व्यंग्य लेख : बाढ़, मोक्ष औरमंत्रीजी की 'पैरधोई' राजनीति

|
|
| |||
बाढ़, मोक्ष और मंत्रीजी की 'पैरधोई' राजनीति
[स्वर्ग की सीढ़ी: बाढ़, बयान और बेशर्मी]
जब देश में बाढ़ आती है, तो पानी सिर्फ खेतों और घरों को नहीं डुबोता — वह सत्ता की संवेदनशीलता को भी भिगोकर बेनकाब कर देता है। मगर हमारे नेता इस तबाही को आस्था की मिठास में लपेटकर ऐसा परोसते हैं कि डूबता इंसान भी ताली बजाकर कहे - वाह, सरकार। कानपुर देहात में बाढ़ से तबाही मची हुई है, गांव-के-गांव डूबे पड़े हैं, लोग छतों पर भूख से तड़प रहे हैं, मवेशी बह गए, स्कूल-हॉस्पिटल कीचड़ में तब्दील हो गए और इन हालात में मंत्रीजी का बयान आता है: गंगा मैया तो गंगा पुत्र का पैर धोने आती हैं और आदमी सीधा स्वर्ग जाता है।
वाह रे लोकतंत्र, क्या शानदार ‘पैरधोई नीति’ गढ़ी है। माने अब बाढ़ कोई प्राकृतिक आपदा नहीं रही, वो मोक्ष-मार्ग बन गई है। अब जनता के घर डूबें, बच्चे बिलखें, बूढ़े तड़पें — कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मंत्रीजी की दृष्टि में यह तो एक पवित्र स्नान है, जिसमें डूबने वाला सीधे स्वर्ग पहुंचता है। कितनी विचित्र विडंबना है – जिनकी जिम्मेदारी थी बाढ़ से बचाने की व्यवस्था करना, वो अब डूबने की महिमा गा रहे हैं। यानी सिस्टम फेल हो गया, और उसकी लीपा-पोती धर्म और दर्शन के घोल से की जा रही है।
दरअसल, यह बयान उस राजनीतिक प्रवृत्ति का उदाहरण है, जहां नेता जनता का सेवक नहीं, बल्कि दैवीय दूत बन बैठा है। जो बाढ़ को वरदान बताए, सूखे को तपस्या, और महामारी को पुण्य। इस बयान में सिर्फ संवेदनहीनता नहीं है, बल्कि एक गहरा राजनीतिक खेल भी छिपा है। जब नेता जवाबदेही से भागना चाहता है, तो वह जनता को श्रद्धा में उलझा देता है। उसे भूख नहीं, मोक्ष का सपना दिखाया जाता है। राहत शिविर नहीं, स्वर्ग का टिकट बांटा जाता है।
अब सोचिए, अगर बाढ़ में मरने वाला सीधा स्वर्ग जाता है, तो क्या मंत्रीजी अगली बार खुद अपने बंगले के बाहर खड़े होंगे, जब गंगा जी पैर धोने आएंगी? या फिर उनके लिए बाढ़ सिर्फ गरीबों के घरों की शोभा है? अगर सच में यह पैर धोने की परंपरा है, तो कृपया इसे राजधानी तक भी लाया जाए। वीआई पी कॉलोनियों में भी यह गंगाजल बहाया जाए ताकि वहां भी कुछ लोगों को स्वर्ग की अनुभूति हो। लेकिन अफसोस, वहां बाढ़ नहीं आती, वहां हेलिकॉप्टर उतरते हैं और जनता की तकलीफ सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस में इस्तेमाल होती है।
कभी-कभी लगता है कि इन नेताओं ने जनता को ईश्वर की प्रयोगशाला बना दिया है। जहां हर आपदा एक नई लीला है – बाढ़ मतलब स्नान, सूखा मतलब तपस्या, और महामारी मतलब यमराज की वीआईपी एंट्री। बाढ़ आई – गंगा मैया। सूखा पड़ा – सूर्य देव। भूकंप आया – धरती माता की करवट। महामारी फैली – काली मां का प्रकोप। बस सरकार की नाकामी का ठीकरा किसी देवी-देवता पर पटक दो, और खुद कैमरा देखकर मुस्कुरा दो।
अरे साहब! जनता का पेट ‘भक्ति’ से नहीं भरता। और वोट देने वाले लोग, देवता नहीं, इंसान होते हैं – जिन्हें खाना, छत, दवा, और इंसाफ चाहिए। लेकिन यहां तो हर आपदा एक त्योहार बना दी जाती है। लेकिन सवाल ये है – मरता कौन है? जनता, रोता कौन है? किसान, डूबता कौन है? बच्चा, और बयान कौन देता है? मंत्री जी। उन्हें क्या फर्क पड़ता है? बाढ़ उनके बंगले में नहीं आती, वो तो एसी में बैठकर मोक्ष एक्सप्रेस चला देते हैं।
हकीकत ये है कि प्राकृतिक आपदाएं हमारे देश में सरकारी लापरवाही का आईना बन चुकी हैं। हर साल बाढ़ आती है, हर साल वही तस्वीरें, वही हवाई सर्वेक्षण, वही बयान – और हर साल गरीब मरता है, नेता बयान देता है, और फिर सब भूल जाते हैं। अब वक्त आ गया है कि हम इन बयानों की 'आध्यात्मिक पैकिंग' खोलें और उसके अंदर की सड़ी हुई हकीकत देखें। बाढ़ कोई धार्मिक उत्सव नहीं है, वो प्रशासनिक विफलता की धूप में सूखती इंसानियत है। और जो नेता इस त्रासदी को ‘गंगा स्नान’ कहे, उससे सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए – अगर मरना मोक्ष है, तो जीने का हक किसके पास है?
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY