दवाएँ बनीं जीवन की उम्मीद, लेकिन कीमतें बनीं सबसे बड़ी दीवार
[एक बीमारी नहीं, पूरा परिवार लड़ता है हर महँगे इलाज से]
[रोग से रण, खर्च से हार — भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था का कठोर सच]
समय ने ऐसी करवट ली है कि अब सबसे बड़ा डर बीमारी नहीं, बल्कि उसके उपचार का भारी बोझ बन चुका है। रोग का असर केवल शरीर तक सीमित रहता है, लेकिन दवाओं और इलाज का खर्च पूरे परिवार की आर्थिक शक्ति को भीतर तक चकनाचूर कर देता है। अस्पतालों की चौखट पर अब सिर्फ स्वास्थ्य की लड़ाई नहीं लड़ी जाती; वहाँ यह भी तय होता है कि किसकी आर्थिक क्षमता जीवन को बचा पाएगी और किसका जीवन पैसों की कमी के सामने हार मान लेगा। यही वह बिंदु है, जहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप निर्वस्त्र होकर सामने खड़ा दिखाई देता है।
भारतीय स्वास्थ्य परिदृश्य आज ऐसे दो संकटों का सामना कर रहा है, जिनकी प्रकृति भले अलग हो, पर दोनों एक ही नैतिक चुनौती को उजागर करते हैं। एक तरफ कैंसर है, जो अब न उम्र की सीमाओं में बँधा है, न किसी क्षेत्र या वर्ग तक सीमित। इसकी बढ़ती रफ्तार किसी मौन महामारी जैसी प्रतीत होती है। महानगरों से दूरस्थ गाँवों तक, युवाओं से बुजुर्गों तक, इसकी पकड़ निरंतर गहरी होती जा रही है। दूसरी तरफ दुर्लभ बीमारियाँ हैं, जो सुर्खियाँ नहीं बनतीं, लेकिन असंख्य परिवारों को वर्षों तक आर्थिक, मानसिक और सामाजिक संघर्ष में जकड़े रखती हैं। रोग दोनों अलग हैं, किंतु उनकी सबसे बड़ी त्रासदी एक ही है—जीवनरक्षक दवाएँ आज भी सामान्य नागरिक की पहुँच से बहुत दूर हैं।
सरकारी नीतियों की सबसे बड़ी कसौटी संकट के समय सामने आती है, और यहीं उनका सबसे गहरा विरोधाभास भी उजागर होता है। हमारे निर्णय अक्सर बीमारी की गंभीरता नहीं, बल्कि मरीजों की संख्या देखकर लिए जाते हैं। कैंसर के बढ़ते मामलों ने कुछ जीवनरक्षक दवाओं को निःशुल्क या रियायती दर पर उपलब्ध कराने की राह अवश्य खोली है, लेकिन यह व्यवस्था अब भी सीमित है। दूसरी ओर, दुर्लभ बीमारियों में मरीज कम होने के कारण सहायता भी सीमित कर दी जाती है। मानो कम लोगों की पीड़ा का मूल्य भी कम हो, जबकि मृत्यु कभी बहुमत और अल्पमत में भेद नहीं करती।
इलाज की परीक्षा अस्पताल से बाहर शुरू होती है, जब दवाओं का खर्च वर्षों तक परिवार का पीछा नहीं छोड़ता। कैंसर का उपचार ऑपरेशन या कीमोथेरेपी तक सीमित नहीं रहता। बीमारी का पता देर से चलता है, उपचार लंबा खिंचता है और नई पीढ़ी की प्रभावी दवाएँ इतनी महँगी होती हैं कि मध्यम वर्ग कुछ महीनों में आर्थिक रूप से बिखर जाता है। दुर्लभ बीमारियों में संकट कठोर होता है। सरकारी नीति के तहत प्रति मरीज ₹50 लाख तक सहायता मिलती है। शुरुआती राहत मिलती है, लेकिन कई बीमारियों में सालाना खर्च अधिक और दवा की जरूरत लगातार रहती है। उपचार टूटते ही मरीज फिर संकट में खड़ा हो जाता है।
