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दुनिया की निगाहें पाकिस्तान पर: यूएनएससी अध्यक्षता की साख दांव पर

 

दुनिया की निगाहें पाकिस्तान पर: यूएनएससी अध्यक्षता की साख दांव पर

[क्या पाकिस्तान यूएनएससी में अपने अतीत से ऊपर उठ पाएगा?]


जुलाई 2025 का महीना वैश्विक कूटनीति के लिए एक नया मोड़ लेकर आया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की अध्यक्षता का जिम्मा इस बार पाकिस्तान के कंधों पर है—एक ऐसा देश, जिसका इतिहास विवादों, संदेहों और भू-राजनीतिक जटिलताओं की गहरी परछाइयों से भरा है। यह अवसर केवल एक औपचारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि पाकिस्तान के लिए अपनी विश्वसनीयता, परिपक्वता और वैश्विक नेतृत्व की क्षमता को साबित करने की कठिन अग्निपरीक्षा है। विदेश मंत्री इसहाक डार ने इसे गर्व का क्षण बताते हुए बड़े-बड़े वादों का पिटारा खोला है, लेकिन सवाल वही है—क्या ये वादे केवल शब्दों की चमक हैं, या इनमें वैश्विक शांति की राह बदलने की ताकत है?

यूएनएससी की अध्यक्षता कोई साधारण जिम्मेदारी नहीं। यह वह मंच है, जहां विश्व के सबसे जटिल और ज्वलनशील मुद्दों पर चर्चा होती है—यूक्रेन-रूस युद्ध की आग, मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव, अफ्रीका में मानवीय संकट, और जलवायु परिवर्तन जैसे गैर-पारंपरिक खतरे। इन सबके बीच, पाकिस्तान को न केवल 15 सदस्य देशों (पांच स्थायी और दस अस्थायी) के बीच संतुलन बनाना है, बल्कि वैश्विक समुदाय की उम्मीदों पर भी खरा उतरना है। डार ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुध्रुवीय दुनिया के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। लेकिन जब इतिहास और वर्तमान के ताने-बाने को देखते हैं, तो संदेह के बादल गहरा जाते हैं। पाकिस्तान का अतीत उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा है। आतंकवाद को लेकर उसकी नीतियां, भारत और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसियों के साथ तनावपूर्ण रिश्ते, और क्षेत्रीय अस्थिरता में उसकी कथित भूमिका ने वैश्विक समुदाय में उसकी साख को बार-बार चोट पहुंचाई है। क्या वह इन सवालों के साये से निकलकर एक निष्पक्ष और प्रभावी नेतृत्व दे पाएगा? यह सवाल केवल पाकिस्तान की कूटनीतिक क्षमता का ही नहीं, बल्कि उसकी मंशा और इच्छाशक्ति का भी है।

पाकिस्तान का यूएनएससी में यह आठवां कार्यकाल है। दो साल के इस अस्थायी सदस्यता के दौर में, उसे वैश्विक मंच पर अपनी नीतियों को साबित करने का मौका मिला है। लेकिन उसकी कथनी और करनी के बीच का अंतर हमेशा चर्चा का विषय रहा है। एक ओर, वह खुद को शांति और सहयोग का पैरोकार बताता है; दूसरी ओर, उसकी आंतरिक और बाहरी नीतियां अक्सर विरोधाभासी रही हैं। आतंकवाद के खिलाफ उसकी कार्रवाइयों पर सवाल उठते रहे हैं, और भारत के खिलाफ उसकी आक्रामक बयानबाजी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी निष्पक्षता पर संदेह पैदा किया है। यूएनएससी की अध्यक्षता जैसे मंच पर, जहां निष्पक्षता और समावेशिता की अपेक्षा की जाती है, पाकिस्तान को अपने क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना होगा। डार ने संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान की बात की है, लेकिन क्या वह इन शब्दों को हकीकत में बदल पाएगा? यह तभी संभव होगा, जब वह अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को दरकिनार कर एक वैश्विक दृष्टिकोण अपनाए।

पाकिस्तान के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव, स्थायी सदस्यों—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—के बीच भू-राजनीतिक तनाव, और अस्थायी सदस्यों की आवाज को बुलंद करने की जिम्मेदारी इसे एक तार पर चलने जैसा बनाती है। इसके अलावा, पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति भी इस जिम्मेदारी को और जटिल बनाती है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद जैसे मुद्दों से जूझ रहा यह देश वैश्विक मंच पर कितना प्रभावी हो सकता है? उसकी कूटनीतिक नीतियां अक्सर घरेलू दबावों और सैन्य प्रभाव से निर्देशित होती रही हैं। ऐसे में, क्या वह त्वरित और निष्पक्ष निर्णय लेने में सक्षम होगा? क्षेत्रीय स्थिरता, खासकर अफगानिस्तान और भारत के साथ संबंध, उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अगर वह इन मुद्दों पर निष्पक्षता दिखाने में विफल रहा, तो उसकी साख और प्रभाव को गहरा धक्का लगेगा। वैश्विक समुदाय की नजर इस बात पर भी होगी कि क्या वह आतंकवाद, शरणार्थी संकट और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठा पाता है।

यह अध्यक्षता पाकिस्तान के लिए अपनी छवि को नया रंग देने का सुनहरा अवसर है। अगर वह इस मंच का उपयोग न केवल अपने हितों को बढ़ावा देने, बल्कि वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए रचनात्मक कदम उठाने में कर सके, तो यह उसकी कूटनीतिक जीत होगी। लेकिन यह रास्ता आसान नहीं। स्थायी सदस्यों के परस्पर विरोधी हितों के बीच संतुलन बनाना, छोटे और विकासशील देशों की चिंताओं को संबोधित करना, और मानवीय संकटों में त्वरित सहायता प्रदान करना—ये सभी ऐसी चुनौतियां हैं, जो उसकी नेतृत्व क्षमता की गहरी परीक्षा लेंगी।वैश्विक समुदाय में इस नई भूमिका को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ इसे एक मौके के रूप में देखते हैं, जहां पाकिस्तान अपनी छवि को सुधार सकता है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि उसका अतीत और वर्तमान नीतियां इस जिम्मेदारी को निभाने में बाधा बन सकती हैं। उदाहरण के लिए, आतंकवाद के मुद्दे पर उसका रुख हमेशा विवादास्पद रहा है। क्या वह इस बार वैश्विक समुदाय का भरोसा जीत पाएगा?

जुलाई 2025 का यह महीना पाकिस्तान के लिए एक ऐतिहासिक पड़ाव है। दुनिया की निगाहें इस्लामाबाद पर टिकी हैं, यह देखने के लिए कि वह इस जिम्मेदारी को कैसे निभाता है। क्या वह वैश्विक शांति के लिए एक नया अध्याय लिखेगा, या उसका नेतृत्व शब्दों की बाजीगरी तक सीमित रह जाएगा? अगर वह निष्पक्षता, पारदर्शिता और रचनात्मकता के साथ इस मंच का उपयोग कर पाया, तो यह न केवल उसकी छवि को बदल सकता है, बल्कि विश्व शांति के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। लेकिन अगर वह अपने अतीत की छाया से बाहर नहीं निकल पाया, तो यह अवसर एक और खोया हुआ मौका बनकर रह जाएगा। पाकिस्तान के सामने सवाल साफ है—क्या वह इतिहास के बोझ को उतारकर भविष्य की उम्मीद बन सकता है? यह पल न केवल उसकी कूटनीतिक क्षमता को परखेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि वह वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार खिलाड़ी के रूप में उभर पाता है या नहीं। दुनिया इंतजार में है, और समय इसका जवाब देगा।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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