राहत और चुनौती साथ-साथ: जीएसटी में क्रांतिकारी बदलाव
[राज्यों की वित्तीय स्थिति पर मंडराता संकट]
[एक देश, एक कर का सपना अब और निकट]
गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के क्षेत्र में 3 सितंबर को एक युगांतरकारी और परिवर्तनकारी घोषणा ने भारत की कर व्यवस्था को अभूतपूर्व दिशा दी। जीएसटी परिषद की सभा में सर्वसम्मति से एक सरल, दो-स्तरीय कर ढांचे को स्वीकृति मिली, जिसमें 12% और 28% के पुराने स्तरों को समाप्त कर 5% और 18% की नवीन, सुगम दरें लागू की गई हैं। यह ऐतिहासिक बदलाव 22 सितंबर 2025 से प्रभावी होगा। इस निर्णय से दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि से जुड़े उत्पाद व सेवाएँ और अधिक सस्ती हो जाएँगी, हालाँकि सरकार को 93,000 करोड़ रुपये के राजस्व हानि का अनुमान है। यह कदम न केवल उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए राहतकारी है, बल्कि भारत की आर्थिक नीतियों और संघीय संरचना को एक सशक्त, प्रगतिशील और समावेशी भविष्य की ओर ले जाएगा।
2017 में लागू जीएसटी का लक्ष्य जटिल अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल और एकीकृत करना था, लेकिन चार स्लैब (5%, 12%, 18%, 28%) और विशेष दरों (0%, 0.25%, 3%) ने इसे जटिल बनाए रखा। व्यवसायों को अनुपालन में चुनौतियों और उपभोक्ताओं को उच्च करों का सामना करना पड़ा। नई दो-स्लैब व्यवस्था इस दिशा में एक साहसिक और स्वागतयोग्य सुधार है। हेयर ऑयल, शैंपू, टूथपेस्ट, साबुन, बटर, घी, चीज़, पैकेज्ड नमकीन, भुजिया, बर्तन, बच्चों की दूध की बोतल, नैपकिन, डायपर और सिलाई मशीनों पर जीएसटी अब केवल 5% होगी। स्वास्थ्य क्षेत्र में हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस पर जीएसटी 18% से घटाकर शून्य कर दिया गया, जबकि थर्मामीटर, मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन, डायग्नोस्टिक किट और ग्लूकोमीटर पर 5% कर लागू होगा। शिक्षा क्षेत्र में मैप, चार्ट, ग्लोब, पेंसिल, शार्पनर और नोटबुक जैसी वस्तुएं कर-मुक्त होंगी। कृषि क्षेत्र में ट्रैक्टर टायर, बायो कीटनाशक, माइक्रो न्यूट्रिएंट्स और ड्रिप इरिगेशन सिस्टम पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% किया गया है। ये सुधार निम्न और मध्यम वर्ग के लिए विशेष रूप से लाभकारी होंगे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी और जीवनयापन आसान होगा।
भारत की नई जीएसटी व्यवस्था उपभोक्ताओं, व्यवसायों और अर्थव्यवस्था के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगी। इस सुधार के फायदे स्पष्ट और दूरगामी हैं। पहला, रोजमर्रा की जरूरतों जैसे हेयर ऑयल, शैंपू, टूथपेस्ट, बटर, घी और चीज़ पर कर घटने से निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों का घरेलू बजट हल्का होगा। इससे खाद्य मुद्रास्फीति पर भी अंकुश लगेगा, जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ताओं के लिए राहतकारी है। दूसरा, स्वास्थ्य और लाइफ इंश्योरेंस पर जीएसटी शून्य होने से बीमा योजनाएँ सस्ती होंगी, जिससे विशेष रूप से ग्रामीण भारत में अधिक लोग स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ उठा सकेंगे। यह भारत जैसे देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी हैं, एक क्रांतिकारी कदम है। तीसरा, शिक्षा क्षेत्र में मैप, चार्ट, पेंसिल और नोटबुक जैसी स्कूली सामग्री पर जीएसटी शून्य होने से शिक्षा सस्ती और समावेशी बनेगी, जिससे गरीब परिवारों के बच्चों को बेहतर अवसर मिलेंगे। चौथा, कृषि क्षेत्र में ट्रैक्टर टायर, बायो कीटनाशक और ड्रिप इरिगेशन सिस्टम पर कर 12% से घटाकर 5% करने से किसानों की लागत कम होगी, जिससे टिकाऊ खेती और जल-संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। यह भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए एक दूरदर्शी कदम है। दो स्लैब वाली सरल जीएसटी व्यवस्था से व्यवसायों के लिए अनुपालन आसान होगा, कर चोरी कम होगी और 'एक देश, एक कर' का सपना साकार होगा।
