घर बसाने की रस्में बहुत, घर बचाने की शिक्षा कहां?
[बिखरते रिश्तों के दौर में विवाह की नई पाठशाला]
[कुंडली के गुण मिले, क्या स्वभाव और संस्कार भी मिले?]
·प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
हमारे समाज में शादी की हर तैयारी होती है, बस शादी निभाने की नहीं। दूल्हे के सेहरे, दुल्हन के लहंगे, बरात की गाड़ियों और पकवानों की फेहरिस्त महीनों पहले तैयार हो जाती है। मगर जिन दो लोगों को पूरी जिंदगी साथ बितानी है, उनके स्वभाव, आदतों और अपेक्षाओं का मेल कैसा होगा, इस पर शायद ही कोई गंभीरता से सोचता है। शादी के दिन चेहरे मुस्कराते रहें, इसकी चिंता सबको होती है; लेकिन शादी के बाद उन चेहरों पर मुस्कान कैसे बनी रहेगी, यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है। इसी विडंबना के बीच गोवा के एक कॉलेज ने विवाह से पहले 15 दिवसीय सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करने की पहल की है। यह अनूठा प्रयास केवल एक पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि विवाह और रिश्तों को लेकर हमारी सोच पर गंभीर सवाल है।
गोवा के होम साइंस कॉलेज में दिसंबर से शुरू होने वाला ‘मैरिज रेडीनेस’ पाठ्यक्रम युवाओं को विवाह के लिए मानसिक और व्यावहारिक रूप से तैयार करेगा। पहली नजर में सवाल उठता है—क्या अब शादी के लिए भी डिग्री चाहिए? नौकरी, कारोबार और वाहन चलाने के लिए हम प्रशिक्षण लेते हैं, लेकिन जीवनभर साथ निभाने वाले रिश्ते के लिए कोई तैयारी नहीं करते। विवाह केवल मंडप, मेहंदी और तस्वीरों का उत्सव नहीं, बल्कि स्वयं को समझने, साथी को जानने और जिम्मेदारियां निभाने का नाम है। कॉलेज के ब्रोशर में भी सवाल है—करियर के लिए बीस साल लगाने वाले लोग विवाह की तैयारी के लिए कुछ दिन क्यों नहीं निकाल सकते? यह सवाल हमारी सोच की बड़ी कमी उजागर करता है।
विवाह टूटने का एक कारण यह भी है कि हम जीवनसाथी चुनते समय उसकी कमाई और परिवार की हैसियत देखते हैं, स्वभाव और व्यवहार नहीं। कुंडली के गुण मिलाते हैं, लेकिन गुस्से, धैर्य, अपेक्षाओं और विचारों पर ध्यान नहीं देते। बाद में यही अनदेखी विवाद बन जाती है। गोवा में 2022 से 2025 के बीच तीन हजार से अधिक विवाह और तलाक संबंधी याचिकाएँ सिविल अदालतों में दर्ज हुईं, जिनमें अकेले 2024 में 947 मामले शामिल हैं। तलाक के मामलों में कमी लाने के लिए राज्य सरकार भी विवाह-पूर्व परामर्श की जरूरत जता चुकी है। कॉलेज का यह पाठ्यक्रम इसी दिशा में पहल है। अदालतों में विवाद पहुंचने के बाद रिश्ते सुधारने से बेहतर है कि विवाह से पहले ही संभावित टकराव के कारण समझ लिए जाएं।
आज रिश्ते बनाना आसान हुआ है, निभाना नहीं। डेटिंग ऐप पर स्वाइप से परिचय, सोशल मीडिया पर बातचीत और कुछ मुलाकातों में भविष्य के सपने सजने लगते हैं। लेकिन तस्वीर पसंद करना और जीवन की जिम्मेदारियां साझा करना अलग बातें हैं। इसलिए पाठ्यक्रम में डेटिंग का अर्थ, पुरुषत्व और स्त्रीत्व की धारणाओं का रिश्तों पर प्रभाव तथा शादी और विवाह के अंतर जैसे विषय शामिल हैं। युवा समानता की बात करते हैं, पर व्यवहार में पुरानी सोच और अपेक्षाएं बनी रहती हैं। पति से कमाने और पत्नी से घर संभालने की उम्मीदें तब टकराती हैं, जब दोनों समान अधिकार और स्वतंत्रता चाहते हैं। विवाह को मालिक-सेवक का संबंध नहीं, बल्कि दो बराबर व्यक्तियों की साझेदारी मानना जरूरी है।
विवाह की असली परीक्षा कुछ दिन बाद रसोई से शुरू होती है। दोनों नौकरी करते हैं, थककर लौटते हैं और घर व बच्चों की जिम्मेदारियां सामने होती हैं। खाना कौन बनाएगा, बच्चों को कौन संभालेगा, खर्च-बचत कैसे होगी और बुजुर्गों की देखभाल कौन करेगा? इन सवालों पर पहले बात न हो, तो घर शिकायतों का अड्डा बन जाता है। इसलिए आत्म-जागरूकता जरूरी है। अपनी कमजोरियों, जरूरतों और अपेक्षाओं को समझे बिना व्यक्ति साथी से समझदारी की उम्मीद करता है और उसके न बदलने की शिकायत करता है। जबकि कई बार साथी नहीं, हमारी समझ अधूरी होती है। प्रेम के साथ एक-दूसरे की थकान, परेशानी और भावनाओं को समझना भी जरूरी है।
प्रेम पंद्रह दिन की कक्षा में नहीं सिखाया जा सकता। कोई पाठ्यक्रम न प्रेम पैदा कर सकता है, न सफल विवाह की गारंटी दे सकता है। लेकिन धैर्य, संवाद और जिम्मेदारी सीखी जा सकती है। खिलाड़ी हर मैच नहीं जीतता, विद्यार्थी हर परीक्षा में सफल नहीं होता, फिर भी अभ्यास और तैयारी नहीं छोड़ता। विवाह में भी माफी मांगना, गलती स्वीकारना, असहमति का सम्मान करना और जरूरत पर समझौता करना जरूरी है। स्नातक-स्नातकोत्तर विद्यार्थियों और अविवाहित युवाओं के लिए यह पाठ्यक्रम विवाह से पहले ही उन्हें संभावित उलझनों के प्रति सजग बनाने का प्रयास है। इसका उद्देश्य प्रमाणपत्र नहीं, रिश्तों की व्यवहारिक समझ विकसित करना है।
समाज का बदलता ढांचा भी ऐसी पहल की जरूरत बताता है। संयुक्त परिवार टूटकर छोटे परिवारों में सिमट रहे हैं और शिक्षा-रोजगार के लिए युवा घरों से दूर बस रहे हैं। पहले बुजुर्ग अपने अनुभव से रिश्तों की उलझनें सुलझाते थे, अब युवाओं को फोन पर माता-पिता और सीमित अनुभव वाले दोस्तों की सलाह मिलती है। ऐसे में रिश्तों की व्यवस्थित शिक्षा उपयोगी हो सकती है। स्वयं को समझना, भावनाओं का सम्मान करना, माफी मांगना और मतभेद बातचीत से सुलझाना हर रिश्ते के लिए जरूरी है। शिक्षा में नौकरी-कमाई पर जोर है, लेकिन भावनात्मक परिपक्वता पर कम चर्चा होती है। स्कूलों में यौन शिक्षा के साथ स्वस्थ रिश्तों और जिम्मेदार साझेदारी की समझ भी विकसित की जानी चाहिए।
गोवा की यह पहल दूसरे राज्यों के लिए भी मिसाल बन सकती है। विवाह की तैयारी में कुंडली, खरीदारी, दहेज और समारोह पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन जीवनसाथी के स्वभाव, विचारों, आर्थिक सोच और अपेक्षाओं को समझना भी जरूरी है। पंद्रह दिन का पाठ्यक्रम सफल विवाह की गारंटी नहीं, पर रिश्तों की समझ जरूर बढ़ा सकता है। विवाह विश्वास, प्रेम, धैर्य और आपसी व्यवहार से टिकता है। यदि युवा इसकी मदद से विवाह से पहले जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं पर खुलकर बात करना सीखें, तो यही इसकी सफलता होगी। क्योंकि शादी एक दिन का आयोजन है, लेकिन विवाह जीवनभर की साझेदारी। सात फेरों के वचन तभी सार्थक हैं, जब वे रस्मों में नहीं, रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई दें।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
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