14 नवंबर: बाल दिवस
हमने चाँद छुआ, पर बचपन की मिट्टी खो दी
[जहाँ बाल दिवस मनाना ज़रूरी हो, वहाँ कुछ ग़लत है]
[बाल दिवस: एक दिन की खुशी नहीं, एक पीढ़ी का सवाल है]
एक सदी बाद जब कोई पुरातत्वविद् हमारे शहरों की मिट्टी उलटेगा, तो उसे एक अजीब-सा दृश्य दिखेगा। ज़मीन के नीचे दबे लाखों प्लास्टिक के खिलौने, टूटे स्मार्टफोन, और एक मोटी धूल भरी फाइल – जिसके कवर पर लिखा होगा “बाल दिवस 2025 – भाषण, नारे, तस्वीरें”। वह फाइल खोलेगा तो पन्ने अपने आप खुलेंगे, पर उनमें कोई बच्चे की हँसी नहीं बचेगी। वह हैरान होकर पूछेगा – “इतनी समृद्ध सभ्यता, इतनी तकनीक, फिर भी ये लोग हर साल एक दिन बच्चों को याद करने के लिए मजबूर थे?” यह सवाल अभी हमारे कानों में गूँज रहा है। अभी वक्त है। अभी हम बदल सकते हैं। अभी हम यह तय कर सकते हैं कि आने वाली सदी को भाषणों की धूल भरी फाइल न मिले, बल्कि जीवंत बचपनों की चमक मिले।
जब किसी बच्चे की आँखों में सपनों की चमक उभरती है, तो वह सिर्फ़ एक मासूम मुस्कान नहीं होती – वह आने वाले कल की धड़कन होती है। उसकी खिलखिलाहट में वह ऊर्जा होती है जो किसी भी समाज की दिशा बदल सकती है। 14 नवंबर को हम बाल दिवस मनाते हैं, क्योंकि यह पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्म जयंती है। लेकिन यह सिर्फ़ चाचा नेहरू को श्रद्धांजलि नहीं है। यह उस विचार का जश्न है जो कहता है – “बच्चे देश की आत्मा हैं।” नेहरू जी जानते थे कि यदि बच्चों की सोच स्वतंत्र होगी, तो देश की सोच भी स्वतंत्र होगी। शिक्षा उनके लिए पाठ्यपुस्तक नहीं, जीवन जीने की कला थी। आज जब स्कूलों में गुब्बारे उड़ते हैं, तो यही सवाल पूछना चाहिए – क्या हम उस विचार को जी रहे हैं, या सिर्फ़ उसका नाम ले रहे हैं?
आज का बच्चा दो भाषाएँ जन्म से बोलता है – माँ की लोरी और एल्गोरिदम की धुन। दुनिया का ज्ञान उसकी उंगलियों पर है, लेकिन हम उसे सिर्फ़ डेटा का भंडार बना रहे हैं या समझ भी दे रहे हैं? एक तरफ़ डिजिटल इंडिया, दूसरी तरफ़ डिजिटल डिवाइड। हमने स्मार्टफोन थमा दिया, पर नीली स्क्रीन से बचाने वाला मानसिक स्वास्थ्य नहीं। गाँव की लड़कियां सूरज को छूना चाहती है, पर उनके स्कूल में टॉयलेट नहीं। हम अंतरिक्ष में झंडा गाड़ रहे हैं, पर ज़मीन पर लाखों बच्चियाँ शौचालय के अभाव में स्कूल छोड़ देती हैं। शहरों में ऊँची इमारतें हैं, खेल के मैदान गायब। पार्कों की जगह पार्किंग। बच्चे कंक्रीट के जंगल में लुका-छिपी खेलते हैं जहाँ छिपने की जगहें हैं, भागने की नहीं। हम उन्हें मॉल की कंडीशंड हवा में “आउटडोर” का झूठा अहसास देते हैं, फिर हैरान होते हैं कि डायबिटीज़ दस साल की उम्र में दस्तक दे रही है।
शिक्षा की बात करते हैं, पर सिखाते क्या हैं? रटंत, रैंक, रिजल्ट। असफलता से उठना नहीं सिखाते। गलती करना अपराध नहीं, प्रयोग है – यह नहीं बताते। करुणा जीवन का ऑपरेटिंग सिस्टम है – यह नहीं समझाते। नतीजा, टॉप रैंक वाला बच्चा एक मार्क कम आने पर आत्महत्या कर लेता है। हमने जीतना सिखाया, हार संभालना नहीं। करियर बनाना सिखाया, ज़िंदगी जीना नहीं। बचपन कोई उम्र नहीं, अवस्था है – जिसमें सवाल करने की हिम्मत हो, गलत होने का डर न हो, हर चीज़ में जादू दिखे। हमने होमवर्क, ट्यूशन और परफेक्शन के बोझ तले दबा दिया। अब वक्त है बोझ हटाने का, आकाश वापस देने का।
