ऑस्कर की दौड़ में भारत की नई पहचान—‘होमबाउंड’
[जब गाँवों की अनसुनी आवाज़ बनी ऑस्कर की दावेदार]
एक ऐसी कहानी जो दिल को छू ले, जो समाज की गहराइयों में उतरे और इंसानियत की गर्माहट को सामने लाए—नीरज घेवान की फिल्म 'होमबाउंड' ने यही कर दिखाया है। यह फिल्म न केवल भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक जटिलताओं को उजागर करती है, बल्कि इसे 2026 के एकेडमी अवॉर्ड्स में 'बेस्ट इंटरनेशनल फीचर' श्रेणी के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना जाना इसके वैश्विक प्रभाव का प्रमाण है। कान फिल्म फेस्टिवल में नौ मिनट तक गूंजती तालियों ने इसकी कहानी की ताकत को पहले ही दुनिया के सामने रख दिया था। यह फिल्म न केवल सिनेमाई कला का नमूना है, बल्कि उन अनकही कहानियों का दर्पण है जो भारत के गाँवों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की सच्चाई को बयां करती हैं।
फिल्म की प्रेरणा न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित पत्रकार बशारत पीर के लेख टेकिंग अमृत होम से मिली, जिसमें कोविड महामारी के दौरान प्रवासी मजदूरों की हृदयविदारक त्रासदी को उजागर किया गया—लाखों लोग बिना साधनों के, सैकड़ों-हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँवों की ओर लौटे। लेकिन नीरज के लिए इस कहानी का असली सार था एक मुस्लिम और एक दलित लड़के की बचपन की दोस्ती, जो सामाजिक और जातिगत बंधनों को तोड़कर इंसानियत की मिसाल बनती है। नीरज ने इस दोस्ती को फिल्म की आत्मा बनाकर, एक ऐसी सिनेमाई भाषा गढ़ी जो भावनाओं को गहराई से छूती है और सामाजिक संदेश को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है।
होमबाउंड की आत्मा में बसते हैं दो किरदार—मोहम्मद शोएब अली (ईशान खट्टर) और चंदन कुमार (विशाल जेठवा)—जो समाज की तथाकथित निचली पायदान से उठकर अपने सपनों के पीछे भागते हैं। दोनों का एक ही ख्वाब है: अपने राज्य की पुलिस फोर्स में शामिल होकर जातिगत और सामाजिक दीवारों को ध्वस्त करना और एक नई, सम्मानजनक पहचान गढ़ना। इन किरदारों के जरिए नीरज घेवान उन अनगिनत चेहरों की कहानी बुनते हैं, जो सदियों से भेदभाव, उपेक्षा और सामाजिक तिरस्कार का दंश झेलते आए हैं। जाह्नवी कपूर का किरदार, जो इन पुरुष किरदारों के साथ अपने रिश्तों और अनुभवों से कहानी को गहराई देता है, एक ऐसी स्त्री की आवाज बनता है जो अपने अस्तित्व को तलाशती है। यह फिल्म केवल एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों का एक मार्मिक और सशक्त घोषणापत्र है, जो उनकी पीड़ा, संघर्ष और आशा को जीवंत करता है।
नीरज घेवान का निर्देशन हमेशा संवेदनशीलता और साहस का संगम रहा है। उनकी पहली फिल्म मसान ने 2015 में कान फिल्म फेस्टिवल के 'अन सर्टन रिगार्ड' खंड में प्रदर्शन के साथ 'प्रोमिसिंग फ्यूचर प्राइज' जीतकर विश्व सिनेमा में अपनी धाक जमाई थी। बनारस की पृष्ठभूमि में रची मसान ने प्रेम, दुख और जातिगत व्यवस्था की जटिलताओं को गहरी संवेदना के साथ उकेरा था, जहां विक्की कौशल ने गंगा किनारे शवों का दाह संस्कार करने वाले परिवार के एक युवा की पीड़ा को जीवंत किया। होमबाउंड उसी विरासत को आगे बढ़ाती है, लेकिन कोविड महामारी की अनिश्चितता और मानवीय संवेदनाओं को और गहराई से उजागर करती है। यह फिल्म सामाजिक संरचनाओं पर तीखे सवाल उठाती है और साथ ही मानवता की उस लौ को जलाए रखती है, जो विषम परिस्थितियों में भी उम्मीद की किरण बनकर उभरती है।
