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भारत एक संतुलनकर्ता शक्ति

 

न तो अनुयायीन आक्रामक—भारत एक संतुलनकर्ता शक्ति

[सभ्यता से सामर्थ्य तक: भारत और नई विश्व-व्यवस्था]

[भारत का वैश्विक उदय: बदलती विश्व-व्यवस्था में नई महाशक्ति]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


जब विश्व की राजनीतिक धुरी बदल रही है और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नए अध्याय आकार ले रहे हैं, तब भारत की आवाज़ केवल सुनी ही नहीं जाती, बल्कि वह वैश्विक दिशा को भी प्रभावित करती है। प्राचीन सभ्यतागत विरासत से ऊर्जा लेकर आधुनिक तकनीकी युग में नेतृत्व करता हुआ भारत आज 21वीं सदी के वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त पहचान स्थापित कर चुका है। वर्ष 2023 में जी20 शिखर सम्मेलन की सफल मेजबानी से लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता की निरंतर दृढ़ मांग तक, भारत का प्रभाव निरंतर विस्तार पा रहा है। यह उभार किसी एक राष्ट्र की उपलब्धि भर नहीं, बल्कि विकासशील विश्व की सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक है, जहां भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ वैश्विक शांति, संतुलन और समृद्धि की ठोस आधारशिला रखती है।

भारत की विदेश नीति की आधारशिला ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के विचार पर टिकी है, जो प्राचीन भारतीय दर्शन से निकलकर आज आधुनिक कूटनीति की दिशा तय कर रहा है। यह सिद्धांत केवल विचारात्मक घोषणा नहीं, बल्कि व्यवहारिक नीति के रूप में भारत के कार्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के तहत 95 से अधिक देशों तक वैक्सीन पहुँचाकर भारत ने स्वयं को विकासशील विश्व का भरोसेमंद और संवेदनशील साझेदार सिद्ध किया। जलवायु संकट के बीच भारत की प्रतिबद्धता ‘पंचामृत’ लक्ष्यों में झलकती है, जिनमें 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन में कटौती और हरित विकास की स्पष्ट रूपरेखा शामिल है। पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत ने अपने दायित्वों का पालन करते हुए विकासशील देशों के लिए न्यायपूर्ण वित्तीय सहयोग की माँग उठाई, जिससे उसकी नैतिक नेतृत्व क्षमता सामने आई। यह जिम्मेदारी पर्यावरण तक सीमित नहीं रही; संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भारत की अग्रणी भूमिका, अफ्रीका से मध्य-पूर्व तक तैनात उसके सैनिकों के माध्यम से, वैश्विक स्थिरता को सुदृढ़ करती है। यह सब केवल परोपकार नहीं, बल्कि दूरदर्शी रणनीति है, जो भारत को वैश्विक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था में सशक्त स्थान दिलाती है।

दुनिया में भारत का बढ़ता प्रभाव आर्थिक मोर्चे पर सबसे स्पष्ट है। 2025 में भारत की जीडीपी लगभग 4.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है, जो उसे विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाती है, तथा 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से अग्रसर है। यह प्रभाव विदेश नीति के माध्यम से बढ़ा है, जैसे 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में साझेदारियां। क्वाड —भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का गठबंधन, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की आक्रामकता के खिलाफ एक दीवार की तरह खड़ा है। भारत ने यहां न केवल सैन्य अभ्यास किए, बल्कि तकनीकी सहयोग से आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत किया। इसी तरह, ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) में भारत की भूमिका विकासशील देशों की आवाज़ को मजबूत करती है, जहां न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग हो रही है। लेकिन भारत की नीति अलग हटकर इसलिए है क्योंकि वह किसी एक ब्लॉक में बंधा नहीं; वह 'रणनीतिक स्वायत्तता' का पालन करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत ने तटस्थता अपनाई, लेकिन मानवीय सहायता प्रदान की, जिससे उसका प्रभाव दोनों पक्षों में बढ़ा। यह नीति न केवल राष्ट्रीय हितों की रक्षा करती है—जैसे रूस से सस्ता तेल आयात—बल्कि वैश्विक संतुलन बनाए रखती है।

अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा में भारत की प्रतिबद्धताएं और भूमिका भी उल्लेखनीय हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करते हुए भारत ने जी4 (भारत, जापान, जर्मनी, ब्राजील) का नेतृत्व किया, जो पुरानी व्यवस्था को चुनौती दे रही है। 2025 में, जब विश्व आतंकवाद से जूझ रहा है, भारत की 'जीरो टॉलरेंस' नीति—जैसे मुंबई हमलों के बाद की कार्रवाई—वैश्विक मानक बन गई है। भारत ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में पाकिस्तान और चीन के साथ बैठकर भी सीमा सुरक्षा पर अपनी बात रखी। लेकिन भारत का प्रभाव सॉफ्ट पावर से भी आता है—योग को अंतर्राष्ट्रीय दिवस का दर्जा दिलाना, बॉलीवुड की वैश्विक पहुंच और डिजिटल इंडिया की क्रांति। उबर और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म्स में भारतीय इंजीनियर्स का योगदान भारत को तकनीकी सुपरपावर बनाता है। 2025 में, भारत की स्पेस प्रोग्राम—चंद्रयान-3 की सफलता के बाद आर्टेमिस समझौते में शामिल होना—वैश्विक सहयोग का प्रतीक है। यह सब मिलकर भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में पेश करता है जो न केवल प्रतिक्रिया देता है, बल्कि एजेंडा सेट करता है।

हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं। चीन के साथ सीमा विवाद, पाकिस्तान से आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव भारत की नीति को परीक्षा में डालते हैं। लेकिन भारत की प्रतिबद्धता 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति में झलकती है, जहां बांग्लादेश और नेपाल के साथ जल समझौते और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स हो रहे हैं। अफगानिस्तान में तालिबान के बाद भी भारत ने मानवीय सहायता जारी रखी, जो उसकी दीर्घकालिक दृष्टि दिखाती है। वैश्विक व्यापार में भारत की भूमिका भी बढ़ी है—आरसीईपी से बाहर रहकर भी इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क में शामिल होना। यह नीति आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है, जहां 'मेक इन इंडिया' वैश्विक निवेश आकर्षित कर रहा है। 2025 तक, भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था—यूपीआई की वैश्विक मान्यता—विकासशील देशों के लिए मॉडल बन गई है। लेकिन क्या यह प्रभाव स्थायी है? हां, क्योंकि भारत की नीति समावेशी है—महिलाओं की सशक्तिकरण से लेकर अफ्रीकी संघ को जी20 में शामिल कराना, जो वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को मजबूत करता है।

भारत का बढ़ता प्रभाव सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि वैश्विक मानसिकता में बदलाव ला रहा है। जहां पश्चिमी शक्तियां द्विध्रुवीय दुनिया चाहती हैं, भारत बहुपक्षीयता की वकालत करता है। उसकी प्रतिबद्धताएं—शांति, विकास और न्याय, न केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित हैं, बल्कि पूरी मानवता के लिए हैं। 2025 में, जब विश्व अनिश्चितताओं से घिरा है, भारत की भूमिका एक प्रकाश स्तंभ की तरह है, जो अंधेरे में रास्ता दिखाता है। यह अलग हटकर इसलिए है क्योंकि भारत न तो अनुयायी है और न ही आक्रामक; वह एक संतुलनकर्ता है, जो अपनी प्राचीन बुद्धिमत्ता से आधुनिक चुनौतियों का सामना करता है। आने वाले वर्षों में, भारत का प्रभाव और बढ़ेगा, और दुनिया इसे न केवल स्वीकार करेगी, बल्कि उससे प्रेरणा लेगी। यह भारत की कहानी है—एक उभरते हुए महाशक्ति की, जो विश्व को एक बेहतर जगह बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

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बी-87, महावीर नगर, बड़वानी (मप्र) – 451 551

संपर्क: 94251 23883

ईमेल: rtirkjain@gmail.com


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