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Dr. Srimati Tara Singh
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भाई दूज

 

प्रसंगवश – 23 अक्टूबर: भाई दूज


भाई दूज: प्यारसुरक्षा और विश्वास की धारा

[भाई दूज: समय और दूरी से भी परे रिश्तों का पर्व]

[भाई दूज: जहाँ प्यार, समर्पण और खुशी एक साथ खिलते हैं]



दीपावली की चकाचौंध अभी मन में ताज़ा है, मिठाइयों की मिठास होठों पर बसी है, और घरों में खुशियों की गूँज अब भी गुनगुना रही है। इसी रंग-बिरंगे माहौल में आता है भाई-बहन के अटूट प्रेम का पर्व – भाई दूज। यह महज़ एक त्योहार नहीं, बल्कि वह पवित्र बंधन है, जो बचपन की शरारतों, छोटी-मोटी नोकझोंक और प्यार भरी तकरार को एक गहरे विश्वास और स्नेह के रिश्ते में पिरो देता है। यह वह पल है जब बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है, उसकी लंबी उम्र और समृद्धि की कामना करती है, और भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है। यह क्षण केवल रस्म नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाली एक अनमोल यात्रा है, जो रिश्तों की नींव को और भी अटल बनाती है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व दीपावली के दो दिन बाद आता है। यह वह समय है जब परिवार फिर से एक छत के नीचे इकट्ठा होता है, और भाई-बहन का रिश्ता प्रेम, विश्वास और समर्पण के धागों से और मज़बूत होता है। पौराणिक कथाएँ इस दिन को और भी रंगीन बनाती हैं। एक कथा के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुनाजी के बुलावे पर उनके घर गए। यमुनाजी ने उनका तिलक कर, स्वादिष्ट भोजन से स्वागत किया। प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन से तिलक करवाएगा, उसे दीर्घायु और सुख-समृद्धि प्राप्त होगी। एक अन्य कथा में भगवान श्रीकृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा का ज़िक्र है, जहाँ नरकासुर वध के बाद श्रीकृष्ण ने सुभद्रा से तिलक करवाया। ये कथाएँ बताती हैं कि भाई-बहन का रिश्ता केवल रक्त का नहीं, बल्कि स्नेह, सम्मान और ज़िम्मेदारी का एक अनमोल गठबंधन है।

भाई दूज की खूबसूरती उसकी सादगी और भावनात्मक गहराई में छिपी है। सुबह-सुबह बहनें स्नान कर, पूजा की थाली सजाती हैं, जिसमें रोली, चंदन, अक्षत, फूल और मिठाइयाँ होती हैं। इस थाली के साथ वे भगवान गणेश और अन्य देवताओं की पूजा करती हैं, फिर भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसकी लंबी उम्र और खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। बदले में, भाई अपनी बहन को उपहार देता है – कभी मिठाई, कभी कपड़े, तो कभी उसकी पसंद की कोई खास चीज़। यह आदान-प्रदान केवल भौतिक वस्तुओं का नहीं, बल्कि भावनाओं का एक हृदयस्पर्शी लेन-देन है। कई घरों में बहनें अपने भाई के लिए विशेष व्यंजन बनाती हैं, जैसे पूरन पोली, खीर या हलवा, जो प्यार का स्वाद लिए होते हैं। कुछ समुदायों में बहनें उपवास भी रखती हैं, जो उनके समर्पण को और गहरा करता है। यह सब केवल रस्में नहीं, बल्कि उस अनमोल प्रेम का प्रतीक हैं, जो भाई-बहन के बीच जीवन भर साथ चलता है।

