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गुरुनानक जयंती

 

प्रसंगवश – 05 नवम्बर: गुरुनानक जयंती


जब प्रभु स्वयं मनुष्य बनकर बोले — वही थे नानक

[गुरुनानक जयंती: मानवता के उजाले की लौ]

[जहाँ मिटती हैं सीमाएँ — वहीं से शुरू होती है नानक की दुनिया]



कभी-कभी इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं, जब एक व्यक्तित्व मात्र व्यक्ति नहीं, बल्कि युग बन जाता है — विचारों का, करुणा का, और जागृति का युग। ऐसा ही युग 15वीं शताब्दी में आया, जब तलवारों और तर्कों के बीच एक कोमल आवाज़ ने मानवता को पुकारा — “ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान, सब एक ही ज्योति से उपजे हैं।” यह आवाज़ थी — सतगुरु नानक देव जी की। गुरुनानक देव जी का जन्म 1469 में तलवंडी (अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब) में हुआ। उस समय समाज जात-पात, धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास की जंजीरों में जकड़ा था। लेकिन उस बालक नानक ने, बचपन से ही, प्रश्नों से दुनिया को हिलाना शुरू कर दिया था। उनके शब्दों में प्रश्न नहीं, चेतना थी; उनके मौन में विरोध नहीं, सृजन था।

नाम जपोकिरत करोवंड छको  जीवन का त्रिवेणी सूत्र

गुरुनानक ने किसी नई धर्म-संस्था की नींव नहीं रखी, बल्कि मानव धर्म को उसकी मूल आत्मा में लौटाया। उन्होंने तीन सरल पर गूढ़ सूत्र दिए: नाम जपो — ईश्वर के नाम का स्मरण करो, क्योंकि वही आत्मा की शुद्धि का प्रथम सोपान है। किरत करो — ईमानदारी से श्रम करो, क्योंकि कर्म ही भक्ति का सच्चा रूप है। वंड छको — जो कुछ प्राप्त हो, उसे बाँटो; क्योंकि साझा करना ही सच्ची संपदा है। ये तीन वाक्य केवल उपदेश नहीं, बल्कि समाज के पुनर्निर्माण का घोषणापत्र थे। जब संसार वर्गों में बँट रहा था, तब नानक का संदेश था — “सब में एक ही ज्योति है।” जब धर्म दीवारें खड़ी कर रहे थे, तब उन्होंने रास्ते खोले — संवाद के, प्रेम के, और समानता के।

जाति-पाँति के परेसमानता की साधना

गुरुनानक देव जी ने स्पष्ट कहा — “एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मंदे।” उन्होंने समाज को आईना दिखाया कि ईश्वर के सामने न तो कोई ऊँचा है, न नीचा; न ब्राह्मण श्रेष्ठ, न शूद्र तुच्छ। हर व्यक्ति, हर आत्मा, एक ही स्रोत की संतान है। उनके इस विचार ने न केवल आध्यात्मिक क्रांति की, बल्कि सामाजिक आंदोलन भी खड़ा किया। लंगर की परंपरा — जहाँ अमीर-गरीब, राजा-रंक, सब एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं — इस समानता का जीवंत प्रतीक बन गई। आज भी हर गुरुद्वारे में यह परंपरा उसी भाव से चल रही है, जैसे नानक ने शुरू की थी: सेवा, विनम्रता और साझा आनंद।

यात्राएँ नहींमानवता की तीर्थयात्रा

गुरुनानक देव जी ने लगभग 30 वर्ष तक यात्रा की — भारत से लेकर अफगानिस्तान, तिब्बत, श्रीलंका, मक्का-मदीना तक , जिन्हें "उदासी" कहा जाता है।पर उनकी ये यात्राएँ केवल धर्म-प्रचार नहीं थीं; वे मानवता की खोज थीं। हर भाषा, हर भूगोल, हर परंपरा में उन्होंने सत्य के बीज बोए। उन्होंने कहा — “सचु कहो, ओहु साचा नांव।” उनकी वाणी में किसी पंथ की नहीं, बल्कि विश्व-मानव धर्म की गूँज थी।

विचारों की क्रांतिकरुणा की ज्योति

जब सत्ता तलवार से चल रही थी और धर्म भय से, तब नानक ने कहा — “भय में प्रेम नहीं, प्रेम में भय नहीं।” उन्होंने भय-मुक्त समाज का स्वप्न देखा, जहाँ ईश्वर कोई डंडा नहीं, बल्कि दया का सागर हो। उनके शब्दों ने सत्ता को चुनौती दी, पर विद्रोह के बजाय उन्होंने सुधार का रास्ता चुना। उनकी क्रांति तलवार से नहीं, कविता से हुई; उनकी लड़ाई शत्रु से नहीं, अहंकार से थी।

आज के युग में गुरुनानक का संदेश

आज जब दुनिया फिर से धर्म, भाषा और जाति की दीवारों में उलझ रही है, जब इंसान इंसान से दूर होता जा रहा है — ऐसे समय में गुरुनानक का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठा है। उन्होंने हमें सिखाया कि सच्ची पूजा मंदिरों, मस्जिदों या गुरुद्वारों में नहीं, बल्कि उस क्षण में होती है जब हम किसी भूखे को भोजन देते हैं, किसी दुखी को सांत्वना देते हैं। उनके शब्दों में — “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत।” यह केवल भक्ति नहीं, पर्यावरण-संवेदना का भी मूल सिद्धांत है — कि प्रकृति ही परमात्मा की प्रत्यक्ष उपस्थिति है। अगर आज की दुनिया पर्यावरण-विनाश, हिंसा और असमानता से जूझ रही है, तो नानक का मार्ग — सरल जीवन, सच्चा कर्म और साझा आनंद — एक समाधान है। 

नानक आज भी जीवित हैं

गुरुनानक देव जी ने कहा था — “सचु साहिब एको है, दूजा नाही कोए (ईश्वर एक है और वही सर्वोच्च सत्य है)।” सदियों बाद भी उनका यह सत्य अमर है। वह नानक जो तलवंडी में जन्मे थे, अब हर हृदय में बसते हैं; वह नानक जो पाँच शताब्दियों पहले बोले थे, आज भी हमें भीतर से झकझोरते हैं। गुरुनानक जयंती केवल एक पर्व नहीं — यह मानवता का पुनर्जन्म है। यह वह दिन है जब हम याद करते हैं कि सच्चा धर्म पूजा नहीं, सेवा है; सच्चा योग समाधि नहीं, समानता है; और सच्चा भक्ति-गीत कोई राग नहीं, बल्कि दया की ध्वनि है। जब भी दुनिया में अंधकार बढ़ता है, नानक का प्रकाश फिर चमक उठता है — क्योंकि उनका संदेश कभी पुराना नहीं होता। वह हमें आज भी याद दिलाता है — सत्य की राह कठिन नहीं, बस सच्चे दिल की जरूरत है।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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