Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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बेटियों के सम्मान की गूँज

 

बेटियों के सम्मान की गूँज: आदिवासी समाज में नई सुबह

[धरती और धरोहर पर बेटियों का हक: एक न्यायिक क्रांति]



एक बेटी की पुकार, सदियों पुरानी परंपराओं की दीवारों को तोड़ने की हिम्मत, और एक ऐतिहासिक फैसले की गूँज—यह कहानी छत्तीसगढ़ के सूरजपुर के मानी गाँव से शुरू होती है, लेकिन इसकी लहरें भारत के हर आदिवासी समुदाय तक पहुँच रही हैं। धइया, एक साधारण आदिवासी महिला, जिसकी आवाज़ ने न सिर्फ़ परिवार की चुप्पी तोड़ी, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत को भी झकझोर दिया। सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला, जो कागज़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर उस बेटी के दिल में उकेरा गया, जिसे कभी उसके हक से वंचित किया गया। यह फैसला सिर्फ़ कानूनी जीत नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का प्रतीक है, जो आदिवासी बेटियों के लिए नई सुबह का वादा करता है। मगर सवाल अब भी बाकी है, क्या यह फैसला रूढ़ियों के तूफान में खड़ा रह पाएगा, या यह एक नई जंग को जन्म देगा?

धइया की कहानी तब शुरू हुई, जब उनके पिता भज्जू गौड़ ने अपनी ज़मीन अपने पाँच बेटों में बाँट दी, और परंपराओं के नाम पर अपनी इकलौती बेटी को खाली हाथ छोड़ दिया। उनके बेटे रामचरण ने माँ के हक के लिए आवाज़ बुलंद की। वे कहते हैं, 1993 में हमने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, मगर हमें बताया गया कि आदिवासी समाज में बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता। परंपराओं की आड़ में हमारी आवाज़ दबाने की कोशिश हुई। सूरजपुर की स्थानीय अदालत और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी यही रुख अपनाया। फिर भी, धइया का परिवार डटा रहा। 32 साल की लंबी लड़ाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जो न सिर्फ़ धइया के हक को मान्यता देता है, बल्कि पूरे आदिवासी समाज को एक नई दिशा दिखाता है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लिंग के आधार पर संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। कोर्ट ने सवाल उठाया — क्या कोई ऐसा रिवाज़ है जो आदिवासी बेटियों को उनके हक से वंचित करता हो? कोई भी पक्ष ऐसा कोई प्रामाणिक रिवाज़ सिद्ध नहीं कर सका। कोर्ट ने जोर देकर कहा, रिवाज़ समय के साथ बदलते हैं। यदि कोई रिवाज़ भेदभाव को बढ़ावा देता है, तो उसे बदलना अनिवार्य है। यह फैसला महज कानूनी दस्तावेजों तक सीमित नहीं, बल्कि 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 8.6% आबादी, यानी 10.42 करोड़ आदिवासियों के लिए एक नई राह खोलता है, जिनमें से अधिकांश समुदायों में बेटियों को पैतृक संपत्ति से वंचित रखा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक शक्तिशाली तूफान है, जो आदिवासी समाज की गहरी जड़ों में जमी रूढ़ियों को उखाड़ने की ताकत रखता है। 2005 का हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम हिंदू महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक देता है, लेकिन आदिवासी समुदायों को इस दायरे से बाहर रखा गया, जिसके चलते आदिवासी बेटियाँ आज भी अपने पिता की संपत्ति से वंचित हैं। यह फैसला उस भेदभाव को मिटाने का एक क्रांतिकारी कदम है। जब आदिवासी समाज ने खान-पान, पहनावे और जीवनशैली में बदलाव को गले लगाया है, तो फिर बेटियों को उनके जन्मसिद्ध हक से क्यों वंचित रखा जाए? यह समय परिवर्तन का है, और इसे पूरे दिल से अपनाने का वक्त आ गया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हर किसी के लिए उत्सव का कारण नहीं है। कुछ का मानना है कि यह फैसला घर-घर में विवाद की चिंगारी सुलगा सकता है। उनके अनुसार, परंपराएँ बेटियों को ससुराल में सम्मान और संपत्ति का पूरा हक देती हैं, लेकिन पिता की संपत्ति में हिस्सा देने का रिवाज़ नहीं रहा। चिंता यह भी है कि यह फैसला समाज की नींव को हिला सकता है, क्योंकि बाहरी लोग संपत्ति के लालच में आदिवासी बेटियों से विवाह कर सकते हैं, जिससे आदिवासी ज़मीनों पर खतरा मंडरा सकता है, जो केवल समुदाय के भीतर ही हस्तांतरित हो सकती हैं।

इसके जवाब में कुछ युवा आवाज़ें उभरती हैं, जो कहती हैं कि संभावित खतरों के डर से बेटियों को उनके हक से वंचित करना अन्याय है। अगर ज़मीन के दुरुपयोग का भय है, तो ऐसे कानून बनाए जाएँ जो यह सुनिश्चित करें कि संपत्ति समुदाय के भीतर ही रहे। वहीं, दूसरी ओर कुछ इसे क्रांति का प्रतीक मानते हैं। उनका कहना है कि देश की अन्य बेटियों को मिलने वाला हक आदिवासी बेटियों का भी अधिकार है। यह फैसला लाखों महिलाओं के लिए आशा की किरण है, जो सदियों से चली आ रही परंपराओं की दीवारों को तोड़ने का साहस जुटा रही है।

धइया की यह लड़ाई अब केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि हर उस बेटी की हुंकार बन गई है, जिसे परंपराओं की जंजीरों ने जकड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ़ कानूनी तर्कों की बुनियाद रखी, बल्कि न्याय, समानता और विवेक की लौ को भी प्रज्वलित किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भेदभाव को पोषित करने वाले रिवाज़ संविधान के अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन हैं, जो लिंग, धर्म या जाति के आधार पर किसी भी प्रकार के भेद को नकारता है। यह फैसला उन 730 आदिवासी समुदायों के लिए एक नए युग का सूत्रपात हो सकता है, जहाँ बेटियों को उनके पैतृक हक से वंचित रखा जाता रहा है।

मगर सवाल अब भी कायम है—क्या यह फैसला धरातल पर अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएगा? आदिवासी समाज में दो स्पष्ट धड़े उभर रहे हैं: एक इसे प्रगति का प्रतीक मानता है, तो दूसरा इसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता पर आघात के रूप में देखता है। धइया के पोते की सादगी भरी बात, “हमने तो सिर्फ़ अपनी दादी के हक की लड़ाई लड़ी, और अदालत ने भी यही कहा,” साधारण लग सकती है, मगर इसके पीछे छिपी है वह अदम्य हिम्मत, जो सदियों पुरानी परंपराओं को चुनौती देती है।

यह फैसला एक नई बहस का आगाज़ है—यह महज़ ज़मीन और संपत्ति का मसला नहीं, बल्कि बेटियों के सम्मान, उनकी पहचान और उनके जन्मसिद्ध अधिकारों की लड़ाई है। यह एक ऐसी जंग है, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करती है। क्या आदिवासी बेटियाँ अपनी ज़मीन पर अपना हक कायम कर पाएँगी? या परंपराओं की ऊँची दीवारें इस बदलाव को थाम लेंगी? समय ही इसका जवाब देगा, पर धइया की पुकार ने एक सत्य को रेखांकित कर दिया—बदलाव की बयार बह चुकी है, और अब इसे कोई रोक नहीं सकता।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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