Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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दीपावली

 

दीप जलें सबके द्वारतभी पूर्ण होगा त्यौहार

[जलाओ ऐसा दीप, जो किसी और का अंधकार हर ले]

[जो दूसरों के जीवन में रोशनी भर दे — वही सच्चा दीया है]



दीपावली की वह पवित्र ज्योति, जो अंधकार की गहराइयों में भी हृदय की धड़कनों को प्रज्वलित कर देती है, आज फिर लौट आई है। लेकिन क्या यह प्रकाश मात्र हमारे आंगन तक सिमटा रहे? बिल्कुल नहीं। यह तो उन उदास मुखों की ओर बढ़े, जो आंसुओं की बाढ़ में डूबे हैं, जिनकी आंखों में सपनों की चिंगारियां बुझ चुकी हैं। कल्पना कीजिए उस सड़क किनारे भूखे बच्चे को, जो पटाखों की चमक निहारता है, पर उसके हाथों में केवल खालीपन है या उस एकाकी बुजुर्ग की झुर्रियों में छिपे दर्द को, जो ठंडी रातों में दीये की तपिश तलाशता फिरता है। दीपावली का मूल संदेश यही है—उदास चेहरों पर मुस्कान की अमृत वर्षा बरसाओ। मिलकर ऐसा पर्व मनाओ कि हर हृदय में अमर प्रेम की ज्योति सदा प्रज्ज्वलित रहे। राम का अयोध्या प्रवेश तो महज कथा है; सच्ची विजय तब है जब हम बुराई के साये में छिपे दुखों को मिटाएं, और लक्ष्मी की कृपा से समृद्धि हर जरूरतमंद के द्वार पर उतरे। 

दिल दहला देने वाली वह पीड़ा—परिवार बिखरते हैं, नौकरियां छिन जाती हैं, महंगाई की ज्वाला हर कोने में भड़क रही है। कोरोना की काली परछाईं ने लाखों घरों को उजाड़ दिया; विधवाओं के आंसू सूखे नहीं, अनाथ बच्चों की हंसी दर्द में बदल गई। ऐसे में, यदि हम अपने दीये बाहर ले चलें, पड़ोसी के आंगन में प्रज्ज्वलित करें, तो यही सच्ची दीपावली है। भावुक होकर सोचें उस मजदूर को, जो सालभर की कमाई गांव लौटाता है, मगर महंगाई उसे निगल लेती है। उसके लिए राशन का थैला, बच्चों के लिए नए वस्त्र, बुजुर्गों के लिए दवा—ये साधारण दान उदासी की दीवारें ध्वस्त कर देंगे। पर्यावरण का दर्द भी इन उदास चेहरों का अभिन्न अंग है; पटाखों की धुंध से सांसें रुक रही हैं, आकाश धुंधला, नीला नहीं रहा। ग्रीन दीपावली का संकल्प लें—प्राकृतिक रंगों से रंगोली सजाएं, सौर दीये जलाएं, पौधे रोपकर धरती को गले लगाएं। यह हवा को शुद्ध करेगा, आने वाली पीढ़ियों को प्रदूषण-रहित रोशनी का त्योहार सौंपेगा। बच्चे स्वच्छ वायु में सांसें लें, बुजुर्ग शांति से मुस्कुराएं—यही दीपावली की सच्ची, अपराजेय विजय है।

हृदयविदारक है वह एकाकी मां की कथा, जो पति के वियोग में दीपावली की काली रात अकेले काटती है, आंसुओं से दीये की लौ भिगोती रहती है। या सीमा पर तैनात सैनिक की पत्नी, जो जलती दीयों को निहारते हुए पति की प्रतीक्षा में तड़पती है। दीपावली पुकार रही है—खुशी का दीप बांटो, क्योंकि एकाकी ज्योति तो फीकी पड़ जाती है, किंतु सहस्रों मिलकर सूर्य-तुल्य प्रभा बिखेर देती हैं। पड़ोस में सामूहिक दीपदान का संकल्प लें, जहां हर हाथ आगे बढ़े। अनाथालयों में पहुंचें, बनें उनके अपने भाई-बहन; भाई दूज पर तिलक लगाएं, मिठाई की मिठास खिलाएं। वह पल—जब अनाथ की आंखों में चमक लौटे, जब उदास मुस्कान हृदय को स्पंदित कर दे—अमूल्य रत्न है। गांधीजी की अमर वाणी स्मरण करें: 'सेवा ही सच्ची भक्ति है'। लक्ष्मी पूजन से पूर्व जरूरतमंदों को धन-धान्य बांटें, क्योंकि सच्ची देवी वही जो दुखियों का दुख हर ले। सोशल मीडिया की झूठी चमक में मत खोइए, वास्तविक स्पर्श दीजिए—दूर अपनों से वीडियो जोड़ें, किंतु आसपास के उदासों को सीने से लगाएं। मिठाइयों की बजाय प्रेम की मधुरता बरसाएं, घरेलू भोज में हंसी की ध्वनि गूंजे।

परंपराओं की जड़ें अटल हैं, इन्हें आधुनिक मिट्टी में अंकुरित करें। रामायण से सीख लें—सीता की सहनशीलता, हनुमान की निष्ठा, राम की न्यायनिष्ठा। नर्कासुर वध सिखाता है: आंतरिक राक्षसों—लोभ, क्रोध, ईर्ष्या—का संहार करें। धनतेरस पर स्वास्थ्य का पूजन करें, क्योंकि निरोगी काया ही समृद्धि का आधार है। गोवर्धन पूजा में प्रकृति को नमन करें, कृष्णवत् समाज के भार को कंधों पर लें। भाई दूज का रेशम बंधन विस्तृत करें—हर जरूरतमंद को अपना भाई-बहन मानें, जाति-धर्म की बेड़ियां तोड़ें। कल्पना करें ऐसा भारत, जहां दीपावली रात्रि सड़कें दीयों की उज्ज्वल नदी बन जाएं, कोई भूखा न सोए, कोई एकाकी न रोए। यह स्वप्न साकार होगा यदि संकल्प बंधे—हर व्यक्ति एक उदास चेहरा गोद ले, मुस्कान का दीप प्रज्वलित करे। स्वयंसेवी संगठनों से जुड़ें, रोटरी-लायंस संग मिलकर राशन वितरण करें। स्कूलों में 'उजाला अभियान' चलाएं—बच्चे चित्रों से दर्द मिटाएं, वृद्धाश्रमों में गीतों की वर्षा करें। योग-ध्यान से आंतरिक ज्योति जगाएं, ताकि बाहरी तमस्‌ नष्ट हो।

आर्थिक विषमता त्योहारों को कांटों भरा बना रही है; अमीरों की ऐश्वर्य-चमक गरीबों को झुलसाती है, किंतु सादगी ही सच्ची लक्ष्मी है। बाजार की अंधी दौड़ त्यागें, घर की गर्माहट अपनाएं। डिजिटल युग में ऑनलाइन दान करें, मगर वर्चुअल न ठहरें—हाथों का स्पर्श अनुपम है। 'दीप जलें, दीप जलें' गान से नृत्य करें, गाएं, एक-दूसरे को आलिंगन दें। यह एकता का पर्व है—मुस्लिम भाई दीप प्रज्वलित करें, ईसाई मित्र पूजन में सहभागी हों, सिख साथी लंगर बांटें। सीमावर्ती सैनिकों हेतु प्रार्थना करें, उनके परिवारों को साहस प्रदान करें। वह भावुक क्षण—जब आंसू आनंद के बहें, जब उदासी की काली रात्रि सूर्योदय की लाली में विलीन हो जाए।

दीपावली का अमर संदेश गूंजता है—अंधकार का संहार करो, प्रकाश की अपराजित विजय का उत्सव मनाओ! उदास मुखों पर मुस्कान की उकेरी कर हम स्वयं को दिव्यतापूर्ण बना लें। मिलजुलकर मनाएं यह पावन पर्व, क्योंकि सामूहिक ज्योति अटल और अजेय है। हर दीया बने एक हृदय की थरथराती धड़कन, हर हंसी जीवन का मधुर स्वरलहरी। जीवन की सच्ची सार्थकता तो दूसरों की आनंद-धारा में ही निहित है। इस दीपावली से दृढ़ संकल्प बंध लें—प्रत्येक दिवस उदासियों का अंत करें, प्रेम की अमिट ज्योति प्रज्वलित करें। तभी लक्ष्मी का सच्चा अवतरण होगा—शांति की नदी, समृद्धि का सागर, अनंत प्रेम का आलोक। जलें हम दीपों की भांति निस्वार्थ भाव से, दूसरों को भी जलाएं, और जलाते रहें अखंड—ताकि कोई चेहरा उदास न झुके, हर नेत्र में बस उज्ज्वल रोशनी का साम्राज्य हो।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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