देखते रहे लोग... मरती रही इंसानियत
[इंसानियत की लाश पर खड़ा ये आधुनिक समाज]
[मरती ज़िंदगी का लाइव वीडियो – समाज की शर्मनाक कहानी]
भीड़ थी। लोग थे। मोबाइल थे। कैमरे थे। बस इंसान नहीं थे। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में जो हुआ, वह सिर्फ एक युवती की हत्या नहीं थी—वह हमारी संवेदनाओं, हमारी मानवता और हमारी सामूहिक हिम्मत की भी निर्मम हत्या थी। बीच बाजार, दोपहर का वक्त, भीड़ भरा चौक—और अचानक एक युवक ने चाकू निकाला, अपनी प्रेमिका का गला रेता, वह ज़मीन पर गिर पड़ी, खून बहता गया… और लोग? लोग बस देखते रहे। कोई वीडियो बना रहा था, कोई लाइव अपडेट दे रहा था, कोई बस चीख रहा था—लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ा। किसी ने उस सिरफिरे को रोकने की कोशिश नहीं की। किसी ने उस युवती का हाथ थामने, उसकी ज़िंदगी बचाने की कोशिश नहीं की। यह कैसा समाज बन गया है हमारा? जहाँ मरती हुई लड़की को देखकर लोग “क्लिप” बनाते हैं, “कमेंट” करते हैं, लेकिन “कदम” नहीं बढ़ाते। जहाँ इंसान की मौत अब ‘कंटेंट’ बन चुकी है।
आज सोशल मीडिया के दौर में हम सब रिपोर्टर बन गए हैं, पर इंसान रहना भूल गए हैं। हर घटना को हम पहले कैमरे में कैद करना चाहते हैं, ताकि बाद में उसे शेयर कर सकें—“देखो, मैं वहाँ था!” पर कोई यह नहीं सोचता कि, “अगर मैं वहाँ था, तो मैंने क्या किया?” बालाघाट की यह घटना सिर्फ एक लड़की की नहीं, हर उस इंसान की कहानी है जिसे भीड़ ने मरने के लिए छोड़ दिया। समनापुर चौक पर भीड़ थी—सैकड़ों लोग मौजूद थे। अगर उनमें से पाँच लोग भी हिम्मत दिखा देते, तो शायद एक ज़िंदगी बच सकती थी। पर हम सब अब डर के खोल में जीते हैं—‘कोई और कर लेगा’, ‘क्यों पड़े मुसीबत में’, ‘मुझे क्या लेना-देना’। यही “मुझे क्या” वाली सोच अब हमारे समाज की सबसे बड़ी बीमारी बन चुकी है।
कहते हैं, अपराधी से बड़ा अपराधी वह होता है जो अपराध होते हुए चुप रहता है। यह चुप्पी, यह निष्क्रियता ही आज हमारे समय का सबसे बड़ा पाप है। वह युवक—जो अपनी प्रेमिका का गला रेत रहा था—एक क्षण के लिए भी नहीं रुका। क्योंकि उसे पता था कि कोई नहीं रोकेगा। उसे पता था कि भीड़ बस तमाशा देखेगी। और हुआ भी वही। लोग चिल्लाते रहे, लेकिन दूर से। किसी ने आगे बढ़कर कुछ नहीं किया। कईयों ने वीडियो बनाया, ताकि शाम को “व्हाट्सऐप स्टेटस” डाल सकें—“शॉकिंग इवेंट इन बालाघाट।” यह कैसी “सभ्यता” है जहाँ संवेदनाएँ मर चुकी हैं, जहाँ बहादुरी की जगह बेशर्मी ने ले ली है, जहाँ इंसान के खून से ज़्यादा “व्यूज़” की कीमत है?
