06 नवम्बर: युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस
प्रकृति की लाश पर खड़ा विजेता भी पराजित है
[विजय के जश्न में मरती हुई पृथ्वी की आवाज़]
[अगर धरती नहीं बची, तो कौन जीतेगा युद्ध?]
युद्ध का धुआँ जब आसमान को काला करता है, तो वह सिर्फ सैनिकों की साँसें नहीं छीनता, बल्कि धरती की हर साँस को जख्मी कर देता है—वह मिट्टी जो अनाज उगाती है, वह नदी जो जीवन देती है, और वह हवा जो प्राणवायु बनती है। 6 नवंबर का “युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस” केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक चीख है—धरती की उस कराह का प्रतीक, जो युद्ध की भट्ठी में जल रही है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि युद्ध सिर्फ मानवता का खून नहीं बहाता, बल्कि प्रकृति की धमनियों को भी काट देता है। जब बम फटते हैं, तो सिर्फ इमारतें नहीं, जंगल भी राख होते हैं; जब रासायनिक हथियार हवा में घुलते हैं, तो सिर्फ सैनिक नहीं, पक्षी भी मरते हैं। यह वह सत्य है, जिसे हमारी सभ्यता ने बार-बार अनदेखा किया है, और यही वह सत्य है, जिसे अब अनदेखा करना असंभव है।
संयुक्त राष्ट्र ने 2001 में इस दिवस की स्थापना की, ताकि युद्धों के पर्यावरणीय नुकसान को वैश्विक चेतना का हिस्सा बनाया जाए। पर क्या हम वाकई इसकी गहराई को समझ पाए हैं? इतिहास गवाह है कि युद्धों ने न सिर्फ सीमाएँ बदलीं, बल्कि धरती की आत्मा को भी लहूलुहान किया। वियतनाम युद्ध में ‘एजेंट ऑरेंज’ के छिड़काव ने 30 लाख हेक्टेयर जंगलों को बंजर कर दिया, मछलियाँ नदियों में तड़पकर मर गईं, और पीढ़ियाँ जन्मजात बीमारियों की शिकार हुईं। खाड़ी युद्ध में जलते तेल के कुओं ने न सिर्फ कुवैत की हवा को जहरीला किया, बल्कि महीनों तक सूरज को ढँककर जलवायु चक्र को अव्यवस्थित कर दिया। सीरिया, अफगानिस्तान, और यूक्रेन जैसे संघर्ष क्षेत्रों में बमबारी ने मिट्टी को रेडियोधर्मी कचरे का कब्रिस्तान बना दिया। ये सिर्फ आँकड़े नहीं, बल्कि उन घावों की कहानियाँ हैं, जो धरती आज भी सह रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, युद्धों के बाद पारिस्थितिक पुनर्स्थापन में दशकों लगते हैं, और कई बार तो भूमि हमेशा के लिए बंजर हो जाती है।
युद्ध का पर्यावरणीय नुकसान केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहता। हवा सीमाएँ नहीं मानती, नदियाँ पासपोर्ट नहीं पूछतीं। जब इराक में तेल के कुओं से उठा धुआँ सऊदी अरब तक गया, तो वहाँ की फसलों पर काली राख बरसी। जब जापान के फुकुशिमा में रेडियोधर्मी रिसाव हुआ, तो प्रशांत महासागर की मछलियाँ तक उसकी चपेट में आईं। युद्ध का प्रदूषण एक वैश्विक त्रासदी है, जो किसी एक देश की सीमा में नहीं बँधता। फिर भी, हमारी युद्ध नीतियाँ और कूटनीति में पर्यावरण की बात कहीं हाशिए पर रह जाती है। हम विजय के झंडे गाड़ने में व्यस्त रहते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि जिस धरती पर वह झंडा लहरा रहा है, वह शायद अब फसलों के लिए अनुपजाऊ हो चुकी है।