हालांकि, इस सुधार की चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी चिंता 93,000 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे की है, जो सरकार के वित्तीय घाटे को बढ़ा सकता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को प्रत्यक्ष करों या गैर-कर राजस्व जैसे वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे, वरना बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश प्रभावित हो सकता है। दूसरा, राज्यों को होने वाली राजस्व हानि एक गंभीर मुद्दा है। छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर राज्य, जो जीएसटी आय पर निर्भर हैं, विकास कार्यों जैसे सड़क, स्कूल और अस्पतालों के लिए संसाधनों की कमी का सामना कर सकते हैं। तीसरा, प्रस्तावित 40% स्लैब, जिससे 45,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय की उम्मीद है, अस्पष्टता का कारण है। यदि यह विलासिता की वस्तुओं (जैसे लग्जरी कार या शराब) पर लागू होता है, तो यह स्वीकार्य होगा, लेकिन आवश्यक वस्तुओं पर लागू होने से मध्यम वर्ग पर बोझ बढ़ सकता है। चौथा, कुछ वस्तुएँ जो पहले 12% या 28% स्लैब में थीं, अब 18% स्लैब में आ सकती हैं, जिससे उनकी कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई को बढ़ावा मिल सकता है। अंत में, नई दरों का कार्यान्वयन छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि उन्हें अपनी लेखा प्रणाली, मूल्य निर्धारण और आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव के लिए समय और लागत निवेश करनी होगी।
भारत की नई जीएसटी व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करना और इसके नकारात्मक प्रभावों को न्यूनतम करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। राजस्व घाटे की चुनौती से निपटने के लिए ठोस और नवोन्मेषी उपाय अपनाए जा सकते हैं। पहला, शराब, तंबाकू और लग्जरी कार जैसी विलासिता और हानिकारक वस्तुओं पर 40% स्लैब लागू कर राजस्व को बढ़ाया जा सकता है, जिससे आवश्यक वस्तुओं पर कर बोझ कम रहे। दूसरा, आयकर और कॉर्पोरेट कर में सुधार के जरिए अतिरिक्त राजस्व जुटाया जा सकता है, जो कर आधार को और व्यापक बनाएगा। तीसरा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, जैसे ई-कॉमर्स और ऑनलाइन सेवाओं, पर कर वसूली को और सशक्त कर राजस्व की कमी को पूरा किया जा सकता है। चौथा, राज्यों की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक पारदर्शी और त्वरित मुआवजा योजना लागू करनी होगी। साथ ही, छोटे और मध्यम उद्यमों को नई व्यवस्था के अनुपालन में सहायता के लिए सरकार को जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान करनी चाहिए, ताकि उनकी परिवर्तन प्रक्रिया सुगम हो।
यह जीएसटी सुधार भारत की अर्थव्यवस्था को उपभोक्ता-केंद्रित, सरल और समावेशी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल रोजमर्रा की वस्तुओं को सस्ता कर उपभोक्ताओं को राहत देगा, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा को अधिक सुलभ बनाएगा, और कृषि क्षेत्र को सशक्त करेगा। कोविड-19 के बाद आर्थिक पुनरुत्थान के दौर में यह सुधार उपभोक्ता विश्वास और खपत को बढ़ाने में उत्प्रेरक साबित होगा। हालांकि, 93,000 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे, राज्यों की वित्तीय चिंताओं और 40% स्लैब की अस्पष्टता जैसे मुद्दों का त्वरित और प्रभावी समाधान आवश्यक है। यदि सरकार इन चुनौतियों को रणनीतिक ढंग से संबोधित करती है, तो यह सुधार भारत को एक अधिक लचीली, समावेशी और गतिशील अर्थव्यवस्था की ओर ले जाएगा। यह न केवल कर प्रणाली को सरल बनाएगा, बल्कि भारत के आर्थिक विकास को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करेगा।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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