बालाघाट की यह घटना कोई “अलग मामला” नहीं है, बल्कि पूरे समाज की तस्वीर है। आज हर शहर, हर गली, हर मोड़ पर इंसानियत सांसें तो ले रही है, मगर ज़िंदा नहीं है। कोई महिला सड़क पर थप्पड़ खाए, कोई बच्चा ठोकर खाकर गिरे, कोई बुज़ुर्ग फुटपाथ पर बेहोश हो जाए—तो लोग दौड़कर मदद नहीं करते, बल्कि जेब से मोबाइल निकालते हैं। दर्द अब “कंटेंट” बन चुका है, और करुणा “डेटा पैक” में समा गई है। हम उस दौर में पहुँच गए हैं जहाँ मोबाइल की नीली रोशनी ने इंसान की आँखों की लाज निगल ली है। जहाँ कैमरे का फोकस तो चुभने लायक साफ़ है, पर दिल का ज़मीर धुँध में खो गया है। अब इंसानियत की पुकार नहीं सुनाई देती—बस नोटिफिकेशन की टिंग सुनाई देती है।
क्या हमारा डर अब इतना विशाल हो गया है कि किसी की जान बचाना हमें “खतरा” लगने लगा है? क्या हम इतने असहाय हो गए हैं कि अपराध रोकने की बजाय उसकी रिकॉर्डिंग में सुकून ढूँढ़ते हैं? क्या अब कानून का भय उन हाथों को बाँध देता है, जो किसी ज़रूरतमंद की मदद करना चाहते हैं? अगर हाँ—तो सच मानिए, समाज अब साँस तो ले रहा है, पर ज़िंदा नहीं है। हम सड़कों पर चलते हैं, दफ़्तरों में काम करते हैं, मंदिरों में सिर झुकाते हैं, पर भीतर से सब मर चुके हैं। अब हम इंसानों की भीड़ नहीं, बस एक चलती फिरती लाशों की बारात हैं—जो इंसानियत की मिट्टी ढो रही है, दिन-रात, बेख़बर, बेजान।
हर व्यक्ति को खुद से यह सवाल पूछना होगा—अगर कल मेरे सामने कोई मर रहा हो, क्या मैं मदद करूंगा या वीडियो बनाऊंगा? अगर जवाब “मैं मदद करूंगा” है, तो फिर वक्त है अभी से शुरुआत करने का। हर छोटे से छोटे मौके पर—किसी को गिरते देख उठाने में, किसी अनजान के आँसू पोंछने में, किसी घायल को अस्पताल पहुँचाने में। यही वो छोटे कदम हैं जो समाज में बड़ा बदलाव लाते हैं। हमारे देश में कानून भी स्पष्ट कहता है —“गुड समेरिटन” यानी नेक इरादे से मदद करने वाला कभी सज़ा का हकदार नहीं होता। तो फिर डर किस बात का? डरना छोड़िए, आगे बढ़िए। दुनिया को और कानून को नहीं, अपने ज़मीर को जवाब दीजिए। बस ज़रूरत है दिल के भीतर सोई इंसानियत को जगाने की—क्योंकि जब एक इंसान हिम्मत दिखाता है, तभी इंसानियत ज़िंदा रहती है।
बालाघाट की वह युवती अब इस दुनिया में नहीं है—पर उसकी आख़िरी चीख, उसकी वह टूटी हुई पुकार “कोई तो रोक लो…” अब भी हवाओं में तैर रही है। वह आवाज़ हर उस इंसान को पुकार रही है जो उस दिन चुप रहा, जो बस देखता रहा, जो अपनी खामोशी से कातिल का साथी बन गया। वह युवती मरी, पर सिर्फ एक शरीर नहीं गिरा—गिरा तो हमारा ज़मीर, हमारी इंसानियत, हमारा साहस। क्योंकि जब समाज तमाशबीन बन जाता है, तब खंजर सिर्फ हाथ में नहीं होता, वह हर उस आँख में होता है जो चुपचाप देखती रहती है। अपराधी अकेला नहीं था—हम सब वहाँ खड़े थे, अपने-अपने कैमरों में ज़िंदगी का आख़िरी दृश्य कैद करते हुए। और उस एक पल में, हमने इंसानियत को मार दिया। अब वक्त है कैमरे नीचे रखने का और हिम्मत उठाने का। ताकि अगली बार कोई लड़की मरे नहीं, कोई माँ बिलख न जाए, बल्कि यह कहा जा सके— “इस बार किसी ने चुप नहीं देखा… इस बार किसी ने इंसान बनकर साथ दिया।”
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY