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कट-एंड-कवर — यह सिर्फ़ टनल नहीं, शक्ति का स्वर्ण-मार्ग है

 


कट-एंड-कवर  यह सिर्फ़ टनल नहींशक्ति का स्वर्ण-मार्ग है

[भारत की नई रणनीति: हर मौसम, हर क्षेत्र, हर लक्ष्य]

[हिमालय की ठंडी हवा में भी जलता भारत का आत्मबल] 


·प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)


लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर, जहाँ हवा में ऑक्सीजन कम और आसमान में खतरे की आहट हर पल मंडराती है, 8 दिसंबर का दिन भारत की सामरिक यात्रा में एक मील का पत्थर बनकर दर्ज हुआ, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ “रणनीतिक स्वतंत्रता का दूसरा चरण” के रूप में याद करेंगी। इस दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने श्योक नदी के ऊपर बनी 920 मीटर लंबी ‘कट-एंड-कवर’ टनल को राष्ट्र को समर्पित करते हुए स्पष्ट कहा— “अब न भूस्खलन हमें रोकेगा, न हिमस्खलन हमारी रफ़्तार तोड़ेगा।” यह टनल सिर्फ़ एक इंजीनियरिंग उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की बदलती सीमा-नीति का एक साहसिक ऐलान है— अब हमारी सेना मौसम के रहम पर नहीं, अपनी तकनीक और संकल्प की शक्ति से संचालित होगी।

श्योक टनल अकेली नहीं आई। उसके साथ 125 रणनीतिक परियोजनाएँ राष्ट्र को सौंपी गईं – 28 नई सड़कें, 93 पुल और 4 अन्य महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर। ये सात राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में फैली हैं—लद्दाख से अरुणाचल तक, सिक्किम से मिजोरम तक। सिर्फ़ लद्दाख में ही 8 सड़कें और 28 पुलों का निर्माण पूरा हुआ है। इसका मतलब है कि दौलत बेग ओल्डी से लेकर देमचोक, न्योमा से हनले और हर फॉरवर्ड पोस्ट तक अब 365 दिन निर्बाध पहुँच संभव होगी। जो सप्लाई पहले सिर्फ़ मई से अक्टूबर तक पहुँच पाती थी, वह अब जनवरी की माइनस 40 डिग्री ठंड में भी टैंक, तोप, ईंधन और राशन के साथ लगातार आगे बढ़ सकेगी। यह नई क्षमता भारत की सीमाओं पर सिर्फ़ उपस्थिति नहीं बढ़ाती—यह हमारी सामरिक स्वतंत्रता को एक नए, निर्णायक युग में ले जाती है।

ये आँकड़े सिर्फ़ कंक्रीट और स्टील के नहीं, नए भारत के आत्मविश्वास और संकल्प के प्रतीक हैं। 2014 से अब तक बीआरओ (बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन) ने 33,000 किमी से अधिक समतलीय सड़कें बनाई हैं—यानी धरती की परिधि के लगभग 80% के बराबर एक अभियान्त्रिक चमत्कार। लद्दाख–अक्साई चिन सेक्टर में जहाँ 2014 में मात्र 190 किमी ऑल-वेदर कनेक्टिविटी थी, आज यह बढ़कर 1,400 किमी से अधिक की अभेद्य जीवनरेखा बन चुकी है। ज़ोजिला, अटल टनल, श्योक टनल और आने वाली निम्मू–पदम–दारचा सड़क—ये सभी मिलकर उस रणनीतिक कवच का निर्माण कर रहे हैं, जिसके सामने चीन की कथित स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” के मुकाबले भारत का “डायमंड नेकलेस ऑफ स्टील” तेजस्वी होकर उभर रहा है।

रक्षा मंत्री ने जिस संयम और साहस का ज़िक्र किया, उसका जीवंत उदाहरण ऑपरेशन सिंदूर में देखने को मिला। पहलगाम हमले के बाद जब पूरा देश आक्रोश से भरा था, तब भारतीय सेना ने वह किया जो एक परिपक्व और आत्मविश्वासी शक्ति करती है—सटीक, सीमित और लक्ष्यभेदी कार्रवाई। यह संयम किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि उस नई शक्ति का प्रमाण था जो अब हमारे पास है। मज़बूत लॉजिस्टिक्स, चौबीसों घंटे चलने वाली सप्लाई लाइन और हर मौसम में सक्षम इंफ्रास्ट्रक्चर ने हमें वह क्षमता दी कि हम चुन-चुन कर लक्ष्य साधें और फिर शांति से वापस लौट आएँ। यही है नई भारतीय सेना—जो क्रोध में भी विवेक रखती है, और विवेक से ही विजय सुनिश्चित करती है।