युद्ध और पर्यावरण का रिश्ता केवल विनाश का नहीं, बल्कि कारण और परिणाम का भी है। संसाधनों की लड़ाई—जल, तेल, खनिज, या जंगल—अक्सर युद्ध की जड़ होती है। अफ्रीका में “ब्लड डायमंड्स” और कांगो में कोबाल्ट खनन के लिए हुए गृहयुद्ध इसका प्रमाण हैं। यूएनईपी के अनुसार, 40% आंतरिक संघर्ष प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जुड़े हैं। जब हम प्रकृति को लूटते हैं, तो वह हमें सूखे, बाढ़, और जलवायु संकट के रूप में जवाब देती है। और फिर, हम उसी प्रकृति के खिलाफ नए युद्ध छेड़ देते हैं। यह एक दुष्चक्र है, जिसे तोड़ने की जरूरत है।
6 नवंबर का यह दिवस हमें इस दुष्चक्र को तोड़ने की प्रेरणा देता है। यह सिर्फ युद्धों की निंदा का दिन नहीं, बल्कि एक नई सोच का आह्वान है। जिनेवा कन्वेंशन का अनुच्छेद 55 कहता है कि युद्ध के दौरान पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचाने वाले कार्य निषिद्ध हैं। लेकिन क्या कागजों पर लिखे ये नियम युद्ध के मैदान में सुनाई देते हैं? नहीं। फिर भी, कुछ देश और संगठन इस दिशा में कदम उठा रहे हैं। उदाहरण के लिए, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देशों ने ‘ग्रीन डिप्लोमेसी’ को बढ़ावा देना शुरू किया है, जिसमें संसाधनों का साझा उपयोग और पर्यावरण संरक्षण को कूटनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। लेकिन यह काफी नहीं है। हमें एक ऐसी वैश्विक नीति चाहिए, जो युद्ध को शुरू होने से पहले ही रोक दे—न कि केवल उसके नुकसान को कम करने की कोशिश करे।
युद्ध का सबसे बड़ा शिकार है— वह बच्चा, जो बंजर धरती पर जन्म लेता है, जहाँ पानी जहरीला है और हवा में साँस लेना दूभर। वह किसान, जिसके खेत में अब फसल की जगह बारूदी सुरंगें हैं। वह पक्षी, जिसका घोंसला बमों की आग में जल गया। युद्ध की त्रासदी सिर्फ मानवता की नहीं, बल्कि समस्त जीवन की है। और इस त्रासदी को रोकने के लिए हमें युद्ध की मानसिकता को बदलना होगा। हमें यह समझना होगा कि असली शांति तब होगी, जब धरती की हरियाली लौटेगी, जब नदियाँ फिर से निर्मल बहेंगी, और जब हमारी अगली पीढ़ी को स्वच्छ हवा और उपजाऊ मिट्टी विरासत में मिलेगी।
6 नवंबर का यह दिन हमें एक वैकल्पिक भविष्य की कल्पना करने को कहता है। एक ऐसा भविष्य, जहाँ युद्ध के बजाय सहयोग हो, जहाँ सीमाओं के बजाय साझेदारी हो, और जहाँ बंदूकों की जगह पेड़ लगाए जाएँ। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण की रक्षा सिर्फ वैज्ञानिकों या नीति-निर्माताओं का काम नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जो इस धरती पर साँस लेता है। हमें युद्ध की राख से हरियाली उगानी होगी। हमें उन नदियों को बचाना होगा, जो युद्ध के जहर से मर रही हैं। और सबसे बड़ी बात, हमें यह स्वीकार करना होगा कि धरती हमारी नहीं, हम धरती के हैं।
जब अगली बार हम युद्ध की खबर सुनें, तो सिर्फ मानव हानि पर न रुकें। सोचें उन जंगलों के बारे में, जो अब चुप हैं। उन नदियों के बारे में, जो अब गंदली हैं। उन पक्षियों के बारे में, जो अब गा नहीं सकते। 6 नवंबर हमें यही सिखाता है—युद्ध का अंत सिर्फ शांति संधियों से नहीं होगा, बल्कि तब होगा, जब हम धरती को उसका हक लौटाएँगे। यह एक युद्ध है, जो हमें लड़ना ही होगा—न कि हथियारों से, बल्कि करुणा, चेतना, और संकल्प से। क्योंकि जब धरती बचेगी, तभी हम बच पाएँगे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY