जहां इतिहास ने वीरांगनाएं गढ़ीं, वहां बेटियां लापता हैं
[गौरवशाली मध्यप्रदेश की असुरक्षित बेटियाँ: कौन है जिम्मेदार?]
मध्यप्रदेश, वह पावन भूमि जहां सांस्कृतिक वैभव की गंगा बहती है, ऐतिहासिक गौरव के स्वर गूंजते हैं, और प्राकृतिक सौंदर्य की छटा हर दिल को मोह लेती है, आज एक ऐसी सच्चाई के साये में खड़ी है जो आत्मा को झकझोर देती है। यह धरती, जो कभी रानी दुर्गावती और अहिल्याबाई की वीरता की साक्षी रही, आज अपनी बेटियों की खामोश चीखों का दंश झेल रही है। विधानसभा में हाल ही में उजागर हुए आंकड़े समाज के माथे पर एक गहरा दाग बनकर सामने आए हैं। ये आंकड़े केवल ठंडी संख्याएं नहीं, बल्कि उन टूटे सपनों, बिखरे परिवारों और लुप्त होती हंसी की कहानियां हैं, जो मध्यप्रदेश के गौरवशाली इतिहास को चुनौती दे रही हैं। पिछले 18 महीनों (1 जनवरी 2024 से 30 जून 2025) में 21,174 महिलाएं और 1,954 नन्हीं बच्चियां लापता हो चुकी हैं, जिनका कोई सुराग नहीं मिला। ये आंकड़े सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि उन माताओं के आंसुओं में, उन परिवारों के दर्द में और समाज की उदासीनता पर सवाल उठाते हैं। आखिर हम अपनी बेटियों को कहां खो रहे हैं? यह सवाल केवल मध्यप्रदेश का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है, जिसका जवाब ढूंढना अब अनिवार्य हो गया है।
विधानसभा में पूर्व गृहमंत्री के एक सवाल ने इस भयावह सत्य को उजागर किया। सरकार के लिखित जवाब ने बताया कि इस अवधि में 18,776 बच्चियां लापता हुईं, जिनमें से कई को बरामद कर लिया गया, लेकिन 1,954 ऐसी मासूम हैं जिनका एक महीने से अधिक समय तक कोई पता नहीं चला। रतलाम जिला इस त्रासदी की सबसे भयावह तस्वीर पेश करता है, जहां 178 बच्चियां गायब हैं, और उनमें से 124 को सात महीने से अधिक समय से नहीं खोजा जा सका। इंदौर जैसे आधुनिक महानगर में 150 से अधिक बच्चियां लापता हैं, जबकि सागर, जबलपुर, भोपाल और सतना जैसे जिले भी इस संकट की चपेट में हैं। ये आंकड़े प्रशासनिक नाकामी का दर्पण हैं, जो यह चीख-चीखकर बता रहे हैं कि हमारी व्यवस्था अपनी सबसे नाजुक कड़ी—हमारी बच्चियों—की रक्षा करने में असमर्थ साबित हो रही है। इन संख्याओं के पीछे छिपा है एक ऐसा दर्द, जो हर उस परिवार को झेलना पड़ रहा है, जिसकी बेटी की मुस्कान अब केवल यादों में सिमटकर रह गई है।
महिलाओं की स्थिति और भी हृदयविदारक है। सरकार के जवाब के अनुसार, 23,128 गुमशुदगी के मामलों में 21,174 महिलाएं और 1,954 बच्चियां शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में औपचारिक शिकायत तक दर्ज नहीं हुई। क्या सामाजिक डर, दबाव या प्रशासन पर अविश्वास इन परिवारों को चुप रहने के लिए मजबूर कर रहा है? क्या हमारा समाज इतना असंवेदनशील हो चुका है कि वह अपनी बेटियों की गुमशुदगी को सामान्य मानने लगा है? ये आंकड़े केवल गुमशुदगी की कहानी नहीं सुनाते, बल्कि उन अधूरे सपनों, टूटे विश्वास और बिखरे रिश्तों की दास्तान बयां करते हैं, जो हर दिन किसी न किसी परिवार को तोड़ रही है। यह केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता का प्रतीक है।
इस संकट की जड़ें सामाजिक और प्रशासनिक स्तरों पर गहरी पैठ बनाए हुए हैं। मध्यप्रदेश की सामाजिक संरचना में लैंगिक असमानता और भेदभाव की दीवारें आज भी अडिग खड़ी हैं। राज्य की 38% आबादी, जिसमें आदिवासी और दलित समुदाय शामिल हैं, सबसे अधिक जोखिम में हैं। इन समुदायों की महिलाएं और बच्चियां न केवल यौन हिंसा का सामना कर रही हैं, बल्कि सामाजिक अलगाव और आर्थिक दबावों से भी जूझ रही हैं। प्रशासनिक तंत्र में, कुछ ऐसी बाधाएं हैं जो इस समस्या को और जटिल बना रही हैं—जैसे कि गुमशुदगी के मामलों में त्वरित कार्रवाई का अभाव, अपराधियों को पकड़ने में ढिलाई, और शिकायतों को दर्ज करने में अनावश्यक विलंब। रतलाम और इंदौर जैसे क्षेत्रों में लापता बच्चियों की संख्या में कमी नहीं आ रही, और कई बार तो शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया में ही लंबा समय लग जाता है। सामाजिक जागरूकता की कमी और पीड़ित परिवारों को पर्याप्त समर्थन न मिलना इस चुनौती को और गहरा रहा है।
यह केवल आंकड़ों का मसला नहीं है; यह उन टूटे हुए परिवारों की कराह है, जो हर सुबह अपनी बेटी की वापसी की आस में आंखें खोलते हैं। यह उन बच्चियों की पुकार है, जो समाज की उदासीनता और प्रशासन की निष्क्रियता का शिकार हो रही हैं। यह उस मां की आह है, जो अपनी बेटी के लिए न्याय की गुहार लगा रही है। यह स्थिति केवल मध्यप्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे समाज की असफलता का दर्पण है। जब एक समाज अपनी बेटियों को सुरक्षित रखने में नाकाम रहता है, तो वह अपने भविष्य को भी अंधेरे में धकेल देता है। मध्यप्रदेश, जो अपनी सांस्कृतिक धरोहर और प्राकृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है, आज इस सवाल का जवाब ढूंढ रहा है कि उसकी बेटियां कहां गुम हो रही हैं?
इस संकट से उबरने के लिए समाज और प्रशासन को एकजुट होकर कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था में सुधार अनिवार्य है। गुमशुदगी और अपराध के मामलों में त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। पुलिस को संवेदनशील बनाना होगा, ताकि पीड़ित परिवार बिना डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें। सामाजिक जागरूकता अभियानों के माध्यम से लैंगिक समानता और महिलाओं की सुरक्षा को बढ़ावा देना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और समुदायों में बच्चियों और महिलाओं को उनके अधिकारों, आत्मरक्षा और कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। विशेष रूप से आदिवासी और दलित समुदायों के लिए सुरक्षा योजनाएं लागू की जानी चाहिए, ताकि वे सामाजिक और आर्थिक शोषण से बच सकें। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में निगरानी तंत्र को मजबूत करना होगा, ताकि अपराधों को होने से पहले रोका जा सके।
इसके अलावा, सामुदायिक स्तर पर भी बदलाव की जरूरत है। समाज को अपनी बेटियों को केवल बोझ नहीं, बल्कि अपनी शक्ति मानना होगा। परिवारों को अपनी बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के लिए आगे आना होगा। गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। हमें उन परिवारों को सहारा देना होगा, जो अपनी बेटियों की गुमशुदगी के दर्द से जूझ रहे हैं। यह समय केवल आलोचना का नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी का है।
मध्यप्रदेश को अपनी बेटियों की मुस्कान लौटानी होगी। यह वह धरती है, जहां की मिट्टी में वीरता और साहस की कहानियां बसी हैं। यह वह भूमि है, जहां की नदियां स्नेह और ममता की कहानियां कहती हैं। अब समय है कि यह धरती अपनी बेटियों की सुरक्षा की नई कहानी लिखे। यह केवल एक चुनौती नहीं, बल्कि एक संकल्प है—एक ऐसा संकल्प जो हर बेटी को उसका हक, उसका सम्मान और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करे। हमें उन खामोश चीखों को सुनना होगा, जो हमसे न्याय मांग रही हैं। हमें उन आंखों को जवाब देना होगा, जो हर दिन अपनी बेटी की राह तक रही हैं। मध्यप्रदेश को अब केवल अपनी सांस्कृतिक धरोहर का गर्व नहीं करना, बल्कि अपनी बेटियों के भविष्य को संवारना होगा। यह समय है एक नए युग की शुरुआत का, जहां हर बेटी, हर महिला न केवल सुरक्षित हो, बल्कि अपने सपनों को आजाद पंखों के साथ उड़ान भर सके।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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