बेलेम की लकीर — जो अब इतिहास से नहीं मिटेगी
[जब भारत ठान लेता है, तो हवाएँ भी दिशा बदल लेती हैं]
[“हम माँगें नहीं—हिसाब लेंगे”: बेलेम में भारत की नई नीति रेखा]
जब बेलेम की उमस भरी हवा में भारत की आवाज़ गूंजी, तो लगा जैसे हिमालय की ठंडी साँसें अमेज़न के जंगलों में उतर आई हों। कोई नरम लहजा नहीं, कोई समझौता नहीं। सिर्फ़ एक साफ़ और अडिग सच—“अब और नहीं।” COP30 के पहले ही दिन उद्घाटन सत्र में BASIC (ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, भारत, चीन) और LMDC (लाइक माइंडिड डिवेलपिंग कंट्रीज़) समूहों की ओर से भारत ने जो कहा, वह कोई बयान नहीं था; वह एक स्पष्ट संदेश था। विकसित देशों के सामने दो रास्ते रख दिए गए— या तो अपने कानूनी दायित्व पूरे करो, या इतिहास के सामने जवाब दो। यह वह पल था जब जलवायु वार्ताओं की पुरानी भाषा हमेशा के लिए बदल गई।
हमने पेरिस समझौते की धारा 9.1 को सामने रखकर याद दिलाया कि जलवायु वित्त कोई दया नहीं, कानूनी जिम्मेदारी है। कोपेनहेगन में वादा हुआ था कि 2020 से हर साल सौ अरब डॉलर आएँगे। फिर 2023 तक टाला गया। आज 2025 में भी वह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। OECD (ऑर्गनाइज़ेशन फॉर इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट) की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि 2022 में जो राशि आई, उसका बड़ा हिस्सा कर्ज़ था, अनुदान नहीं। कर्ज़ से हम बाँध नहीं बना सकते, तटीय दीवारें नहीं खड़ी कर सकते, सूखे से लड़ नहीं सकते। अनुकूलन के लिए UNEP (यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम) की रिपोर्ट कहती है कि हमें हर साल कम से कम तीन सौ अरब डॉलर से ज़्यादा अनुदान चाहिए। अभी मिल रहे हैं मुश्किल से तीस अरब। यह अंतर सिर्फ़ आँकड़ों का नहीं, लोगों की ज़िंदगियों का है—गुजरात के मछुआरों का, असम की चाय बग़ानों का, केरल के किसानों का।
तकनीक पर हमने साफ़ कहा—हरित तकनीक सबकी होनी चाहिए, किसी की निजी संपत्ति नहीं। ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी, कार्बन कैप्चर जैसी तकनीकों के ज़्यादातर पेटेंट कुछ ही देशों के पास हैं। IRENA (इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी) की रिपोर्ट बताती है कि इनकी वजह से हमारी लागत तीस-चालीस प्रतिशत ज़्यादा पड़ती है। जब तक ये तकनीकें सस्ती और सुलभ नहीं होंगी, नेट-जीरो का सपना अधूरा रहेगा। हमने कहा—TRIPS (ट्रेड-रिलेटेड ऐस्पेक्ट्स ऑफ़ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स) में छूट दो, अनिवार्य लाइसेंसिंग की व्यवस्था करो। यह माँग नहीं, न्याय की बात है। क्योंकि जिस दिन राजस्थान के गाँव में सस्ता सौर स्टोरेज पहुँचेगा, उसी दिन असली बदलाव शुरू होगा।
व्यापारिक उपायों पर हमने सबसे सख़्त लहजा अपनाया। यूरोपीय संघ का CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म) अगले साल से हमारे इस्पात और सीमेंट पर भारी शुल्क लगाएगा। यह WTO के नियमों के खिलाफ़ है, UNFCCC (यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) की भावना के खिलाफ़ है। हमने कहा—जलवायु के नाम पर व्यापार में भेदभाव बर्दाश्त नहीं होगा। अगर एकतरफ़ा कदम उठाओगे, तो हम भी जवाब देंगे। यह धमकी नहीं, आत्मसम्मान की बात है। ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, चीन—सबने एक स्वर में यही कहा। अब यह मुद्दा COP (कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़) के एजेंडे से बाहर नहीं रहेगा।
हमने याद दिलाया कि 1.5 डिग्री का लक्ष्य अब हाथ से फिसलता जा रहा है। IPCC ( इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज) और UNEP (यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंट प्रोग्राम) की रिपोर्टें साफ़ कहती हैं कि मौजूदा रफ्तार से हम ढाई डिग्री से ऊपर जा रहे हैं। विकसित देशों ने 2030 तक उत्सर्जन आधा करने का वादा किया था; अभी तक चौथाई भी नहीं हुआ। हमने कहा—पहले अपना हिसाब पूरा करो। तुमने डेढ़ सदी तक कोयला जलाया, कारख़ाने चलाए, अब हमें विकास का हक़ दो। नेट-जीरो तुम्हारी ज़िम्मेदारी है, हमारी मजबूरी नहीं। हम अभी भी सड़कें बना रहे हैं, अस्पताल खोल रहे हैं, गाँवों तक बिजली पहुँचा रहे हैं। इसके लिए हमें साफ़ ऊर्जा चाहिए, महँगा कर्ज़ नहीं।
बेलेम में हमने जो लकीर खींची, वह इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो चुकी है—अब वह मिटेगी नहीं। नया जलवायु वित्त लक्ष्य अनुदान-आधारित हो, अनुकूलन के लिए हर साल कम से कम डेढ़ ट्रिलियन डॉलर सुनिश्चित हों, तकनीक सबके लिए खुले तौर पर साझा की जाए, और एकतरफ़ा व्यापारिक रोकें ख़त्म हों—अब यही हमारी शर्तें हैं। ब्राज़ील की अध्यक्षता इन बिंदुओं पर काम कर रही है, पर पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचा।
यह आवाज़ सिर्फ़ कूटनीति की नहीं—यह उन सत्तर-अस्सी करोड़ लोगों की पुकार है जो अब भी दो डॉलर से कम पर जीते हैं; उन माँओं की आह है जिनके बच्चे सूखे से भूखे सो जाते हैं; उन नौजवानों की चेतावनी है जिन्हें विरासत में आग और बाढ़ मिली है। बेलेम में हमने कोई भाषण नहीं दिया था—एक वादा किया था। कि अब हम चुप नहीं रहेंगे। अब हम सिर्फ़ माँगेंगे नहीं—हिसाब लेंगे। हर वादे का। हर दिन का। हर साँस का।
विकसित दुनिया के पास अब आखिरी मौका है। न्याय दो, या इतिहास के सामने सिर झुकाकर खड़े हो। चुनाव तुम्हारा है। लेकिन याद रखो—भारत अब सिर्फ़ बोलता नहीं, करता है। और जब भारत कुछ करने का फैसला लेता है, तो हवाएँ भी दिशा बदल लेती हैं। बेलेम की यह गूंज अब रुकने वाली नहीं। यह हिमालय से अमेज़न तक नहीं, समूचे विश्व तक फैलकर एक नए युग की शुरुआत करेगी। क्योंकि अब वक्त आ गया है अपनी धरती वापस लेने का। और हम—वह धरती वापस लेंगे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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