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दूरदृष्टि का नाम विश्वेश्वरैया

 

बांधों से विश्वविद्यालय तक: दूरदृष्टि का नाम विश्वेश्वरैया

[इंजीनियर नहीं, भविष्य के शिल्पकार थे विश्वेश्वरैया] 


आधुनिक भारत की प्रगति की कहानी, जो विज्ञान और तकनीक के ताने-बाने से बुनी गई है, उसमें सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम एक प्रेरणादायी सितारे की तरह चमकता है। वे इंजीनियरिंग को केवल तकनीक तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि इसे राष्ट्रनिर्माण और सामाजिक उत्थान का पर्याय बनाया। उनका जीवन दर्शाता है कि दृढ़ संकल्प, अनुशासन और दूरदर्शिता का समन्वय न सिर्फ़ बांध व पुल बनाता है, बल्कि समाज के लिए समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त करता है। प्रत्येक 15 सितंबर को उनकी जयंती पर मनाया जाने वाला इंजीनियर्स डे केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उनकी तकनीकी प्रतिभा और सामाजिक ज़िम्मेदारी की विरासत को नमन करने का अवसर है।

1861 में कर्नाटक के मुदेनहल्ली में एक साधारण परिवार में जन्मे विश्वेश्वरैया ने पुणे के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की। उनकी असाधारण प्रतिभा ने उन्हें 1884 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी के लोक निर्माण विभाग में पहली नौकरी दिलाई, जहाँ से शुरू हुआ वह ऐतिहासिक सफर, जिसने भारतीय इंजीनियरिंग को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया। उन्होंने इंजीनियरिंग को नैतिकता और राष्ट्रभक्ति के साथ जोड़कर यह सिद्ध किया कि एक सच्चा इंजीनियर केवल संरचनाएँ नहीं, बल्कि समाज का टिकाऊ भविष्य रचता है।

उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि है मैसूर का कृष्णराज सागर (केआरएस) बांध। 1912 से 1932 के बीच निर्मित इस बांध ने कावेरी नदी के जल को नियंत्रित कर कर्नाटक में सिंचाई और बिजली उत्पादन को नया आयाम दिया। उनके द्वारा डिज़ाइन किए गए स्वचालित फ्लडगेट्स उस युग की अग्रणी तकनीक थे, जो आज भी विश्व भर के बांधों में प्रासंगिक हैं। इस बांध ने लाखों किसानों को सूखे से राहत दी और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाया।

विश्वेश्वरैया की दूरदृष्टि केवल बांधों तक सीमित नहीं थी। 1908 में हैदराबाद में मूसी नदी की बाढ़ से तबाह शहर को बचाने के लिए उन्होंने अभिनव जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण प्रणाली विकसित की, जो आज भी कारगर है। पुणे के खडकवासला बांध की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण में भी उनकी भूमिका अनुकरणीय रही। उनकी हर परियोजना तकनीकी उत्कृष्टता के साथ-साथ सामाजिक चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम थी। विश्वेश्वरैया का जीवन हमें सिखाता है कि इंजीनियरिंग केवल संरचनाओं का निर्माण नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज का सृजन है।

1912 में मैसूर रियासत के दीवान बनने पर सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने प्रशासन और इंजीनियरिंग का ऐसा अभूतपूर्व समन्वय स्थापित किया, जिसने मैसूर को प्रगति के शिखर पर पहुँचाया। उनके कुशल नेतृत्व में मैसूर ने औद्योगिक, शैक्षिक और आर्थिक क्षेत्रों में नई ऊँचाइयाँ छुईं। भद्रावती में स्थापित विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील प्लांट आज भी भारत के इस्पात उद्योग की नींव है, जबकि मैसूर विश्वविद्यालय और स्टेट बैंक ऑफ मैसूर जैसे संस्थानों ने शिक्षा और अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाया। उनकी दूरदर्शी नीतियों ने मैसूर को न केवल भारत का अग्रणी राज्य बनाया, बल्कि आत्मनिर्भरता का प्रतीक स्थापित किया।

विश्वेश्वरैया का जीवन अनुशासन और समय प्रबंधन का जीवंत दृष्टांत था। वे अपने दिन के प्रत्येक क्षण का हिसाब रखते थे, समय की पाबंदी को सफलता का मूलमंत्र मानते हुए। उनकी यह आदत उनके कार्यों की सटीकता और दक्षता में साफ़ झलकती थी। उनका कथन, “समय और अनुशासन ही सफलता की कुंजी हैं,” आज भी हर इंजीनियर के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

उनका दृढ़ विश्वास था कि इंजीनियरिंग का उद्देश्य केवल भौतिक संरचनाएँ खड़ी करना नहीं, बल्कि समाज की ज्वलंत समस्याओं का समाधान करना है। उन्होंने ग्रामीण भारत में सिंचाई और जल आपूर्ति को प्राथमिकता दी, क्योंकि वे कृषि को देश की रीढ़ मानते थे। उनकी यह दूरदृष्टि आज के स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया और सतत विकास जैसे अभियानों में प्रतिबिंबित होती है। वे शिक्षा के उतने ही प्रबल समर्थक थे, जितने बुनियादी ढांचे के। उनका कहना था, “ज्ञान और अनुशासन ही देश को विश्वगुरु बना सकते हैं।”

आज, जब भारत 5जी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष अनुसंधान में विश्व मंच पर अपनी पहचान बना रहा है, विश्वेश्वरैया का योगदान हमें याद दिलाता है कि तकनीक का आधार नैतिकता और सामाजिक ज़िम्मेदारी होना चाहिए। 15 सितंबर को मनाया जाने वाला इंजीनियर्स डे हमें उनके आदर्शों को आत्मसात करने और तकनीकी कौशल को पर्यावरणीय स्थिरता व सामाजिक समावेश के साथ जोड़ने का अवसर देता है।

1955 में भारत रत्न से सम्मानित विश्वेश्वरैया का सच्चा सम्मान तभी संभव है, जब हम उनके दिखाए मार्ग पर चलें। जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और संसाधनों की कमी जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान तकनीक और नवाचार में निहित है। इंजीनियर्स डे हमें यह सिखाता है कि इंजीनियरिंग केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक मिशन है—एक ऐसे भारत के निर्माण का मिशन, जो तकनीकी, सामाजिक और आर्थिक रूप से समृद्ध हो।

विश्वेश्वरैया ने अपने जीवन का हर पल इस मिशन को समर्पित किया। यह दिन हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है—क्या हम तकनीक को केवल सुविधा का साधन मान रहे हैं, या इसे समाज के उत्थान का हथियार बना रहे हैं? इस इंजीनियर्स डे पर संकल्प लें कि हम उनके आदर्शों को अपनाएँगे और भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में अग्रसर होंगे।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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