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Dr. Srimati Tara Singh
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जेनेटिक इंजीनियरिंग: वरदान का चेहरा या विनाश की आहट?

 

सृष्टि या प्रयोगशाला: इंसान को गढ़ने का अधिकार किसका?

[ईश्वर की भूमिका में इंसान: एक नैतिक दुविधा]

[जेनेटिक इंजीनियरिंग: वरदान का चेहरा या विनाश की आहट?]



कल्पना कीजिए, एक ऐसी दुनिया की जहाँ इंसान अपनी संतान के चेहरे की बनावट, आँखों के रंग, बुद्धि, कद-काठी और स्वभाव तक को अपनी पसंद से चुन सके। जहाँ जन्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर बनाया गया “प्रोजेक्ट” बन जाए — ऐसा प्रोजेक्ट जिसमें माता-पिता अपनी इच्छानुसार ‘परफेक्ट’ इंसान रचें। यही है जेनेटिक इंजीनियरिंग का सबसे चमकदार, और शायद सबसे भयावह रूप। विज्ञान ने इंसान को वह सामर्थ्य दे दी है जो अब तक केवल प्रकृति या सृष्टिकर्ता के पास थी — जीवन को अपनी शर्तों पर ढालने की शक्ति। लेकिन असली प्रश्न यह नहीं कि इंसान अब क्या-क्या कर सकता है; असली प्रश्न यह है कि क्या उसे ऐसा करने का अधिकार होना चाहिए।

जेनेटिक इंजीनियरिंग, यानी आनुवंशिक अभियांत्रिकी — वह आधुनिक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से जीवों के जीन में बदलाव किया जाता है। इस तकनीक की मदद से हम फसलों को अधिक उत्पादनक्षम बना सकते हैं, जानवरों में उपयोगी गुण विकसित कर सकते हैं, और इंसानों में जन्म से पहले ही घातक बीमारियों को मिटाने की संभावना खोज सकते हैं। सुनने में यह किसी वरदान से कम नहीं लगता। थैलेसीमिया, कैंसर या हंटिंगटन जैसी वंशानुगत बीमारियों का अंत मानवता के लिए सचमुच एक बड़ी जीत होगी। पर जब यही शक्ति इंसान की स्वाभाविक बनावट, उसके रूप, गुण या प्रकृति को बदलने लगती है — जब जीवन को ‘संशोधित’ या ‘डिज़ाइन’ किया जाने लगता है — तब यही विज्ञान एक गहरी नैतिक दुविधा का कारण बन जाता है।

ज़रा सोचिए, अगर कोई माता-पिता यह तय कर सके कि उनका बच्चा गोरी त्वचा, नीली आँखें, तीव्र बुद्धि और बीमारियों से पूरी तरह मुक्त हो — तो यह दृश्य किसी फिल्म जैसा लगेगा, पर सच यह है कि विज्ञान की गति से यह अब बहुत दूर नहीं। पर सवाल यह है — क्या ऐसा चयन सच में नैतिक है? क्या हम उस सीमा को पार नहीं कर रहे जहाँ इंसान “प्रकृति का परिणाम” नहीं बल्कि “मानव अभिमान” बन जाएगा?  ऐसे समाज में समानता और न्याय की नींव कैसे कायम रह सकेगी? शायद कभी नहीं। क्योंकि तब इंसान दो वर्गों में बँट जाएगा — एक ओर होंगे “डिज़ाइनर इंसान”, जो जो हर दृष्टि से आदर्श बनाए गए होंगे, और दूसरी ओर वे, जो प्रकृति के नियमों के अनुसार जन्मे हैं। यह विभाजन रंग, जाति या संपत्ति पर नहीं, बल्कि जीन पर आधारित नई असमानता को जन्म देगा — एक ऐसी असमानता, जो शायद सबसे गहरी और सबसे खतरनाक होगी।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह प्रयोग खतरे से खाली नहीं है। जीन में ज़रा-सी गड़बड़ी हमारे शरीर के पूरे संतुलन को बिगाड़ सकती है। जिस बीमारी को हम मिटाने की कोशिश करें, वही किसी नई और अनजानी समस्या का रूप ले सकती है। तब सवाल उठता है — क्या हम इन अनिश्चित और संभावित परिणामों का सामना करने के लिए सच में तैयार हैं? और अगर यह तकनीक किसी व्यावसायिक नियंत्रण में चली गई, तो क्या जीवन भी एक “उत्पाद” नहीं बन जाएगा — जैसे कोई विज्ञापन कहे, “संपूर्ण संतान, बस इतने में”? उस स्थिति में विज्ञान मानवता की सेवा नहीं करेगा, बल्कि बाज़ार की माँगों का औजार बन जाएगा।

नैतिकता और आस्था, दोनों ही इस विषय पर अपनी सीमाएँ तय करती हैं। अनेक परंपराएँ मानती हैं कि जीवन की रचना में हस्तक्षेप करना ईश्वर की सृजन प्रक्रिया को चुनौती देना है। जन्म, स्वरूप और विविधता — ये सभी प्रकृति के संतुलन का हिस्सा हैं, जिन्हें बदलने की कोशिश कहीं न कहीं इंसानी अहंकार का प्रतीक बन जाती है। विज्ञान तभी तक कल्याणकारी है जब तक वह दुःख को घटाए और जीवन को बेहतर बनाए, लेकिन जैसे ही वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लगता है, वह वही विज्ञान विनाश का कारण बन जाता है।

यह सच है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग ने चिकित्सा जगत में एक नई क्रांति ला दी है। असंख्य बीमारियों का इलाज अब संभव होता दिख रहा है, और जीवन की गुणवत्ता पहले से कहीं बेहतर बन सकती है। पर उतना ही सच यह भी है कि इस अद्भुत शक्ति के साथ गहरी जिम्मेदारी जुड़ी है। हमें यह सीमाएँ तय करनी होंगी कि इसका उपयोग केवल रोगों को मिटाने और जीवन को सहज बनाने के लिए हो, न कि इंसान को कृत्रिम रूप से “परिपूर्ण” बनाने की अंधी दौड़ में। हमें याद रखना होगा कि विविधता ही मानवता की असली सुंदरता है — हर व्यक्ति की अपनी विशिष्टता, उसकी अपूर्णता ही उसे खास, सजीव और मानवीय बनाती है। 

विज्ञान और नैतिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। विज्ञान तभी सार्थक है जब वह नैतिकता के साथ कदम मिलाकर चले। आज ज़रूरत है एक सख्त और स्पष्ट वैश्विक नीति की, जो यह सुनिश्चित करे कि आनुवंशिक संपादन का उपयोग केवल चिकित्सा और मानव कल्याण के लिए ही सीमित रहे। साथ ही, वैज्ञानिकों के साथ समाज को भी यह समझना होगा कि हर संभव कार्य करना जरूरी नहीं होता — सच्ची बुद्धिमानी उसी में है जहाँ शक्ति के साथ संयम और जिम्मेदारी भी जुड़ी हो।

जेनेटिक इंजीनियरिंग का सबसे गहरा सवाल यही है — क्या हमारा उद्देश्य एक “परिपूर्ण” इंसान बनाना है, या एक “बेहतर” इंसान? परिपूर्णता में अहंकार बसता है, जबकि सुधार में विनम्रता। यदि यह तकनीक मानव पीड़ा को कम करने, बीमारियों को मिटाने और जीवन को अधिक सार्थक बनाने में सहायक बने, तो यह विज्ञान की सबसे महान उपलब्धि कहलाएगी। लेकिन यदि यह इंसान के भीतर से संवेदना, संतुलन और समानता की भावना को मिटाने लगे, तो यही शक्ति उस आग में बदल जाएगी, जिसने इतिहास में सभ्यताओं को बार-बार भस्म किया है। 

इंसान को “डिज़ाइन” करने की शक्ति अब हमारे हाथों में आ चुकी है, पर इंसानियत को बचाए रखने की जिम्मेदारी अब भी हमारे दिलों में है। यही जिम्मेदारी हमारे भविष्य की दिशा तय करेगी — क्या विज्ञान हमारे जीवन को रोशन करेगा या उसी आग में झोंक देगा जो अहंकार से भड़कती है। हमें यह याद रखना होगा कि तकनीक का मूल्य उसकी क्षमता में नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य में छिपा है। अगर हम इस शक्ति का उपयोग करुणा, संतुलन और मानव कल्याण के लिए करें, तो यही विज्ञान आने वाले युगों के लिए प्रकाशस्तंभ बनेगा। लेकिन अगर इसमें मानवीय संवेदना खो गई, तो यही विज्ञान उस अंधकार का नाम बन जाएगा जिसमें सभ्यता अपनी ही रचना के बोझ तले ढह जाएगी। यही वह क्षण है जहाँ हमें तय करना है — क्या हम “सृष्टिकर्ता” बनना चाहते हैं, या सृष्टि के रक्षक बने रहना चाहते हैं।



प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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