होमबाउंड ने 2025 के कान फिल्म फेस्टिवल में 'अन सर्टन रिगार्ड' खंड में प्रीमियर के साथ इतिहास रचा, जहां दर्शकों ने नौ मिनट तक तालियों से इसका स्वागत किया, जो नीरज घेवान की कहानी कहने की कला और फिल्म की गहनता का प्रमाण है। करण जौहर, ईशान खट्टर, विशाल जेठवा और जाह्नवी कपूर की मौजूदगी ने इसे दक्षिण एशियाई सिनेमा का ऐतिहासिक क्षण बनाया। हॉलीवुड दिग्गज मार्टिन स्कॉर्सेसे का कार्यकारी निर्माता के रूप में जुड़ना फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। मसान से प्रभावित स्कॉर्सेसे ने होमबाउंड की आत्मा को गहराई से महसूस किया और इसके संपादन-निर्माण में अपनी विशेषज्ञता से इसे और निखारा।
होमबाउंड केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक दस्तावेज है, जो भारत के ग्रामीण परिदृश्य की सर्दियों की गुनगुनी धूप-सी कोमल, फिर भी गहरी और प्रभावशाली है। उत्तर भारत के देहाती अंचलों में फिल्माई गई यह कृति मुस्लिम और दलित किरदारों की रोजमर्रा की जिंदगी, उनकी छोटी-छोटी खुशियों और अंतहीन संघर्षों को बारीकी से उकेरती है। नीरज घेवान का मानना है कि हिंदी सिनेमा में गाँवों की कहानियाँ और हाशिए के समुदायों की आवाजें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं, जिन्हें आंकड़ों की ठंडी दुनिया में समेट दिया जाता है। होमबाउंड इन आंकड़ों को चेहरा देती है, उनकी कहानियों को आत्मा देती है। यह फिल्म दर्शकों के दिलों को भावनाओं के समंदर में डुबोती है, और साथ ही उन्हें सामाजिक असमानताओं पर गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित करती है।
नीरज घेवान की दलित पहचान होमबाउंड में गहरी संवेदना के साथ उभरती है, जो उनकी कहानी कहने की आत्मा को और प्रखर बनाती है। उन्होंने साझा किया कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में वे शायद इकलौते दलित फिल्मकार हैं, जो कैमरे के पीछे और सामने दोनों जगह अपनी छाप छोड़ रहे हैं। यह पहचान उनके लिए एक जिम्मेदारी और प्रेरणा दोनों है। उनके बचपन के मुस्लिम दोस्त असगर की यादें इस फिल्म में अली और चंदन की दोस्ती के रूप में जीवंत हो उठती हैं, जो सामाजिक बंधनों को तोड़कर मानवीय रिश्तों की सच्चाई को उजागर करती है।
फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया को 2025 में ऑस्कर के लिए 24 फिल्मों के आवेदन मिले, जिनमें से होमबाउंड ने अपनी गहन कहानी और सांस्कृतिक गहराई के बल पर भारत का प्रतिनिधित्व हासिल किया। यह उपलब्धि भारतीय सिनेमा की वैश्विक ताकत का प्रतीक है। करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शंस ने इस फिल्म को भारत की आवाज बनने पर गर्व महसूस किया। नीरज के शब्दों में, होमबाउंड उनकी जड़ों और देश के प्रति प्रेम का प्रतीक है, जिसमें 'घर की खुशबू' समाई है।
होमबाउंड केवल सिनेमा नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का आह्वान है। यह कोविड महामारी की त्रासदी को उजागर करती है, साथ ही दिखाती है कि संकट जाति, वर्ग या धर्म की दीवारों को नहीं देखता। यह फिल्म हाशिए पर जीने वाले समुदायों की अनसुनी आवाजों को मंच देती है, दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है और सामाजिक बदलाव की उम्मीद जगाती है। नीरज घेवान की यह कृति भारतीय और वैश्विक सिनेमा में एक मील का पत्थर है, जो न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि समाज को आईना दिखाती है और मानवता की नई परिभाषा गढ़ती है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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