श्योक टनल का एक महत्व ऐसा भी है जिसका ज़िक्र सार्वजनिक मंचों पर कम ही होता है। यह सुरंग पार्टापुर से दौलत बेग ओल्डी तक की दूरी को चौदह किलोमीटर कम कर देती है, और सबसे बड़ी बात—यह मार्ग संपूर्ण रूप से हिमस्खलन क्षेत्र से बाहर है। इसका अर्थ साफ़ है - अब सीमाओं पर कार्रवाई मौसम की दया पर नहीं, भारत की इच्छा पर निर्भर करेगी। और यही वह बदलाव है जो चीन को हर क्षण याद दिलाएगा कि किसी भी भूल का उत्तर अब तुरंत, सटीक और निर्बाध मिलेगा।

ये परियोजनाएँ केवल सैन्य शक्ति का विस्तार नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत भी हैं। लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र के न्योमा में जहाँ पहले वर्ष में मात्र चार महीने विद्यालय खुलते थे, अब बच्चे दिसंबर की कठोर ठंड में भी पढ़ाई जारी रख सकेंगे। हनले के दूरस्थ बौद्ध गाँवों तक अब एम्बुलेंस और स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँच सकेंगी। अरुणाचल के तूतिंग और मेचुका जैसे सीमांत क्षेत्रों तक जब सड़कें पहुँच गईं, तो वहाँ के बच्चों के सपनों में भी नई रोशनी आ गई—अब वे भी आईआईटी, एम्स और बड़े संस्थानों का लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं। सीमा की सुरक्षा और सीमांत का विकास—आज ये दोनों किसी अलग दिशा की यात्राएँ नहीं; एक ही राष्ट्र-धर्म के दो अविभाज्य रूप बन चुके हैं।

जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि “सीमा सड़क संगठन राष्ट्र–निर्माण का सच्चा सैनिक है”, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि धरातल की कठोर सच्चाई थी। ये वही अदम्य वीर हैं जो 19,000  फीट की प्राण–लेवा ऊँचाई पर भी बुलडोज़र और ड्रिल मशीनें चलाकर उन स्थानों को मार्ग देते हैं जहाँ सामान्य व्यक्ति खड़े रहने भर से भी थक जाए। चलाते हैं। इनके हाथों में भले ही औज़ार हों, पर दिलों में जलती है देशभक्ति, समर्पण और कर्तव्य की ऐसी ज्वाला, जो पर्वतों की बर्फ़ को भी पिघला दे। आज जब दुनिया “धुंध–छाया युद्ध (ग्रे ज़ोन वॉरफेयर)” और “टुकड़ा–टुकड़ा अतिक्रमण (सैलामी स्लाइसिंग)” जैसी चालों की बात करती है, भारत ने जवाब में “कंक्रीट एंड कनेक्टिविटी” की नीति अपना ली है।

श्योक सुरंग का उद्घाटन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था,  बल्कि भारत के नए आत्मबल और अटल संकल्प का उद्घोष था— “हम मौसम की क्रूरता से नहीं घबराते, हम मौसम को अपनी सैन्य इच्छा के अनुसार पराजित करते हैं। हम दुश्मन की मंशाओं से भयभीत नहीं होते, हम उसकी हर चाल को अपनी दृढ़ता से ध्वस्त कर देते हैं।” लद्दाख की इन बर्फ़ से ढकी पर्वत–शृंखलाओं में आज जो इस्पात और कंक्रीट डाला गया है, वही कल भारत की अजेयता, तत्परता और अटूट सुरक्षा–ढाल का प्रमाण बनेगा। अब न भूस्खलन का भय, न हिमस्खलन की बाधा—बस भारत माता की जय और भारतीय सैनिक की निश्‍चय–पूर्ण विजय।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

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