाई बाजारों में बाघ की हड्डियों, त्वचा और अन्य अंगों की माँग, विशेष रूप से पारंपरिक चीनी चिकित्सा के लिए, इस तस्करी को बढ़ावा देती है। विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट (2024) के अनुसार, अवैध वन्यजीव व्यापार वैश्विक स्तर पर 23 बिलियन डॉलर का उद्योग है, जिसमें बाघों की तस्करी एक प्रमुख हिस्सा है। इसके अलावा, मानव-बाघ संघर्ष एक बढ़ती समस्या है। जैसे-जैसे मानव बस्तियाँ जंगलों के करीब आ रही हैं, बाघों को भोजन और स्थान के लिए मानव क्षेत्रों में प्रवेश करना पड़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु या कैद हो रही है। 

बाघ केवल एक शीर्ष शिकारी नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षक है। वह जंगल में शाकाहारी प्राणियों, जैसे हिरण और जंगली सुअर, की आबादी को नियंत्रित करता है, जिससे वनस्पतियों को अत्यधिक चराई से बचाया जाता है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के एक अध्ययन (2023) के अनुसार, एक वयस्क बाघ प्रतिवर्ष औसतन 50-60 शिकार करता है, जो पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण है। बाघों की अनुपस्थिति में, शाकाहारी प्राणियों की अनियंत्रित वृद्धि जंगल की वनस्पतियों को नष्ट कर सकती है, जिसका प्रभाव नदियों, जलवायु और अन्य प्रजातियों पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, स्वस्थ जंगल जल चक्र को नियंत्रित करते हैं, और बाघ इस चक्र को बनाए रखने में अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देता है। यदि बाघ गायब हो गए, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ सकता है, जिसका प्रभाव हमारी खाद्य सुरक्षा और जलवायु पर भी पड़ेगा।

इन चुनौतियों के बावजूद, बाघ संरक्षण में आशा की किरणें दिखाई देती हैं। भारत का ‘प्रोजेक्ट टाइगर’, जो 1973 में शुरू हुआ, विश्व का सबसे सफल संरक्षण कार्यक्रम माना जाता है। 2024 तक, भारत में 53 बाघ अभयारण्य हैं, जिनमें कॉर्बेट (उत्तराखंड), बांधवगढ़ (मध्य प्रदेश), और सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) जैसे क्षेत्र शामिल हैं। नवीनतम तकनीकों, जैसे कैमरा ट्रैप, ड्रोन और सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ने बाघों की निगरानी को और सटीक बनाया है। सामुदायिक भागीदारी भी बढ़ रही है। मध्य प्रदेश के सतपुड़ा क्षेत्र में, स्थानीय समुदायों को पर्यटन और वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान किए गए हैं, जिससे मानव-बाघ संघर्ष में 30% की कमी आई है। ग्लोबल टाइगर फोरम (2024) के अनुसार, भारत ने बाघ संरक्षण में 12 बाघ-निवास वाले देशों में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है।

फिर भी, यह यात्रा अधूरी है। जलवायु परिवर्तन, वन्यजीव गलियारों की कमी, और अवैध शिकार अभी भी बड़े खतरे हैं। विश्व प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने बाघों को ‘लुप्तप्राय’ प्रजाति की श्रेणी में रखा है, जो इस बात का संकेत है कि हमें और सख्त कदम उठाने होंगे। बाघों के लिए सुरक्षित गलियारे, जो विभिन्न अभयारण्यों को जोड़ते हैं, उनकी प्रजनन और आवासीय आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। 2023 में, भारत सरकार ने 10 नए वन्यजीव गलियारों की पहचान की, लेकिन इनका पूर्ण विकास अभी बाकी है। 

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस, जिसकी शुरुआत 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट में हुई, हमें एकजुट होकर बाघों की रक्षा करने का अवसर देता है। इस समिट में 13 बाघ-निवास वाले देशों ने 2022 तक बाघों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। हालाँकि यह लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हुआ, भारत ने इसमें उल्लेखनीय प्रगति की है। यह दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल बाघों की स्थिति पर विचार करें, बल्कि ठोस कदम भी उठाएँ।

बाघों का संरक्षण केवल सरकार या वन विभाग का कर्तव्य नहीं, बल्कि हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। हमें अपने जीवन में बदलाव लाना होगा—वृक्षारोपण, पर्यावरण जागरूकता और टिकाऊ जीवनशैली अपनाकर। हमें ऐसी नीतियों का समर्थन करना होगा जो वन कटाई और अवैध शिकार को रोके। स्कूलों व समुदायों में बच्चों को बाघों और प्रकृति के महत्व की शिक्षा देनी होगी। बाघ की गर्जना प्रकृति की धड़कन है, जो तभी जीवित रहेगी जब हम अपने दायित्व निभाएँगे। इस अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर संकल्प लें कि हम बाघों को उनके जंगलों में सुरक्षित रखेंगे, उनकी गर्जना को गूंजने देंगे और भावी पीढ़ियों को एक ऐसी धरती सौंपेंगे जहाँ बाघ स्वतंत्रता व गर्व के साथ विचरण करें। बाघ को बचाना केवल एक प्रजाति की रक्षा नहीं, बल्कि हमारी धरती, संस्कृति और भविष्य को संरक्षित करना है। जब तक बाघ गरजेगा, धरती जीवित रहेगी। 


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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