योजनाओं की प्रभावशीलता वहीं समाप्त होती है जहाँ उपचार का खर्च असाधारण हो जाता है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ सामान्य चिकित्सा प्रक्रियाओं में उपयोगी हैं, पर अत्यधिक महँगी व लंबी अवधि की जीवनरक्षक दवाओं का खर्च नहीं उठा पातीं। दुर्लभ बीमारियों की सहायता योजनाएँ (प्रति मरीज ₹50 लाख तक) भी उपचार की पूरी अवधि कवर नहीं कर पातीं। कैंसर में नई प्रभावी दवाएँ निःशुल्क उपलब्धता से बाहर हैं। परिणाम—विज्ञान ने इलाज खोज लिया, व्यवस्था उसे लोगों तक नहीं पहुँचा सकी।
स्वास्थ्य नीति की अगली दिशा राहत नहीं, बल्कि अधिकार पर आधारित हो। अब उपचार की अवधारणा को अनुदान से अधिकार की ओर ले जाना होगा। पहली आवश्यकता है कि कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हो। सहायता एकमुश्त अनुदान तक सीमित न रहे। बीमारी जितनी अवधि तक उपचार चाहती है, उतनी अवधि तक दवा उपलब्ध कराना व्यवस्था का दायित्व हो। निःशुल्क या अत्यंत रियायती दवा सरकारी कृपा नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार बने।
समाधान की अगली कड़ी दवाओं की खरीद और उत्पादन व्यवस्था में बदलाव से जुड़ी है। इस परिवर्तन का दूसरा आधार केंद्रीय स्तर पर दवाओं की थोक खरीद हो सकता है। सरकार यदि बड़े पैमाने पर खरीद करे, तो कीमतों पर नियंत्रण आसान होगा। इसके साथ ही आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं के घरेलू विनिर्माण को गति देनी होगी। जितनी शीघ्र इन दवाओं का उत्पादन देश में बढ़ेगा, उतनी ही जल्दी आयात पर निर्भरता घटेगी, कीमतें कम होंगी और आपूर्ति स्थिर होगी।
स्वास्थ्य व्यवस्था तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब उपचार दवा से आगे बढ़कर पूरी चिकित्सा प्रक्रिया को समेटे। उपचार का अर्थ केवल दवा उपलब्ध करा देना नहीं है। समय पर निदान और विशेषज्ञ चिकित्सा संस्थान भी उतने ही आवश्यक हैं। इसलिए कैंसर के लिए क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्रों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। दुर्लभ बीमारियों के लिए अभी 15 उत्कृष्ट केंद्र चल रहे हैं, फिर भी हर बड़े राज्य में पूर्ण सुविधाओं वाले विशेष उपचार केंद्र बनाए जाएँ, ताकि मरीज केवल कुछ महानगरों पर निर्भर न रहें।
सफल व्यवस्था के लिए संसाधनों के साथ जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन भी अनिवार्य है। महँगी दवाओं की खरीद, अनुसंधान और राष्ट्रीय नीति का दायित्व केंद्र सरकार उठाए, जबकि वितरण, उपचार की निरंतर निगरानी और अनुवर्ती देखभाल की जिम्मेदारी राज्यों के पास हो। जब उत्तरदायित्व स्पष्ट होंगे, तभी मरीज विभागों और कागजी प्रक्रियाओं में उलझने के बजाय उपचार पर ध्यान दे सकेंगे।
शासन की सबसे बड़ी परीक्षा सबसे कमजोर नागरिक के प्रति जिम्मेदारी है। यह प्रश्न केवल स्वास्थ्य नहीं, संवेदनशीलता का है। बजट सीमित हो सकता है, लेकिन प्राथमिकताएँ राजनीतिक इच्छाशक्ति तय करती हैं। इसलिए स्वास्थ्य बजट का हिस्सा कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के लिए आरक्षित हो। जब रोग सीमाएँ तोड़ देते हैं, शासन भी पुरानी सोच से बँधा नहीं रह सकता। जीवनरक्षक दवा संख्या नहीं, पीड़ा देखकर उपलब्ध कराना ही उस भारत की पहचान बनेगा, जहाँ किसी गरीब की साँस दवा की कीमत से छोटी नहीं होगी।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
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