भाई दूज का पर्व, नाम और रीति-रिवाजों में भले ही क्षेत्रों के साथ बदल जाए, मगर इसका हृदयस्पर्शी भाव हर जगह एक-सा है। उत्तर भारत में इसे ‘भैया दूज’, महाराष्ट्र और गोवा में ‘भाऊ बीज’, तो बंगाल में ‘भाई फोटा’ कहते हैं। हर नाम के पीछे वही अनमोल प्रेम छिपा है, जो भाई-बहन के रिश्ते को अनूठा बनाता है। यह रिश्ता बचपन की शरारतों, एक-दूसरे की टांग खींचने की मस्ती और ज़रूरत पड़ने पर ढाल बनकर खड़े होने का अनमोल मिश्रण है। यह बंधन समय और दूरी की हर दीवार को पार कर, प्रेम और विश्वास के रंगों से चमकता है।

भाई दूज का महत्व केवल धार्मिक या परंपरागत नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। यह पर्व हमें परिवार की नींव और रिश्तों की गर्माहट का एहसास कराता है। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जहाँ रिश्तों के लिए समय निकालना चुनौती बन गया है, भाई दूज हमें ठहरकर अपनों के साथ बिताए पलों की कीमत समझाता है। यह बच्चों को परिवार के मूल्यों और ज़िम्मेदारियों का पाठ पढ़ाता है, और बड़ों को रिश्तों की मज़बूती को संजोने की प्रेरणा देता है। यह पर्व बताता है कि भाई-बहन का रिश्ता महज़ तिलक या उपहारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति अटूट समर्थन और विश्वास का प्रतीक है।

आधुनिक युग में भाई दूज ने समय के साथ कदम मिलाए हैं, मगर इसकी आत्मा वही है। अब बहनें भाइयों को डिजिटल गिफ्ट कार्ड्स, गैजेट्स या ट्रेंडी उपहार देती हैं, और भाई भी अपनी बहन की पसंद को ध्यान में रखकर कुछ खास चुनते हैं। सोशल मीडिया और वीडियो कॉल ने उन भाई-बहनों को भी जोड़ा है, जो दूरी के कारण इस दिन साथ नहीं हो पाते। यह बदलाव दर्शाता है कि भाई दूज आधुनिकता के रंग में ढलकर भी अपने मूल भाव को थामे हुए है। चाहे उपहार पारंपरिक हों या आधुनिक, इस पर्व का संदेश वही है – भाई-बहन का प्रेम अटूट और अनमोल है।

भाई दूज केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं, बल्कि यह समाज में प्रेम और एकता का पैगाम भी फैलाता है। कई जगहों पर इस दिन सामुदायिक आयोजन और मेले लगते हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज में सौहार्द और भाईचारे की भावना को बल देते हैं। यह पर्व बच्चों को उनकी ज़िम्मेदारियों का बोध कराता है और बड़ों को परिवार के मूल्यों को जीने की प्रेरणा देता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन की असली ताकत हमारे रिश्तों में बसती है, और परिवार वह आश्रय है, जो हर तूफान में हमें संबल देता है।

भाई दूज का हर पल प्रेम और विश्वास का गहरा सबक देता है। यह वह दिन है जब बहन अपने भाई के लिए दुआएँ माँगती है, और भाई अपनी बहन की खुशी और सुरक्षा का वचन देता है। इस दिन बचपन की यादें, साझा किए हुए लम्हे, और एक-दूसरे के लिए किए गए छोटे-बड़े त्याग फिर से जीवंत हो उठते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन की असली खूबसूरती रिश्तों की मिठास और अपनों के साथ में है।

इस भाई दूज, हर बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसकी लंबी उम्र और सुख की कामना करे, और हर भाई अपनी बहन के लिए अटल सहारा बने। यह दिन हमें रिश्तों को संजोने, प्यार को ज़ाहिर करने और परिवार की गर्माहट को गले लगाने का मौका देता है। भाई दूज को सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक ऐसे अवसर के रूप में मनाएँ, जो हमें हमारे रिश्तों की गहराई और परिवार की ताकत का एहसास कराता है। यह स्नेह, यह विश्वास, यह बंधन हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहे, और हमारे जीवन को प्रेम और एकता के रंगों से सराबोर कर दे।


प्रोआरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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