बच्चे केवल भविष्य के नागरिक नहीं, वर्तमान के शिक्षक भी हैं। उनकी जिज्ञासा हमें प्रश्न पूछना सिखाती है, मासूमियत सच्चाई की कीमत बताती है, उत्साह याद दिलाता है कि जीवन लक्ष्य पाने का नाम नहीं, अनुभव करने की प्रक्रिया है। नेहरू जी ने कहा था, “हम अपने बच्चों को वह जीवन दें जो भय से मुक्त हो।” आज यह वाक्य और प्रासंगिक है। जब समाज तनाव, हिंसा और असमानता से भरा हो, तब बच्चों के मन को सुरक्षित रखना ही सबसे बड़ा राष्ट्रनिर्माण है। लाखों बच्चे अभी भी मजदूरी के औज़ार थामे हैं, पेट की भूख से लड़ते हैं। बाल दिवस का असली अर्थ तभी पूरा होगा जब यह अंतर मिटेगा – जब हर बच्चा, गाँव का हो या शहर का, अमीर हो या गरीब, शिक्षा और सम्मान का हकदार बनेगा।
असली क्रांति तब होगी जब स्कूल की दीवारें गिरेंगी। जब किसान का बेटा खेत में केमिस्ट्री सीखेगा, मछुआरे की बेटी लहरों से फिजिक्स। जब कूड़ा बीनने वाला बच्चा रीसाइक्लिंग का बिज़नेस मॉडल बना लेगा। तब नवाचार लैब में नहीं, ज़िंदगी की मजबूरी में जन्म लेगा। तब IQ से ज़्यादा AQ (एडेप्टेबिलिटी कोशंट/अनुकूलन क्षमता) महत्वपूर्ण होगी। हमें बच्चों को केवल अच्छे अंक नहीं, अच्छा इंसान बनने की दिशा देनी है। सफलता का अर्थ प्रतिस्पर्धा में आगे निकलना नहीं, समाज में कुछ अच्छा जोड़ना है। यदि हर बच्चा संवेदना, दया, सृजन और सत्य को पहचान ले, तो भारत का भविष्य चमत्कार से कम नहीं होगा।
यह बाल दिवस कोई त्योहार नहीं, अलार्म है। अगर हम अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। वह नहीं पूछेगी कितनी जीडीपी बढ़ाई। पूछेगी – “तुमने हमारे लिए कौन सा आकाश बचाया?” यह दिन संकल्प का दिन है। संकल्प कि दस साल में हर बच्चे को गुणवत्ता शिक्षा मिलेगी, हर गाँव में मुफ्त इंटरनेट वाली लाइब्रेरी होगी, लड़कियों को साइंस लैब में बराबर हक मिलेगा। हम बच्चे को उपभोक्ता नहीं, सृजनकर्ता बनाएँगे। जब प्लास्टिक फेंकते हैं, याद रखें – वह समुद्र में पहुँचकर किसी बच्चे के भविष्य को निगल जाएगी। जब रिश्वत लेते हैं, याद रखें – उस पैसे से कोई स्कूल बन सकता था।
आज रात अपने भीतर के बच्चे से पूछिए – “तुम खुश हो?” अगर जवाब हाँ नहीं, तो सुबह कुछ बदल डालिए। क्योंकि बच्चे बाहर नहीं, हमारे भीतर हैं। जब तक हमारा अपना बचपन जिंदा है, कोई बच्चा अकेला नहीं रहेगा। इस बाल दिवस पर नया प्रण लें – किसी भी बच्चे की मुस्कान को परिस्थितियों की धूल में खोने न दें। हर बच्चे को सपने देखने की जगह, सोचने की आज़ादी, गिरने के बाद उठने का साहस दें। क्योंकि जब एक बच्चा खिलता है, तभी समाज महकता है। और जब हर बच्चे की आँखों में सपना नहीं, उसे पूरा करने का हौसला होगा, तभी पुरातत्वविद् को भाषणों की फाइल नहीं, एक जीवंत सभ्यता की कहानी मिलेगी – जिसने बच्चों को सिर्फ़ याद नहीं किया, बल्कि उनके लिए जीया।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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